(गुइलेर्मो लोपेज लूच, पाब्लो डी ओलावाइड विश्वविद्यालय)
सेविले(स्पेन), 16 दिसंबर (द कन्वरसेशन) मस्तिष्क में मौजूद न्यूरॉन्स हमें उन चीजों पर विश्वास दिला सकते हैं जो अस्तित्व में नहीं हैं, हमारे निर्णयों का पूर्वानुमान लगा सकते हैं, दृश्य उत्तेजनाओं के जवाब में चुनिंदा रूप से सक्रिय हो सकते हैं, और हमारी स्मृति का निर्माण करने वाली जानकारी को संग्रहीत करने के लिए एक दूसरे के साथ संवाद कर सकते हैं।
तंत्रिका जैविकी वैज्ञानिक (न्यूरोबायोलॉजिस्ट) और प्रख्यात लेखक रोड्रिगो क्वियान क्विरोगा की कई पुस्तकों में मस्तिष्क के न्यूरॉन का वर्णन इसी प्रकार किया गया है। रोड्रिगो वर्तमान में बार्सिलोना के हॉस्पिटल डेल मार रिसर्च इंस्टीट्यूट में कैटलन इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड एडवांस्ड स्टडीज (आईसीआरईए) में वैज्ञानिक हैं।
हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की सूचनाओं, विशेषकर दृश्य सूचनाओं को संसाधित करने की यह विशाल क्षमता हमें अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं के परिणामों का अनुमान लगाने और उनके बारे में निर्णय लेने में सक्षम बनाती है। इसे एक अत्यंत मानवीय क्षमता और हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक माना जाता है।
—–
खुद को नकुसान पहुंचाने का कृत्य एक चेतावनी संकेत के रूप में काम करता
जब हम घबराए हुए होते हैं, तो खुद के नाखून चबाते हुए, उंगलियों को चटकाते, मुंहासे को फोड़ते, या यहां तक कि खुद को पेन या किसी भारी चीज से हल्के से मारते हुए दिख सकते हैं।
यहां तक कि जब हमें किसी जटिल कार्य का सामना करना पड़ता है जिसमें हमें बहुत कुछ खोना पड़ सकता है, तब भी हम उसे तब तक टालते रह सकते हैं जब तक कि समय समाप्त न हो जाए।
ये व्यवहार जीवित रहने की सहज प्रवृत्ति से उत्पन्न होते हैं। कम से कम, नैदानिक मनोवैज्ञानिक चार्ली हेरियट-मैटलैंड का तो यही मानना है। ‘कंट्रोल्ड एक्सप्लोजन्स इन मेंटल हेल्थ’ नामक पुस्तक में, विशेषज्ञ इस बात का विश्लेषण करते हैं कि मस्तिष्क किस प्रकार मामूली क्षति को एक सुरक्षात्मक उपाय के रूप में उपयोग करके अधिक नुकसान से बचाव करता है।
मान लीजिए कि मस्तिष्क किसी संभावित रूप से बड़े जोखिम का सामना करने की तुलना में नियंत्रित और ज्ञात खतरे की निश्चितता से निपटना पसंद करता है।
—–
नुकसान पर नियंत्रण के विभिन्न रूप
टालमटोल करना, यानी रिपोर्ट, प्रोजेक्ट या ज़रूरी फैसले को आखिरी समय तक टालते रहना, असफलता या अस्वीकृति और उससे होने वाले अवसाद से बचने का एक तरीका माना जा सकता है।
दूसरी ओर, परिपूर्णतावाद अलग-अलग तंत्रों का उपयोग करता है। परिपूर्णतावाद के लिए अत्यधिक एकाग्रता और बारीकियों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
इस तरह हम गलतियां न करने और असफलता से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन साथ ही साथ तनाव और मानसिक थकान के जोखिम को भी बढ़ा देते हैं। इसका नतीजा भी घोर असफलता के रूप में सामने आ सकता है।
स्व-आलोचना के बारे में भी यही सच है, जो अत्यधिक करने पर मन को नियंत्रण और स्वतंत्रता के भ्रामक परिदृश्य से भ्रमित कर देती है।
ये सभी व्यवहार इस तथ्य से उत्पन्न होते हैं कि हमारे मस्तिष्क को जीवित रहने के लिए एक पूर्वानुमानित, नियंत्रण योग्य और औचक घटनाओं से मुक्त परिवेश की आवश्यकता होती है। वे अनियंत्रित परिस्थितियों से अच्छी तरह निपट नहीं पाते हैं।
—–
क्रमिक विकास रक्षा तंत्र
प्रख्यात आनुवंशिकीविद् थियोडोसियस डोबज़ान्स्की का प्रसिद्ध वाक्य ‘‘क्रमिक विकासवाद के ज्ञान के बिना जीव विज्ञान में कुछ भी समझ में नहीं आता’’ है। उनका तात्पर्य यह है कि क्रमिक विकासवाद का सिद्धांत तंत्रिका कार्यों सहित जीव विज्ञान के सभी पहलुओं को समझने के लिए मौलिक है।
हम दिन में सक्रिय रहने वाले जीव हैं जिनके पास स्थूल हथियार बहुत कम हैं। हम कह सकते हैं कि शिकारियों के खिलाफ हमारा सबसे बड़ा हथियार हमारी बुद्धि और खतरे का विश्लेषण करने, उसका अनुमान लगाने, उसका सामना करने या उससे बचने की क्षमता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मस्तिष्क हर जगह खतरे को पहचानने के लिए विकसित हुआ है। यह अस्तित्व का सवाल है, यहां तक कि उन स्थितियों में भी जहां वास्तव में कोई खतरा नहीं होता।
हमारी सतर्कता या खतरे की प्रतिक्रिया प्रणाली और यहां तक कि भय भी तंत्रिका प्रक्रियाओं को सक्रिय करती है जो विभिन्न स्थितियों का आकलन करने, भविष्यवाणी करने और खतरे से निपटने में सहायक होती हैं। नॉरएपिनेफ्रिन, डोपामाइन या ग्लूटामेट जैसे न्यूरोट्रांसमीटर इंद्रियों और तंत्रिका गतिविधि को उत्तेजित करते हैं ताकि खतरे का सामना किया जा सके और जीवन रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
—-
सतर्कता प्रणाली में पेंच
आत्मघाती व्यवहारों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अक्सर आत्म-पूर्ति करने वाली भविष्यवाणियां बन जाते हैं। किसी काम में अपनी काबिलियत के बारे में हमारी अतिरंजित धारणा हमें ‘‘अपनी पिछली उपलब्धियों पर संतुष्ट’’ होने और उस स्तर से कम प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित कर सकती है जो हम ध्यान देने पर हासिल कर सकते थे।
इसके विपरीत, असफलता का हमारा डर हमें उन चुनौतियों या स्थितियों से बचने के लिए प्रेरित कर सकता है जिनका हम आसानी से सामना कर सकते थे।
—-
स्वयं का नुकसान और किशोरावस्था
इस विषय पर एक अलग अध्याय किशोरों में स्वयं को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति को समर्पित किया जा सकता है, जो कि आम धारणा से कहीं अधिक व्यापक स्थिति है। इस प्रकार की हानि में काटना और आत्म-विकृति के अन्य रूप शामिल हैं जिन्हें गैर-आत्मघाती स्वयं को चोटिल (एनएसएसआई) के रूप में जाना जाता है।
इस प्रकार का व्यवहार आमतौर पर तनावपूर्ण परिस्थितियों में नकारात्मक भावनात्मक अवस्थाओं, चिंता या अवसाद के कारण होता है।
हम इस प्रकार के व्यवहार को मस्तिष्क की एक रक्षा तंत्र के रूप में देख सकते हैं, जो कहीं अधिक नुकसान पहुंचाने वाली दर्दनाक स्थिति का सामना करने से पहले मामूली क्षति को स्वीकार कर लेता है।
इन अधिक दर्दनाक स्थितियों में यौन उत्पीड़न, अवसाद या चिंता, आघात, मादक पदार्थों का सेवन, माता-पिता का तलाक और दोस्तों की कमी आदि शामिल हैं।
इस प्रकार, शरीर में बनने वाले ओपिओइड, जैसे कि मामूली आत्म-चोट से निकलने वाले बीटा-एंडोर्फिन, अवसाद और चिंता के लक्षणों को कम कर सकते हैं।
—-
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर (एएसडी)
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे एक अलग मामला हैं। वास्तव में, ऑटिज्म को आत्म-हानिकारक व्यवहार विकसित होने का एक जोखिम कारक माना जाता है।
इन व्यवहारों में सिर पर प्रहार करना, खुद को काटना, गला घोंटना, खुद को खरोंचना या अपने बाल खींचना आदि शामिल हैं।
किशोरों की तरह ही,एएसडी से ग्रस्त कुछ लोगों में आत्म-हानि व्यग्रता को शांत करने, संवेदी अतिभार (शोर, रोशनी, गंध आदि) पर प्रतिक्रिया करने या उन स्थितियों से निपटने का एक तरीका है जिन्हें वे समझ नहीं पाते और जो उन्हें तनाव या चिंता का कारण बनती हैं। दूसरे शब्दों में, हम अधिक आक्रामक स्थितियों से बचने के लिए एक जैविक उत्तेजना तंत्र की बात कर रहे हैं।
हेरियट-मैइटलैंड मनोवैज्ञानिक उपचारों का प्रस्ताव करती हैं जो आत्मघाती कदम की आवश्यकता को कम करने और साथ ही, कम पीड़ा और तनाव के साथ वास्तविकता का सामना करने में सहायक होते हैं।
समस्या की प्रकृति को समझने से उसके उपचार की तलाश करना आसान हो जाता है। हालांकि, इस मामले में समस्या हमारी विकास प्रक्रिया और अस्तित्व की आवश्यकता से गहराई से जुड़ी हुई है।
(द कन्वरसेशन) धीरज पवनेश
पवनेश
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
