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Wednesday, 7 January, 2026
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खराब इन्फ्रास्ट्रक्चर और लापरवाह ड्राइवर भारत में सड़क दुर्घटनाओं की जड़ हैं. इन्हें कैसे सुधारा जाए

शायद अख़बार रोज़ाना होने वाले सड़क हादसों और मौतों की रिपोर्टिंग के लिए एक अलग कॉलम बना सकते हैं, जैसा कि कोविड-19 महामारी के दौरान मौतों के आंकड़ों की रिपोर्टिंग की जाती थी.

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नवंबर के आखिरी दिन तिरुपत्तूर–कारैकुडी मैन रोड पर दो सरकारी बसों की आमने-सामने टक्कर हो गई. एक बस तिरुपुर से कारैकुडी जा रही थी और दूसरी कारैकुडी से डिंडीगुल. हादसे में मौके पर ही 12 लोगों की मौत हो गई और बच्चों व बुजुर्गों सहित 40 से ज्यादा लोग घायल हो गए.

भारत में घातक सड़क दुर्घटनाएं कोई दुर्लभ घटना नहीं हैं और तमिलनाडु दुर्घटनाओं की संख्या में सबसे ऊपर है. वर्ष 2023 में राज्य में 67,213 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जो राष्ट्रीय कुल का 14 प्रतिशत है. यानी औसतन रोज लगभग 184 दुर्घटनाएं.

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर घंटे 55 दुर्घटनाएं और 20 मौतें होती हैं. अकेले 2023 में देश में 4,88,583 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,72,890 लोगों की मौत हुई. कम रिपोर्टिंग के कारण ये आंकड़े आधिकारिक आंकड़ों से अलग हो सकते हैं.

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम ने 2022 में सड़क दुर्घटनाओं से करीब 2,71,300 मौतों का अनुमान लगाया था, जबकि 2022 के लिए मंत्रालय का आंकड़ा 1,68,491 था. भारत के महापंजीयक कार्यालय द्वारा संचालित सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की मृत्यु कारण रिपोर्टें घर-घर जाकर किए गए मौखिक सर्वे के आधार पर स्वतंत्र अनुमान देती हैं. यह अंतर कम रिपोर्टिंग की समस्या को उजागर करता है.

जब पिछले साल जून में एयर इंडिया की उड़ान 171 दुर्घटनाग्रस्त हुई थी, तो यह पहले पन्ने की खबर बनी, देशभर में बहस हुई और पूरा देश शोक में डूब गया. पीड़ितों की तस्वीरें और विवरण वायरल हुए. डीजीसीए ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और हवाई सुरक्षा व नियमों पर सवाल उठे. इसके उलट, सड़क दुर्घटनाओं में रोज 461 मौतें होती हैं, जिन पर लगभग कोई ध्यान नहीं जाता. यह संख्या 2025 की एकमात्र विमान दुर्घटना में मारे गए लोगों से दोगुनी है.

लगातार होने वाली ऐसी मौतें इतनी सामान्य हो गई हैं कि न तो जनता और न ही सरकार सड़क दुर्घटनाओं को लेकर गंभीर चिंता दिखाती है. शायद अखबारों को कोविड-19 महामारी के दौरान रोजाना बताई जाने वाली मौतों की तरह, सड़क दुर्घटनाओं और मौतों के लिए अलग कॉलम रखना चाहिए. वायरस की तीव्रता समय के साथ कम हो गई, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं के इस संकट के जल्द काबू में आने की उम्मीद कम है, क्योंकि अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं.

कारण और चुनौतियां

नियमों की अनदेखी: वाहन चालकों की लापरवाही और नियमों की अवहेलना सड़क दुर्घटनाओं का बड़ा कारण है. मंत्रालय की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, केवल ओवर-स्पीडिंग से 68.4 प्रतिशत दुर्घटनाएं और 68.1 प्रतिशत मौतें होती हैं. चालक अक्सर साइनबोर्ड पर लिखी गति सीमा को नजरअंदाज करते हैं और सुरक्षा नियमों के प्रति असंवेदनशील रहते हैं. इसके अलावा, हेलमेट न पहनने से 54,568 लोगों की जान गई, सीट बेल्ट न पहनने से 16,025 मौतें हुईं और 33,827 दुर्घटनाओं में बिना लाइसेंस चालक शामिल थे.

कौशल की कमी: भारतीय ड्राइवरों में पर्याप्त कौशल नहीं है. इसका सबूत दिल्ली में स्वचालित ड्राइविंग टेस्ट शुरू होने के बाद कम पास प्रतिशत से मिलता है. लगभग 50 प्रतिशत लोग स्वचालित ड्राइविंग टेस्ट में फेल हो जाते हैं. इस टेस्ट में ट्रैक पर लगे सेंसर और कैमरों की मदद से 24 मानकों पर जांच होती है और इसमें किसी इंसान का हस्तक्षेप नहीं होता. इससे पहले, मैनुअल टेस्ट में पास प्रतिशत करीब 80 था. पास प्रतिशत में यह अचानक गिरावट टेस्ट की कमजोर गुणवत्ता को दिखाती है, जिसके चलते पहले कई अयोग्य लोगों को आसानी से लाइसेंस मिल जाता था.

खराब बुनियादी ढांचा: रिपोर्टों के अनुसार, बुनियादी ढांचे की कमियां भी दुर्घटनाओं का बड़ा कारण हैं. हैरानी की बात यह है कि 67 प्रतिशत दुर्घटनाएं सीधी सड़कों पर होती हैं. इसकी वजह यह हो सकती है कि सीधी सड़कें चालकों को तेज रफ्तार बढ़ाने के लिए उकसाती हैं. गड्ढे, तीखे मोड़ और चल रहे निर्माण कार्य जैसे खतरनाक सड़क हालात भी दुर्घटनाओं में बड़ी भूमिका निभाते हैं. इसके अलावा, खराब तरीके से प्रबंधित चौराहे और हाईवे के “ब्लैक स्पॉट” भी लगातार खतरा बने हुए हैं.

क्या किया जा सकता है

बुनियादी ढांचे में सुधार: एक लेन वाले हाईवे पर आमने-सामने की टक्कर दुर्घटनाओं का बड़ा कारण है. इस पर तुरंत दखल देने की जरूरत है. जो एक लेन वाले हाईवे ज्यादा खतरनाक हैं, उन्हें बीच में मजबूत डिवाइडर लगाकर बहु-लेन सड़कों में बदलना जरूरी है. जहां सड़क चौड़ी करना संभव नहीं है, वहां गलत दिशा में वाहन चलने और आमने-सामने की टक्कर रोकने के लिए क्रैश बैरियर लगाना किसी भी हालत में जरूरी है. सड़कों पर गड्ढे नहीं होने चाहिए और आवारा जानवरों की आवाजाही को रोका जाना चाहिए.

कड़ी निगरानी और कार्रवाई: ट्रैफिक उल्लंघनों पर सजा देने के तरीके में बड़ा बदलाव जरूरी है. अभी ट्रैफिक नियमों का पालन मुख्य रूप से सजा की मात्रा पर केंद्रित है, जैसे जेल की सजा बढ़ाना या ज्यादा जुर्माना लगाना. लेकिन रिसर्च बताता है कि सजा का निश्चित होना, यानी पकड़े जाने और दंड मिलने की ज्यादा संभावना, कहीं ज्यादा असरदार रोकथाम है. हमें ऐसा सतर्क तंत्र चाहिए जिसमें हर उल्लंघन पकड़ा जाए और तुरंत कार्रवाई हो, न कि ऐसा सिस्टम जिसमें कड़ी सजा तो हो लेकिन उसका इस्तेमाल बहुत कम हो.

लाइसेंस नियमों में सख्ती: भारी मोटर वाहन लाइसेंस का नवीनीकरण केवल समय-समय पर होने वाली औपचारिक प्रक्रिया नहीं रहना चाहिए. नवीनीकरण के समय ड्राइविंग कौशल और प्रतिक्रिया क्षमता जांचने के लिए प्रैक्टिकल ड्राइविंग टेस्ट अनिवार्य होने चाहिए. इसके साथ ही, अयोग्य चालकों को सड़क से दूर रखने के लिए बिना सख्त निगरानी के निजी केंद्रों को टेस्ट सौंपने का विरोध किया जाना चाहिए. टेस्टिंग पूरी तरह राज्य की सख्त निगरानी में होनी चाहिए, ताकि केवल योग्य चालक ही सड़क पर रहें. पूरे देश में स्वचालित ड्राइविंग टेस्ट लागू करना इसमें मददगार हो सकता है.

व्यापक चिकित्सीय जांच: मानवीय पहलू को सुधारने के लिए केवल कौशल जांच पर्याप्त नहीं है. खासकर भारी वाहन और यात्री वाहन चालकों के लाइसेंस नवीनीकरण में सख्त चिकित्सीय और मानसिक जांच जरूरी होनी चाहिए. इसमें आंखों की जांच, रंग पहचान की जांच, नशे की आदतों की जांच और लंबे समय की थकान का आकलन शामिल होना चाहिए. ये उपाय ड्राइविंग के दौरान होने वाले अचानक बेहोश होने या ब्लाइंड स्पॉट जैसी गलतियों के कारणों को बाहर करने के लिए जरूरी हैं.

रक्षात्मक ड्राइविंग: सड़क सुरक्षा अभियानों और लाइसेंस टेस्ट में डर दिखाने वाले विज्ञापनों का आम तौर पर इस्तेमाल होता है. ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देश तेज रफ्तार और शराब पीकर गाड़ी चलाने से रोकने के लिए गंभीर दुर्घटनाओं के दृश्य दिखाकर ड्राइवरों को सावधान करते हैं. ऐसे तरीकों को भारतीय ड्राइविंग लाइसेंस टेस्ट में अपनाने से रक्षात्मक ड्राइविंग को बढ़ावा मिल सकता है. सुरक्षा अभियान से जुड़े होर्डिंग्स उच्च जोखिम वाले इलाकों में लगाए जाने चाहिए, ताकि लोगों का ध्यान जाए और वे सतर्क हों.

रीयल-टाइम डेटा का उपयोग: आखिर में, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को दुर्घटना डेटा में देरी की समस्या को दूर करना चाहिए. 2025 में भी 2023 के आंकड़ों पर निर्भर रहना नए खतरे वाले इलाकों पर समय पर कार्रवाई की क्षमता को कमजोर करता है. मीडिया में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों की कुल संख्या की रोजाना रिपोर्टिंग एक प्रभावी उपाय हो सकता है.

चाहे सड़क हो या हवा, किसी भी जान का जाना आंकड़ों से परे एक त्रासदी है. जिन अनगिनत लोगों की जान जा रही है, वे किसी मंत्रालय की रिपोर्ट में सिर्फ आंकड़े नहीं हैं. सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य की है. इस शांत महामारी पर कार्रवाई कर निर्दोष लोगों की जान बचाना सिर्फ नीतिगत विकल्प नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी है.

कार्ति पी चिदंबरम शिवगंगा से सांसद और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं. वे तमिलनाडु टेनिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष भी हैं. उनका सोशल मीडिया हैंडल @KartiPC है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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