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Saturday, 3 January, 2026
होममत-विमतभारत की माओवादियों से लंबी जंग में एक ऐसा खालीपन है जिसे मौतों का आंकड़ा भी नहीं भर सकता है

भारत की माओवादियों से लंबी जंग में एक ऐसा खालीपन है जिसे मौतों का आंकड़ा भी नहीं भर सकता है

कमज़ोर शासन, भ्रष्टाचार और गरीबी भारत में आदिवासी जीवन की पहचान बने हुए हैं. इंडस्ट्रियल और माइनिंग प्रोजेक्ट्स शुरू होने से आदिवासियों के मुकाबले ठेकेदारों, नेताओं और अधिकारियों को ज़्यादा फायदा हुआ है.

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दो सौ रुपये, एक चादर और एक धोती. बाद में गौथु लचन्ना ने पीपुल्स कोर्ट में ग्रामीणों से कहा कि पुलिस ने उसे कुम्मारीकुंटा के पास एक ठिकाने तक ले जाने के लिए पैसे दिए थे. एक सर्द रात पुलिस ने जिन छह माओवादी उग्रवादियों को पकड़ा था, वे बोले, उन्हें थोड़ी दूर ले जाकर पीठ में गोली मार दी गई. दो बंदूकें, बमों से भरा एक बैग और एक रेडियो बरामदगी के तौर पर दिखाए गए. 10 लोग अंधेरे में भाग निकले. “कैडर निराश हो रहे हैं और डरे हुए हैं,” एक माओवादी दस्ते के कमांडर ने इन हत्याओं के बाद अपनी डायरी में लिखा. “मैं भी डरता हूं. दूसरों को हिम्मत देने के लिए, मैं अपना डर नहीं दिखाता.”

इस हफ्ते की शुरुआत में लोकसभा के सामने कभी शक्तिशाली रहे माओवादी आंदोलन की लगभग ढह चुकी स्थिति का एक सख्त लेखा-जोखा रखा गया. 2019 से अब तक 1,106 कैडर मारे गए, 7,311 गिरफ्तार हुए और 5,571 ने सरेंडर किया. पुलिस कहती है कि दक्षिण महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ ज़ोन में जहां कभी सैकड़ों उग्रवादी सक्रिय थे, अब उनकी संख्या 10 से भी कम रह गई है.

गृह मंत्री अमित शाह ने वादा किया है कि मार्च 2026 तक भारत माओवाद से मुक्त हो जाएगा. ऐसे वादे पहले भी कई बार किए गए, लेकिन हमेशा अधूरे रह गए.

आने वाला नया साल उस वक्त के 75 साल पूरे करेगा जब 1951 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने तेलंगाना विद्रोह से वापसी की थी. 1969 में लचन्ना का “एनकाउंटर” माओवादी लहर के दूसरे दौर के खत्म होने का संकेत था. 1976 में 100 से ज़्यादा माओवादी नेताओं को दोषी ठहराए जाने के बाद इंडिया टुडे मैगज़ीन ने नक्सलवादी आंदोलन को खत्म मान लिया था—“नेता मारे गए या जेल में हैं, अनुयायी निराश हो चुके हैं.” 2004 में आंध्र प्रदेश ने दावा किया कि उसने माओवाद को खत्म कर दिया है. एक दशक बाद पश्चिम बंगाल ने जंगलमहल विद्रोह को कुचल दिया.

फिर भी, भारत के लंबे माओवादी संघर्ष के केंद्र में एक खालीपन है—एक ऐसा खालीपन जिसे कितनी भी लाशें भर नहीं पा रही हैं.

ऊपर उठता बैनर

1960 के दशक के मध्य में नक्सलवादी क्रांति के दस्ते कंघी, कैंची और नए कपड़ों के साथ श्रीकाकुलम के पहाड़ों में दाखिल हुए थे. माओवादी कैडर मानते थे कि यह दिखाना ज़रूरी है कि गोंड और कोया हर मायने में अन्य लोगों जैसे ही हैं. स्थानीय परंपराएं, जैसे शराब पीकर जश्न मनाना, सख्ती से हतोत्साहित की गईं. महिलाएं, जो पारंपरिक रूप से कम कपड़े पहनती थीं, उन्हें ढककर रहने की सलाह दी गई. पुरुषों को अपने लंबे बाल कंघी करके काटने के लिए मजबूर किया गया. राजनीतिक वैज्ञानिक शांता सिन्हा ने लिखा है कि नियम न मानने पर अक्सर बागवानी वाली बड़ी कैंची का सामना करना पड़ता था.

यह समझने के लिए ज्यादा कल्पना की जरूरत नहीं कि संगम, यानी माओवादी दस्तों का स्वागत अजनबी आदिवासी माहौल में क्यों हुआ. कम्युनिस्ट नेता पुचलपल्ली सुंदरैया ने लिखा है कि यह विद्रोह निज़ाम के शासन की क्रूरता से प्रेरित था. दलितों को वेट्टी यानी हर परिवार से जबरन श्रम देने की व्यवस्था ने बांध रखा था. जमींदार, बुनकरों द्वारा बुने कपड़े का हिस्सा, ताड़ी का हिस्सा और बढ़ई व लोहारों का श्रम अपने लिए मांगते थे. जमींदार परिवारों के सदस्यों को पालकियों में दलितों की पीठ पर बैठाकर गांवों में घुमाया जाता था.

सांप्रदायिक तनाव ने संघर्ष को और तीखा कर दिया. “निज़ाम और उसके मुल्ला यह भावना पैदा करना चाहते थे कि मुसलमान ही शासक वर्ग हैं,” सुन्दरैया ने लिखा. इसके जवाब में हिंदू व्यापारिक हितों और आर्य समाज के कार्यकर्ताओं ने “हिंदू जनता” को “मुस्लिम अत्याचारियों” के खिलाफ लामबंद किया.

पारंपरिक बंदूकें और पुलिस से लूटे गए आधुनिक हथियारों से लैस होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने निज़ाम, उसकी रज़ाकार मिलिशिया और उसे समर्थन देने वाले जमींदारों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया. कम्युनिस्ट नेता रवि नारायण रेड्डी ने लिखा है कि रज़ाकारों ने इसका जवाब गांवों में नरसंहार करके, बस्तियां जलाकर, संदिग्धों को मारकर और लोगों को जिंदा दफनाकर दिया. एक घटना में 50 से ज्यादा युवकों को कतार में खड़ा करके गोली मार दी गई.

1948 में सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद—ननाज, खरे तकली और येलसांगी में रज़ाकारों द्वारा भारतीय सेना की टुकड़ियों पर हमले किए जाने के बाद—प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कदम उठाकर निज़ाम को भारत में विलय करने के लिए मजबूर किया. मेजर-जनरल जेएन चौधरी के नेतृत्व में, एसएन प्रसाद के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, भारतीय सेना ने पांच दिनों में निज़ाम की सेना को पराजित कर दिया. विलय को वैधता देने के लिए निज़ाम को राजप्रमुख, यानी गवर्नर, बनाए रखा गया—इससे उन लोगों में गुस्सा भड़क गया जिन्होंने उसके शासन में पीड़ा झेली थी.

निज़ाम की हार के बाद सीधे तौर पर सीपीआई के संगमों के खिलाफ युद्ध शुरू हो गया. भारत सरकार को इस स्थिति में “रूस की क्रांति से पहले जैसी विस्फोटक संभावनाओं” का डर था, प्रसाद ने लिखा है.

सेना की टुकड़ियों ने आदिवासी गांवों को शिविरों में इकट्ठा किया ताकि उन्हें गुरिल्लों से काटा जा सके. समकालीन लेखकों जैसे रवि रेड्डी ने लिखा है कि यातनाएं और फर्जी मुठभेड़ें आम थीं. 1951 की मिलिट्री इंटेलिजेंस रिपोर्ट में शिविरों में भोजन और पानी की भारी कमी पर चेतावनी दी गई. इतिहासकार सुनील पुरूषोत्तम और जोनाथन कैनेडी ने लिखा है कि बीमारी और भूख व्यापक थीं. कांग्रेस नेता स्वामी तीर्थ ने चेतावनी दी थी कि आदिवासी “असंतोष से भरे हुए हैं.”

हालांकि, सेना के अभियान ने CPI के विद्रोह को काफी कमजोर कर दिया. रवि रेड्डी जैसे नेताओं ने पार्टी को बताया कि कई समर्थक नए गणराज्य के जन्म का स्वागत कर रहे हैं और लड़ाई नहीं, सुधार चाहते हैं. CPI ने 1951 में औपचारिक रूप से विद्रोह खत्म कर दिया और चुनावी राजनीति में प्रवेश किया.

मंच से विदाई

लेकिन कई आदिवासियों के लिए आज़ादी ने बहुत राहत नहीं दी. भ्रष्ट अफसरों और साहूकारों ने शोषण की वही संरचनाएं संभाल लीं जो पहले निज़ाम के राज में थीं. आदिवासी समुदायों के स्थानीय प्रतिनिधि अक्सर जंगल ठेकेदारों की सेवा में रहते थे. पारंपरिक आदिवासी राजकुमार, जिन्हें निज़ाम के शासन में तरक्की मिली थी, वही विधान सभा में आदिवासियों की आवाज़ बने रहे, हालांकि रवि रेड्डी के मुताबिक उनका “आदिवासी समस्याओं से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था.” 1960 के दशक में जमीन कब्जाने और आदिवासी हड़तालों की घटनाएं फिर बढ़ने लगीं.

उधर विद्रोही वामपंथ की ताकत भी बढ़ती गई. पश्चिम बंगाल में 1967 में नक्सलबाड़ी गांव के चाय बागान मजदूरों के बीच विद्रोह भड़क उठा. नेता चारु मजूमदार ने संगठन, प्रशिक्षण और रणनीति जैसे सवालों को नज़रअंदाज़ करते हुए कथित वर्ग-शत्रुओं के सफाये की बात कहकर इस विद्रोह को मजबूत करने की कोशिश की. “लोग,” उन्होंने वादा किया, “नाखूनों और दांतों से शैतान जैसी इस लड़ाई को लड़ेंगे. एक क्रांतिकारी तूफान भारत पर आएगा. 1975 तक लोग आज़ादी के महाकाव्य को पूरा लिख देंगे.”

कुछ समय के लिए यह संभव भी लगा. 1968 में कुन्निक्कल नारायणन के नेतृत्व में 300 आदिवासियों ने उत्तर केरल में पुलिस थानों पर हमला किया. श्रीकाकुलम में हथियारबंद आदिवासियों ने जमींदारों और साहूकारों को निशाना बनाया. एगुवाबल्लेरुगुड़ेम के जंगलों में माओवादी नेता की तलाश में आई पुलिस को 800 आदिवासियों ने हरा भी दिया.

लेकिन तेलंगाना की तरह, विद्रोहियों के पास राज्य की ताकत का मुकाबला करने लायक संसाधन नहीं थे. 1970 तक दो सीआरपीएफ बटालियनों, सिन्हा के मुताबिक, आंध्र पुलिस की आठ कंपनियों और डिस्ट्रिक्ट आर्म्ड रिज़र्व की छह पलाटूनों ने माओवादी दस्तों को सैकड़ों की संख्या से घटाकर 30 से भी कम कर दिया. पूर्व खुफिया अधिकारी अमिया सामंता ने दिखाया है कि पश्चिम बंगाल का विद्रोह भी सरकारी दमन अभियान के सामने बिखर गया.

अंतिम दृश्य नहीं

इस हार से सबक लेकर, पांच माओवादी गुटों ने कोंडापल्ली सीतारामैय्या के नेतृत्व में मिलकर पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) बनाया, और अंधाधुंध हत्याओं के बजाय जन-संगठन पर ज़ोर दिया. स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों ने इस नए माओवादी चुनौती को और सहारा दिया. पूर्व फिल्म अभिनेता और मुख्यमंत्री बनने की चाह रखने वाले एनटी रामाराव और उनकी तेलुगु देशम पार्टी ने माओवादियों को लुभाया और उन्हें “सच्चे देशभक्त, जिन्हें शासक वर्ग समझ नहीं पा रहे” बताया. इसके जवाब में कांग्रेस ने भी 1989 के चुनावों में माओवादी समर्थन की कोशिश की.

आंध्र प्रदेश का प्रशासन 1990 में मुख्यमंत्री चेन्ना रेड्डी के दौर में चरम पर ढह गया, जिन्होंने माओवादी समूहों को खुले तौर पर काम करने दिया. विश्लेषक अजय साहनी लिखते हैं कि यह “निष्क्रियता की नीति” विद्रोह को भीतर से कमजोर करने में सफल रही, क्योंकि इससे माओवादी कैडर के भीतर लालच और भ्रष्टाचार उजागर हुआ. 2003 तक PWG काफी हद तक कमजोर पड़ चुका था, हालांकि इसका नेतृत्व बस्तर के जंगलों और महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार और झारखंड के दूरदराज इलाकों में पीछे हट गया.

चौथी बार माओवादी अपनी पूरी तबाही से बच निकले. 2004 में बचे हुए गुरिल्ला गुटों से नया CPI (माओवादी) उभरा. सरकार को ऐसे विद्रोह से निपटना मुश्किल हुआ जो देश के सबसे दुर्गम इलाकों में सक्रिय था, जहां सड़कें कम थीं या बिल्कुल नहीं थीं.

सरकार ने अन्य कदमों के साथ एक स्थानीय मिलिशिया सलवा जुडूम को हथियारबंद किया और आदिवासी समुदायों को सड़कों के किनारे बसाए गए नए गांवों में स्थानांतरित किया. इन कदमों ने दुश्मनी बढ़ाई, अपराध को बढ़ावा दिया और कई मामलों में माओवादियों की वैधता को मजबूत कर दिया. गांवों का यह विस्थापन कार्यक्रम असल में अंदरूनी इलाकों को माओवादियों के कब्जे में छोड़ गया.

हालांकि केंद्रीय और राज्य पुलिस को भारी जान-माल का नुकसान हुआ, लेकिन धीरे-धीरे जंगलों के भीतर काम करने में सक्षम बड़ी प्रतिद्रोहक (काउंटर-इंसर्जेंसी) फोर्स तैयार हो गई. 2010-2011 के बाद नागरिकों और सुरक्षा बलों की हत्याओं में धीरे-धीरे कमी आने लगी.

एक समय आएगा जब सुरक्षा बल वापस लौटेंगे, और वे जिस इलाके को पीछे छोड़ेंगे, वह हमेशा की तरह ही रहेगा. कमजोर शासन, भ्रष्टाचार और गरीबी अब भी आदिवासी जीवन की पहचान हैं. उद्योग और खनन परियोजनाओं ने आदिवासियों की तुलना में ठेकेदारों, नेताओं और अफसरों को अधिक फायदा पहुंचाया है. जनसांख्यिकी विशेषज्ञ पंखुरी दुबे ने दिखाया है कि स्वतंत्रता के बाद से आदिवासी बस्तर से लगातार पलायन कर रहे हैं.

दो सौ रुपये, एक चादर और एक धोती. हर पीढ़ी सीखती है कि भारत के आदिवासी इलाकों में मानव जीवन की कीमत शायद ही बदली है. इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत चौथे माओवादी युद्ध की जीत के करीब है—लेकिन यह एक ऐसी जीत है जो अंधेरे में डूबी हुई है.

प्रवीण स्वामी दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @praveenswami है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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