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Monday, 30 March, 2026
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ब्रिटिश शासन के दौरान पंडितों ने संस्कृत को जीवित रखा: कैंब्रिज विश्वविद्यालय का शोध

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(अदिति खन्ना)

लंदन, 16 अक्टूबर (भाषा) ब्रिटेन स्थित प्रतिष्ठित कैंब्रिज विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए गए एक नए शोध में बृहस्पतिवार को दावा किया गया कि सत्रहवीं शताब्दी से जब भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद फैल रहा था, तब विद्वान पंडितों ने सुदूर बस्तियों में संस्कृत बौद्धिक विचार, साहित्य और कला को जीवित रखा।

शोधकर्ताओं ने अपने शोध में ब्राह्मण बस्तियों या अग्रहार, और मठों या गुरुकुल में रह रहे सैकड़ों गुमनाम साहित्यिक विशेषज्ञों की विद्वत्तापूर्ण गतिविधियों की ओर इशारा किया है तथा इस पारंपरिक प्रचलित धारणा का खंडन किया है कि भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विस्तार ने संस्कृत विद्वत्ता को लगातार प्रभावित किया।

कैंब्रिज विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ अब दक्षिण भारत में कावेरी डेल्टा के इन स्थलों का पहला व्यापक सर्वेक्षण कर रहे हैं, ताकि उन ब्राह्मण विद्वानों की खोज की जा सके, जो ब्रिटेन और अंततः अंग्रेजों द्वारा देश पर पकड़ मजबूत किए जाने के बावजूद संस्कृत में कविताएं, नाटक, दर्शन, धर्मशास्त्र, कानूनी ग्रंथ और साहित्य के अन्य रूप लिखते रहे।

विश्वविद्यालय के एशियाई एवं पश्चिम एशिया अध्ययन संकाय तथा सेल्विन कॉलेज के परियोजना प्रमुख डॉ. जोनाथन ड्यूक्वेट ने कहा, ‘‘इन लोगों में साहित्यिक प्रतिभाएं थीं, ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हस्तियां थीं, लेकिन भारत में बहुत से लोग उन्हें नहीं जानते।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इनमें से कुछ पंडितों का संस्कृत विद्वत्ता पर गहरा प्रभाव था। एक बहुत छोटा अल्पसंख्यक वर्ग आज भी उनका सम्मान करता है, लेकिन उन्हें और उनके कार्यों को लगभग भुला दिया गया है। हम उन ग्रंथों का अध्ययन करेंगे जिनका कभी अनुवाद या मुद्रण नहीं हुआ, और यह भी संभव है कि हमें ऐसे ग्रंथ भी मिलें जिनका पश्चिम में कभी अध्ययन नहीं किया गया या जिनकी सूची भी नहीं बनाई गई। हमें यह स्पष्ट करने में सक्षम होना चाहिए कि किसने क्या, कब और कहां लिखा था।’’

यह सर्वविदित है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत में पारंपरिक शिक्षा और ज्ञान प्रणालियों को पूरी तरह बदल दिया। सन 1799 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने संस्कृत संरक्षण के केंद्र तंजावुर के दरबार पर नियंत्रण कर लिया जिसके बाद इस क्षेत्र में अंग्रेजी भाषी विद्यालयों का प्रसार शुरू हुआ।

धारणा है कि संस्कृत का अध्ययन हमेशा से एक कुलीन अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा किया जाता रहा है, जहां ब्राह्मण वेदों का अध्ययन करने और संस्कृत दर्शन एवं साहित्य का अध्ययन करने के लिए पारंपरिक विद्यालयों में जाते थे। हालांकि, सन् 1799 के बाद, धीरे-धीरे बहुत कम ब्राह्मण परिवारों ने अपनी संतानों को पुजारी बनाने का लक्ष्य रखा और उन्हें नए, पश्चिमी प्रभाव वाले विद्यालयों में भेजना शुरू कर दिया।

डॉ. ड्यूक्वेट ने कहा, ‘‘इससे संस्कृत विद्वत्ता का बहुत जल्दी पतन हो सकता था, लेकिन आंशिक रूप से इन ग्रामीण बस्तियों के कारण यह बची रही। हो सकता है कि उनके दूरस्थ स्थान ने इसमें मदद की हो, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि विद्वानों ने अपनी भूमि अनुदान राशि को हमेशा के लिए अपने पास रखा, और मुझे लगता है कि यही एक कारण है जिसने उन्हें बड़े शहरों में हो रहे कुछ बदलावों से बचाया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ऐसी धारणा है कि संस्कृत केवल कुलीन वर्ग, दरबारों और महानगरीय केंद्रों तक ही सीमित थी। लेकिन हमारी परियोजना यह दर्शाएगी कि ग्रामीण इलाकों में यह जीवंत थी और इसने इस क्षेत्र के तमिल विद्वानों के साथ संवाद स्थापित किया।’’

डॉ. ड्यूक्वेट की टीम 1650-1800 की अवधि पर ध्यान केंद्रित कर रही है और कावेरी डेल्टा में विशेष बौद्धिक महत्व की 20 या अधिक बस्तियों की पहचान करने की उम्मीद कर रही है।

ब्रिटिश विश्वविद्यालय ने बताया कि कैंब्रिज में संस्कृत अनुसंधान और अध्यापन का एक लंबा और प्रतिष्ठित इतिहास है, जो 1867 से शुरू हुआ था। विश्वविद्यालय पुस्तकालय में अंतरराष्ट्रीय महत्व की संस्कृत पांडुलिपियों का संग्रह मौजूद है।

भाषा धीरज नेत्रपाल

नेत्रपाल

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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