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Monday, 30 March, 2026
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पोलैंड: वारसॉ की फिजाओं में आज भी गूंजता है शॉपन का संगीत

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(मनीष सैन)

वारसॉ, 15 अक्टूबर (भाषा) अगर वारसॉ शहर कोई व्यक्ति होता, तो वह फ्रेडरिक शॉपन होता। 19वीं सदी के इस पियानोवादक ने अपने जीवन के शुरुआती 20 रचनात्मक और सबसे उत्पादक वर्ष यहीं बिताए थे और 200 साल बाद भी यह शहर और इसके लोग उनके माध्यम से जीवित हैं।

जैसे ही कोई पोलैंड की राष्ट्रीय राजधानी वारसॉ शॉपन हवाई अड्डे पर पहुंचता है, तो उनकी संगीतमय मौजूदगी का अहसास होने लगता है।

इस महीने वारसॉ ने दो से 20 अक्टूबर तक 19वीं अंतरराष्ट्रीय फ्रेडरिक शॉपन पियानो प्रतियोगिता में दुनिया भर के प्रतिभाशाली पियानोवादकों का स्वागत किया। महान कलाकार को श्रद्धांजलि देने वाले शहर में इस पियानोवादक के लिए गर्व और भाईचारे की सामूहिक भावना फिर से जागृत हुई।

एक मार्च, 1810 को जन्मे फ्रेडरिक शॉपन मुश्किल से छह महीने के थे जब वह अपने फ्रांसीसी शिक्षक पिता निकोलस शॉपन और पियानोवादक मां जस्टिना क्रज़ीज़ानोव्स्का के साथ ज़ेलाज़ोवा वोला से वारसॉ आए थे।

उनके जीवन के अगले 20 साल शहर के उन हिस्सों में दर्ज हैं जहां उन्होंने अध्ययन किया, प्रस्तुति दी, जीवन बिताया और प्यार किया।

मध्य वारसॉ में स्थित स्क्वेर बोहदाना वोडिक्स्की पार्क की शांति अक्सर पियानो की धुनों से भंग होती है, जो फ्रेडरिक शॉपन संगीत विश्वविद्यालय की खिड़कियों से आती हैं- जिसे पहले वारसॉ कंजर्वेटरी कहा जाता था, जहां शॉपन ने 1826-29 तक संगीत का अध्ययन किया था।

रंगों, ब्रशों और शॉपन के संगीत पर आधारित कुछ किताबों के ढेर के पास खड़े चित्रकार पीटर जानुस्ज़को (27) ने ‘पीटीआई’ को बताया ‘मुझे संगीत समझ में नहीं आता, लेकिन जब मैं शॉपन सुनता हूं तो उन्हें पहचान लेता हूं। वह हर पोलिश व्यक्ति के जीवन का हिस्सा हैं।

यह विश्वविद्यालय फ्रेडरिक शॉपन इंस्टीट्यूट और ओस्ट्रोग्स्की पैलेस में शॉपन संग्रहालय के निकट स्थित है।

शहर भर में साल भर किसी न किसी जगह पर शॉपन संगीत कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन जब पियानो प्रतियोगिता होती है तो शॉपन के अलग ही रंग देखने को मिलते हैं।

शॉपन इंस्टीट्यूट के प्रवक्ता, अलेक्जेंडर लास्कोवस्की ने कहा कि शॉपन का संगीत हर पोलिश व्यक्ति के लिए ‘आत्मा का सार’ है।

उन्होंने कहा, ‘हमारा आध्यात्मिक जीवन शॉपन के संगीत में खूबसूरती से समाया हुआ है। यह हमारे व्यक्तित्व के साथ प्रतिध्वनित होता है। हमारी सभी भावनाएं उनके संगीत में हैं। जब हम सुनते हैं, तो वे भावनाएं बाहर आती हैं और हमारे साथ और भी गहराई से जुड़ जाती हैं। यही कारण है कि हमें यह संगीत इतना पसंद है।’

रूमरी बिस्टरो एक ‘शॉपन मेनू’ परोसते हैं- जो पियानोवादक द्वारा स्वयं सराहे गए स्वादों से प्रेरित है और वोज्शिएक बोनकोव्स्की की पुस्तक ‘शॉपन गॉरमेट’ पर आधारित है। स्पेनिश रेस्तरां बार्सेलोनेटा 1838-39 में शॉपन की मेजरका यात्रा से प्रेरित व्यंजन परोसता है। शहर के कई होटलों ने शॉपन के संगीत से प्रेरित होकर मिठाइयां तैयार की हैं।

यह शहर किसी अन्य व्यक्ति का नहीं बल्कि शॉपन का ही हो सकता है, जिनका शरीर पेरिस के पेरे लाचेज कब्रिस्तान में दफन है, लेकिन उनका हृदय वारसॉ के होली क्रॉस चर्च में बसता है।

चर्च के ठीक बाहर रखी बेंच पर संगीतकार की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक – मार्चे फ्यूनेब्रे (या अंतिम संस्कार मार्च) की धुन बज रही है। यह एक शोकगीत है जो पियानोवादक की प्रतिभा का पर्याय है और पोलिश किंवदंती के लिए एक स्थायी श्रद्धांजलि है।

(मनीष सैन, फ्रेडरिक शॉपन इंस्टीट्यूट और नयी दिल्ली स्थित पोलिश इंस्टीट्यूट के तालमेल से एडम मिकीविक्ज इंस्टीट्यूट के निमंत्रण पर वारसॉ में थे।)

भाषा आशीष पवनेश

पवनेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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