नयी दिल्ली, 14 अक्टूबर (भाषा) दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातक भारत को खाद्य तेलों के लिए एक पारदर्शी और बहु-वर्षीय शुल्क ढांचा अपनाना चाहिए ताकि नीतिगत अस्थिरता के एक दशक को समाप्त किया जा सके जिसने कीमतों को अस्थिर किया है और निवेश को हतोत्साहित किया है। एक नए अध्ययन में यह जानकारी दी गई है।
शोध में कहा गया है कि देश, जो अपनी खाद्य तेल जरूरतों का 60-65 प्रतिशत आयात करता है, ने वर्ष 2015 से 25 से अधिक बार शुल्क में बदलाव किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं से लेकर उपभोक्ताओं तक आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता पैदा हो गई है।
‘‘भारत के खाद्य तेल क्षेत्र में शुल्क अस्थिरता और अंशधारक गतिशीलता’’ नामक यह शोध, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र, वीईके नीति सलाहकार एवं अनुसंधान, और एसोचैम द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
भारत के खाद्य तेल आयात में पाम तेल की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत होने के कारण, अध्ययन में पूर्वानुमानित शुल्क दायरा स्थापित करने, बाज़ार आंकड़ा प्रणालियों को मज़बूत करने और नीतिगत बदलावों से पहले अंशधारकों के साथ परामर्श को संस्थागत बनाने की सिफ़ारिश की गई है।
वीईके के संस्थापक और कार्यकारी चेयरमैन टी एस विश्वनाथ ने अध्ययन शुरू करने के बाद पीटीआई-भाषा को बताया, ‘‘भारत के खाद्य तेल क्षेत्र में शुल्क नीति को एक प्रतिक्रियात्मक साधन से एक रणनीतिक नीतिगत साधन के रूप में विकसित होना चाहिए।’’
राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-पामतेल (एनएमईओ-ओपी) के तहत भारत द्वारा आत्मनिर्भरता के प्रयासों के बीच शुल्क के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए किए गए इस शोध में पाया गया कि बार-बार होने वाले तदर्थ संशोधनों ने आयात योजना को जटिल बना दिया है और रिफाइनरों और व्यापारियों के लिए लेन-देन की लागत बढ़ा दी है।
इसमें आगे कहा गया है कि शुल्क वृद्धि से खुदरा कीमतों में तत्काल उछाल आता है, जबकि कटौती से अक्सर असमान मूल्य संचरण के कारण उपभोक्ताओं को अधूरी या देरी से राहत मिलती है।
रिफाइनरी कंपनियों को कच्चे तेल और रिफाइंड तेल के बीच असंगत शुल्क अंतर के कारण मार्जिन अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है, जिससे क्षमता उपयोग प्रभावित होता है। तत्काल खपत उपभोक्ता माल निर्माता कंपनियां इनपुट लागत में उतार-चढ़ाव से जूझती हैं जो दीर्घकालिक मूल्य निर्धारण रणनीतियों को कमजोर करती है।
अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं को अप्रत्याशित आयात मांग का सामना करना पड़ता है जिससे आपूर्ति प्रतिबद्धताएँ बाधित होती हैं।
पाम तेल की प्रमुख स्थिति इसे भारत में सभी खाद्य तेलों के लिए मूल्य निर्धारण का आधार बनाती है, लेकिन यह देश को प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं – इंडोनेशिया और मलेशिया – से बाहरी नीतिगत जोखिमों के प्रति भी उजागर करती है, जिसमें निर्यात प्रतिबंध, जैव ईंधन का उपयोग और भू-राजनीतिक व्यवधान शामिल हैं।
अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि विविधीकरण के बिना, भारत वैश्विक झटकों, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बना रहेगा।
इस शोध में नीति अनुकरण और पूर्व चेतावनी प्रणालियों के लिए कृत्रिम मेधा (एआई)-आधारित पूर्वानुमान माध्यमों का उपयोग करके वैश्विक कीमतों, आयात मात्रा और खुदरा रुझानों पर नज़र रखने वाला एक एकीकृत खाद्य तेल डेटा पोर्टल विकसित करने का प्रस्ताव दिया गया है।
इसमें शुल्क संशोधन से पहले उद्योग निकायों, किसान समूहों और एफएमसीजी संघों के साथ परामर्श को औपचारिक बनाने और हेजिंग एवं वायदा कारोबार सहित जोखिम प्रबंधन क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया है।
भाषा राजेश राजेश अजय
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