(लक्ष्मी देवी ऐरे)
नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर (भाषा) उर्वरक कंपनी यारा साउथ एशिया वर्ष 2026 में भारत में नए उत्पाद पेश करने का लक्ष्य बना रही है, क्योंकि लंबी नियामकीय प्रक्रियाओं के कारण उसके नवीन उर्वरकों और फसल पोषण समाधान की पाइपलाइन में देरी हो रही है। कंपनी के प्रबंध निदेशक संजीव कंवर ने भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व पर ज़ोर दिया।
कंपनी के कई उत्पाद परीक्षणाधीन हैं, जिनमें फलों की फसलों के लिए पोटाश समाधान और जैव-उत्तेजक शामिल हैं, लेकिन भारत में पंजीकरण में चार से पांच साल का समय लग रहा है, जो टिकाऊ खेती के लिए महत्वपूर्ण समाधान के तेज़ी से व्यावसायीकरण में बाधा डालता है।
कंवर ने पीटीआई-भाषा के साथ साक्षात्कार में कहा, ‘‘हमारे पास कुछ बहुत ही मज़बूत उत्पाद पाइपलाइन में हैं। हम परीक्षण कर रहे हैं और उम्मीद है कि भारत सरकार से मंज़ूरी मिलने के बाद, हम आने वाले वर्ष में पेश कर पाएंगे।’’
कंवर ने कहा, ‘‘कंपनी का नवाचार मुख्य रूप से जिंक-लेपित उर्वरकों और अत्यधिक प्रभावी सूक्ष्म पोषक तत्वों और वृहद पोषक तत्वों के घोल जैसे उत्पादों के माध्यम से पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता में सुधार लाने पर केंद्रित है।’’
पाइपलाइन में शामिल प्रमुख उत्पादों में फलों की फसलों, विशेष रूप से सेब के लिए डिज़ाइन किया गया पोटाश घोल शामिल है। परीक्षण पूरे हो चुके हैं और कृषि मंत्रालय को रिपोर्ट प्रस्तुत की जा चुकी हैं, जिससे उत्पाद को फसल विविधीकरण प्रयासों में सहायता मिलेगी।
कंवर ने कहा, ‘‘यह पोटाश घोल फलों की फसलों, विशेष रूप से सेब के लिए बहुत प्रभावी है। यह सेब के रंग, आकार और गुणवत्ता को बनाए रखने में मदद करेगा।’’ उन्होंने कहा कि यह उत्पाद नियामकीय अनुमोदन प्राप्त होने के तीन महीने के भीतर पेश किया जा सकता है।
यारा पहले से ही बेंगलुरु स्थित सी6 और पुणे स्थित बायो प्राइम के साथ साझेदारी के माध्यम से जैव-उत्तेजक पदार्थों की आपूर्ति कर रही है। कंपनी भारत के विभिन्न स्थानों पर अपनी ब्रिटिश संयंत्रों में उत्पादित पांच जैव-उत्तेजक पदार्थों पर भी परीक्षण कर रही है।
उन्होंने विश्व बैंक की 2019 की एक रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि भारत नए उर्वरकों को पंजीकृत करने में 97 दिन लगाता है, हालांकि व्यवहार में यह समयसीमा 900 दिन से भी ज़्यादा है।
कंपनी उत्तर प्रदेश स्थित अपने बबराला संयंत्र में यूरिया उत्पादन का विस्तार करने पर विचार नहीं कर रही है, बल्कि संतुलित फसल पोषण कार्यक्रमों के माध्यम से किसान शिक्षा और टिकाऊ कृषि पद्धतियों में भारी निवेश कर रही है, जिससे मृदा स्वास्थ्य और उत्पादकता में वृद्धि होती है।
भाषा राजेश राजेश अजय
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