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Sunday, 8 March, 2026
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आहार की नई वैश्विक सिफारिश में अधिक सब्जियों और कम मांस पर जोर

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(शीला स्कीफ, यूनिवर्सिटी ऑफ ओटागो)

डुनेडिन (न्यूजीलैंड), सात अक्टूबर (द कन्वरसेशन) मानव और पृथ्वी दोनों की सेहत को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक आहार परिवर्तनों पर लंबे समय से प्रतीक्षित विशेषज्ञ रिपोर्ट अब स्पष्ट रूप से वनस्पति आधारित दृष्टिकोण की वकालत करती नजर आती है।

ईएटी-लैंसेट आयोग का कहना है कि पिछले सप्ताह जारी उनके ‘प्लैनेटरी हेल्थ डाइट’ को अपनाने से दुनिया भर में प्रतिदिन 40,000 समयपूर्व मौतों को रोका जा सकता है और 2050 तक कृषि से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में 15 प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है।

इस आहार में अधिक सब्जियों, फल, साबुत अनाज, दालें और मेवे शामिल करने की सिफारिश की गई है, जबकि मांस, मछली, मुर्गी और दुग्ध उत्पाद को सीमित मात्रा में रखा गया है।

यदि आप एक थाली की कल्पना करें, तो उसका आधा हिस्सा सब्जियों और फलों (जिनमें सब्जियां अधिक हों) से भरा होना चाहिए। बाकी आधे हिस्से में साबुत अनाज और वनस्पति आधारित प्रोटीन हों।

इसमें थोड़ी मात्रा में पशु उत्पाद और स्वस्थ वसा के लिए स्थान है, लेकिन अतिरिक्त चीनी बहुत कम रखी जानी चाहिए। विशेष रूप से मक्खन का कहीं जिक्र नहीं किया गया।

सबसे विवादास्पद सिफारिश है – मांस की मात्रा:

केवल 14 ग्राम प्रतिदिन लाल मांस और 29 ग्राम प्रतिदिन चिकन।

न्यूजीलैंड का पारंपरिक आहार इस सिफारिश से काफी अलग है। लेकिन देश भर में किशोर लड़कियों पर किए गए एक हालिया अध्ययन से संकेत मिलता है कि अब एक बदलाव आ रहा है और अधिकतर लड़कियां वनस्पति आधारित आहार को अपना रही हैं।

हम कैसे जानें कि हमें क्या खाना चाहिए?

खानपान के फैसले पर कई कारक असर डालते हैं – भूख, भावनाएं, स्वास्थ्य, संस्कृति, मीडिया, स्वाद, आदतें और पारिवारिक परंपराएं।

साक्ष्य आधारित पोषण संबंधी दिशानिर्देश, जैसे कि राष्ट्रीय खाद्य और पोषण दिशानिर्देश, भी अहम भूमिका निभाते हैं।

न्यूज़ीलैंड में लोग ‘5+ प्रति दिन’ वाले संदेश से परिचित हो सकते हैं, जो फल और सब्जी के सेवन को बढ़ावा देता है। अब यह बढ़कर ‘7+ प्रति दिन’ हो गया है क्योंकि नए साक्ष्य सामने आए हैं।

पिछले एक दशक में पोषण संबंधी दिशानिर्देशों में पर्यावरणीय स्थिरता को शामिल किया गया है और इस बात को माना गया है कि वैश्विक उत्सर्जन का लगभग 30 प्रतिशत भोजन के उत्पादन, प्रसंस्करण और परिवहन से आता है।

ईएटी-लैंसेट आयोग ने 2019 में पहली बार ‘प्लैनेटरी हेल्थ डाइट’ को पेश करते हुए तर्क दिया था कि अगर हम अपने खाने की आदतों को बदलें, भोजन की बर्बादी कम करें और उत्पादन प्रणालियों को सुधारें, तो हम पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हुए बढ़ती वैश्विक आबादी को भोजन दे सकते हैं।

कम मांस यानी स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए अनुकूल स्थिति:

यह दृष्टिकोण न्यूजीलैंड के पारंपरिक आहार से जुड़ा एक बड़ा बदलाव है। वहीं ब्रिटिश प्रभाव वाला “मांस और तीन सब्जियां” वाला भोजन (जिसमें अक्सर आलू होता है) और माओरी समुदाय का हांगी (जिसमें सूअर का मांस, समुद्री भोजन, शकरकंद और स्थानीय साग होते हैं) ईएटी-लैंसेट की सिफारिशों से पूरी तरह मेल नहीं खाते।

मूल रिपोर्ट की एक आलोचना यह थी कि इसमें आदिवासी खाद्य प्रणालियों पर सीमित विचार किया गया। विशेष रूप से स्टार्चयुक्त सब्जियां जैसे आलू, कसावा, शकरकंद, मक्का और बाजरा को बहुत कम जगह दी गई, जबकि ये कई समुदायों के लिए सस्ती, उपलब्ध और ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

फिर भी, अधिकतर न्यूजीलैंडवासी अनुशंसित मात्रा से लगभग दोगुने प्रोटीन का सेवन करते हैं। इसलिए मांस में कटौती से प्रोटीन की कमी की संभावना नहीं है।

वर्तमान में, न्यूजीलैंड के वासियों के लिए 40 प्रतिशत प्रोटीन पशु स्रोतों (मांस, डेयरी, मछली) से आता है और बाकी 60 प्रतिशत वनस्पतियों से।

यह धारणा अब पुरानी हो चुकी है कि केवल पशु प्रोटीन ही अपने अमीनो एसिड तथा सुपाच्य होने के कारण उच्च गुणवत्ता वाले होते हैं। यह आमतौर पर व्यापक गलत धारणा है कि कुछ अमीनो एसिड केवल मांस से ही मिलते हैं। पौधों में भी सभी आवश्यक अमीनो एसिड होते हैं, भले ही उनकी मात्रा अलग-अलग हो।

अधिकतर वयस्कों के लिए, कम मांस वाला आहार स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी होता है।

क्या न्यूजीलैंड को ‘प्लैनेटरी हेल्थ डाइट’ अपनानी चाहिए?

कई मायनों में, हम पहले से ही ऐसा कर रहे हैं। किशोर लड़कियों पर मेरे अध्ययन में पाया गया कि जो मिश्रित आहार लेती हैं या सर्वाहारी हैं, उन्हें अपनी 69 प्रतिशत ऊर्जा वनस्पति आधारित भोजन से मिलती है (43 प्रतिशत से 92 प्रतिशत तक), जबकि शाकाहारी लड़कियों को औसतन 83 प्रतिशत (51 प्रतिशत से 100 प्रतिशत) तक ऊर्जा मिलती है।

हालांकि, न्यूजीलैंड के लोग अब भी सिफारिश से अधिक संतृप्त वसा और कम फाइबर का सेवन करते हैं। ‘प्लैनेटरी हेल्थ डाइट’ की ओर अधिक बदलाव इन असंतुलनों को दूर करने और हृदय रोग व कैंसर जैसी मौत की प्रमुख वजहों को कम करने में मदद कर सकता है।

लोगों और पृथ्वी दोनों के लिए आहार:

स्वाभाविक रूप से, मांस उद्योग आयोग की सिफारिशों का विरोध कर रहा है और विशेष रूप से आहार को पहली बार जारी किए जाने के बाद से ऐसा हो रहा है।

चेंजिंग मार्केट्स फाउंडेशन की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि उद्योग, शिक्षा और सरकारों में प्रभावशाली मांस समर्थक लोग आयोग की सिफारिशों को गलत ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।

कुछ पोषण विशेषज्ञों ने मांस और मछली की अपेक्षाकृत कम मात्रा पर चिंता जताई है।

कुछ विशेषज्ञों ने दलील दी है कि मांस की कम मात्रा कुछ समूहों – जैसे गर्भवती महिलाएं और छोटे बच्चे – की पोषण आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती। उनके अनुसार, लाल मांस में मिलने वाला आयरन और जिंक शरीर द्वारा शाकीय स्रोतों की तुलना में ज्यादा आसानी से अवशोषित होता है।

एक और जटिलता यह है कि दुनियाभर में प्रोटीन को लेकर जुनून बढ़ा है, जो अक्सर मांस से जोड़ा जाता है। वसा और कार्बोहाइड्रेट को गलत ठहराया जाता है, वहीं प्रोटीन को पोषण का नायक बना दिया गया है।

उन्नत दिशानिर्देश अब पर्यावरणीय स्थिरता पर अधिक जोर देते हैं और विविध खाद्य संस्कृतियों का सम्मान करने तथा खाद्य का सार्वभौमिक मानव अधिकार बनाए रखने की बात करते हैं।

जलवायु परिवर्तन और आहार-जनित बीमारियों की बढ़ती दर के दोहरे संकट के बीच, मेरा तर्क है कि पृथ्वी के पोषक आहार (प्लैनेटरी हेल्थ डाइट) एक स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य के लिए उपयुक्त समाधान हैं।

यह समस्त खाद्य समूहों को समाप्त करने या एक जैसा आहार सभी पर थोपने की बात नहीं करता, बल्कि सोच-समझकर, वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ऐसे विकल्प चुनने की सलाह देता है जो मानव और पृथ्वी दोनों के लिए लाभकारी हों।

(द कन्वरसेशन) वैभव मनीषा

मनीषा

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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