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Saturday, 28 March, 2026
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संसदीय समिति ने डब्ल्यूटीओ के आईटी समझौते पर पुनर्विचार का सरकार को सुझाव दिया

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नयी दिल्ली, 15 सितंबर (भाषा) संसद की एक समिति ने कहा है कि भारत को अमेरिका के हालिया कदम से सबक लेना चाहिए जिसमें उसने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की बाध्यताओं से एकतरफा बाहर निकलते हुए अपने घरेलू उद्योग की रक्षा के लिए ऊंचे शुल्क लगाए।

संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने सुझाव दिया है कि भारत या तो बहुपक्षीय सूचना प्रौद्योगिकी समझौते (आईटीए) में अनुकूल शर्तों पर पुनर्विचार कराए या फिर इससे बाहर निकलने के विकल्प के बारे में सोचे।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 1997 में हस्ताक्षरित आईटीए ने भारत के सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र को कमजोर बना दिया। हालांकि, इस समझौते ने उपभोक्ताओं को सस्ती प्रौद्योगिकी मुहैया कराई लेकिन विनिर्माण उद्योग को ‘लगभग खत्म’ कर दिया और व्यापार घाटा बढ़ा दिया।

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा कि अमेरिका द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का हालिया कदम वैश्विक व्यापार व्यवस्था में तेज बदलाव का संकेत है। ऐसे में भारत को आईटीए पर ‘सक्रिय एवं संतुलित दृष्टिकोण’ अपनाना चाहिए।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि आईटीए 1.0 और आईटीए 2.0 के प्रभावों की गहन समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय मंत्रिमंडलीय समिति बनाई जाए जिसमें विदेश, वाणिज्य, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी और वित्त मंत्रालय समेत सभी हितधारक शामिल हों।

समिति ने कहा है कि आईटी समझौते की बाध्यताएं भारत की नीतिगत स्वायत्तता को सीमित करती हैं और इसमें किसी तरह के पुनर्विचार या बाहर निकलने की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।

हालांकि, मंत्रालय ने कहा कि भारत ने अनुभव से सीखते हुए आईटीए के विस्तार में शामिल न होने का निर्णय लिया है।

संसदीय समिति ने ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं की सराहना करने के साथ इस बात पर जोर दिया है कि शोध एवं विकास, अवसंरचना, कौशल विकास और स्टार्टअप एवं एमएसएमई के लिए वित्तीय प्रोत्साहन के जरिये इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को प्रतिस्पर्धी बनाना जरूरी है।

भाषा प्रेम

प्रेम अजय

अजय

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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