दुनियाभर में माना जा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर को पहला आधुनिक ‘एयर वॉर’ है, जिसमें बराबर की तकनीकी क्षमता रखने वाले प्रतिद्वंद्वियों ने हवा से हवा में और जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल किया. वैसे, 88 घंटे चली उस लड़ाई में चंद घंटे तक ही हवाई ताकत का बोलबाला रहा जब भारतीय वायुसेना ने आतंकवादी अड्डों पर हमले किए और इसके बाद 6-7 मई की रात में जब हवाई युद्ध हुआ; और जब उसने 9-10 मई की रात में अंतिम प्रहार के तहत पाकिस्तान के हवाई अड्डों, रडारों, और कमांड व कंट्रोल इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया.
वास्तव में, करीब 60 घंटों तक मानव रहित एरियल सिस्टम (यूएएस) लड़ाई में हावी रहे. इसलिए, कुछ विश्लेषणकर्ता इसे इस उपमहादेश का ‘पहला ड्रोन युद्ध’ कह रहे हैं. वैसे, गंभीर आकलन संकेत करता है कि यूएएस ने अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कि, और यह दोषपूर्ण सिद्धांत और चाल के साथ-साथ गुणवत्ता और परिमाण की कमी को भी दर्शाता है.
अब ‘एयर लिट्टोरल’ यानी पारंपरिक थल सेना और हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे फाइटर विमान के बीच के नए हवाई विस्तार पर यूएएस का वर्चस्व हो गया है. इस ‘एयर लिट्टोरल’ पर, जिसमें ‘यूएएस’ और जवाबी ‘सी-यूएएस’ सिस्टम्स के बीच वर्चस्व स्थापित करने की लड़ाई होगी, नियंत्रण और प्रभुत्व ही भावी युद्धों का नतीजा तय करेगा. ड्रोन टेक्नोलॉजी में इतनी तेजी से प्रगति हो रही है की सैन्य टेक्नोलॉजी के मामले में दुनिया का अगुआ अमेरिका भी पीछे छूट गया है. ड्रोन युद्ध को अपनाने के लिए हाल में उसने बुनियादी बदलाव शुरू कर दिया है.
‘सबकी पहुंच में आने वाला’ ‘यूएएस’ एक उभरती ताकत, भारत के लिए पसंदीदा हथियार बन सकता है. चीन को ड्रोन के मामले में दुनिया का नेता माना जा रहा है, और पाकिस्तान भारत का समकक्ष प्रतिद्वंद्वी है. भारतीय सेना को यूएएस को अपने बदलाव का आंतरिक हिस्सा बनाने की जरूरत है, और यह काम तेजी से पूरा किया जाना चाहिए.
ऑपरेशन सिंदूर में ड्रोन युद्ध
भारत और पाकिस्तान निगरानी और टोही गतिविधियों के लिए यूएएस का इस्तेमाल करीब 25 वर्षों से कर रहे हैं लेकिन हथियारबंद ‘यूएएस’ का इस्तेमाल अभी पांच वर्षों से शुरू हुआ है. लेकिन आश्चर्य की बात है की अभी भी यह शुरुआती चरण में ही है, जिसकी कोई वजह नहीं नजर आती. ऐसा लगता है कि दोनों देश बेहद महंगे पारंपरिक वेपन सिस्टम्स के प्रति ही सम्मोहित हैं. और वे आधुनिक युद्धकला में विमान तथा टैंक के आविष्कार के बाद लागत का सबसे ज्यादा लाभ देने वाले तकनीकी आविष्कार के असर को समझने में विफल रहे हैं.
पाकिस्तान ने भारी संख्या में ड्रोनों का इस्तेमाल किया लेकिन उनमें वह न्यूनतम मूल विशेषता नहीं थी जो उन्हें प्रभावी बनाती है. लड़ाई में उसने पहली रात 15 स्थानों पर और दूसरी तथा तीसरी रात को पश्चिमी मोर्चे पर क्रमशः 36 तथा 26 स्थानों पर कुल मिलाकर 600 ड्रोनों का इस्तेमाल किया. दुश्मन के ड्रोनों ने एअर डिफेंस सिस्टम्स, रडारों, फॉरवर्ड अग्रिम मोर्चे पर हवाई अड्डों, गोला-बारूद के भंडारों, और दूसरे रक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया.
मेरा आकलन है कि इनमें से केवल 100-125 ड्रोन ही चीन और तुर्की से हासिल छोटी/मध्य दूरी वाले सशस्त्र यूएएस थे. बाकी सब देसी, बिना हथियार वाले, अल्पविकसित टोही ड्रोन थे जिनका इस्तेमाल एयर डिफेंस सिस्टम का पता लगाने और इस सिस्टम्स का नोवैज्ञानिक प्रभाव डालने के लिए किया गया. 98 फीसदी ड्रोनों को इलेक्ट्रोनिक जैमरों से नाकाम कर दिया गया या भारत की समेकित एअर डिफेंस कमांड एवं कंट्रोल सिस्टम की यूएएस-रोधी एयर डिफेंस/कंपोजीट सिस्टम की मदद से नष्ट कर दिया गया. बाकी 2 फीसदी जो ड्रोन आगे बढ़े उन्होंने सटीकता की कमी के कारण मामूली नुकसान पहुंचाया. साफ है कि अधिकतर ड्रोन बेसिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर रहे थे और वे ‘सी-यूएएस/एयर डिफेंस सिस्टेम से बच या उसे भेद नहीं सकते थे. भारत 1000 एडी गन सिस्टम और 750 शॉर्ट व मीडियम रेंज एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा था. महंगे गोला-बारूद/मिसाइलों की लागत की कल्पना ही की जा सकती है.
भारतीय ड्रोन आक्रमण में उत्कृष्टता थी लेकिन व्यापक विध्वंस के लिए संख्याबल में कमी थी. मेरा आकलन है कि भारत ने विभिन्न तरह के 150 ड्रोनों का इस्तेमाल किया. पाकिस्तान के मुताबिक, भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के एयर डिफेंस को दबाने और नष्ट करने के लिए करीब 70-80 इजरायली हारपी और हारोप यूएएस का इस्तेमाल किया. इनमें से 60-70 फीसदी ड्रोनों को रोक दी गया लेकिन बाकी ने सटीक निशाने लगाए. कम-से-कम एक एचक्यू-9 एयर डिफेंस सिस्टम और दो बड़े रडारों के नष्ट होने की पुष्टि की जा चुकी है.
भारतीय यूएएस अत्याधुनिक थे; लेकिन उनकी संख्या मिशन के पैमाने के हिसाब से अपर्याप्त थी. भारत ने नौ में से सात आतंकी अड्डों और कुछ दूसरे ठिकानों पर हमला करने के लिए सेना के वॉरमेट (पोलैंड), स्काईस्ट्राइकर (इजरायल), नागस्त्र (भारत) सामरिक ड्रोनों का इस्तेमाल किया. ड्रोनों का इस्तेमाल टोही गतिविधि के लिए भी किया गया और 10 मई को सीमा पार घुसकर वायुसेना के हमलों से पहले एअर डिफेंस सिस्टम को नाकाम/नष्ट करने के लिए भी किया गया. सामरिक ठिकानों पर हमला करने के लिए भी सीमित संख्या में देसी सामरिक ड्रोनों का इस्तेमाल किया गया. ऐसे अधिकतर ड्रोनों को दुश्मन के एअर डिफेंस सिस्टम ने रोक दिया. यहां यह बता देना उपयुक्त होगा कि एक हारोप ड्रोन की कीमत 7 लाख डॉलर है. सस्ती टेक्नोलॉजी के तहत यूक्रेन और रूस ऐसे ही यूएएस इसकी 25 फीसदी के बराबर लागत पर बना रहे हैं.
कम लागत वाले सामान
उस स्थिति की कल्पना कीजिए जब भारत या पाकिस्तान के पास बड़ी तादाद में उत्कृष्ट ड्रोन होंगे. तब वे ‘एयर लिट्टोरल स्पेस’ में हावी होंगे और दुश्मन के एअर डिफेंस सिस्टम पर पर ड्रोन छाये होंगे या उसे नष्ट कर रहे होंगे, जबकि बहुत ऊंचाई पर उड़ते फाइटर विमान दुश्मन के काफी बड़े ठिकानों और विमानों को निशाना बना रहे होंगे. जमीनी लक्ष्यों और ‘एईडब्लू-ऐंड-सी’ विमानों तक को निशाना बनाने के लिए मीडियम/लॉन्ग रेंज वाले ड्रोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है. वास्तव में, सामरिक/ऑपरेशन संबनधि/रणनीतिक स्तरों पर ‘केवल ड्रोनों’ के बूते ऑपरेशन चलाना संभव होने वाला है.
यूक्रेन सक्षम वायुसेना और नौसेना के अभाव में जमीनी और समुद्री युद्ध में यही कर रहा है. इसके साथ ही, बड़े लक्ष्यों पर ड्रोनों से हमला करने और दुश्मन के इलाके में सैनिकों को मारने के ली ‘स्टैंडअलोन मोड’ या उपरोक्त ऑपरेशनों के मेल के साथ स्पेशल फोर्स या बाहरी फोर्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. संभावनाएं अनंत हैं.
ऊपर जो संभावनाएं गिनाई गई हैं वे कोई कपोल कल्पना नहीं हैं, उन्हें टेक्नोलॉजी और आर्थिक दृष्टि से संभव किया जा सकता है. खासकर तब जबकि अत्याधुनिक हथियारों को हासिल करने के लिए रक्षा बजट में बड़ी वृद्धि नहीं की जा सकती. फरवरी 2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध के पहले साल में दोनों ने ड्रोनों का इस्तेमाल किया जो पारंपरिक हथियारों जितने महंगे थे. वे कारगर तो हो रहे थे लेकिन लड़ाई लंबी खिंचने लगी तो सामर्थ्य से बाहर होने लगे. इसने तकनीकी ड्रोन क्रांति ला दी और लंबी दूरी तक उड़ने वाले सामरिक ड्रोन बनने लगे जो पुराने ड्रोनों से काफी सस्ते हैं. ड्रोनों का आज जिस भारी पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है वह हैरत में डालता है.
रूस 20 लाख ‘फर्स्ट पर्सन व्यू’ (एफपीवी) ड्रोनों का उत्पादन करने की योजना बना रहा है; यूक्रेन 45 लाख ड्रोन खरीदने की तैयारी कर रहा है.
एफपीवी सामरिक ड्रोन युद्धक्षेत्र में 30 किमी की दूरी तक जाकर सभी तरह के ठिकानों को नष्ट कर सकते हैं, और इनकी कीमत मात्र 300-500 डॉलर के बीच है. 1000 किमी की दूरी तक जाकर बड़े ठिकाने को नष्ट करने वाले अत्याधुनिक ड्रोन की कीमत इसी हिसाब से बढ़ती जाती है. आधुनिकता के हिसाब से 50 हजार से लेकर 3 लाख डॉलर तक के ड्रोन सामर्थ्य के भीतर ही माने जाएंगे क्योंकि इतनी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से वे 10 गुने सस्ते हैं. दोनों देश लंबी दूरी वाले 30,000 ड्रोनों का उत्पादन करने की योजना बना रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में जितने सैनिक मारे गए हैं और जितने सैन्य साजोसामान नष्ट किए गए हैं उनमें से 70-80 फीसदी हिस्सा ड्रोनों के खाते में जाता है.
इसकी तुलना में, हाई टेक्नोलॉजी वाले पारंपरिक हथियारों की कीमतें बेहिसाब है. 155 मीमी की एक तोप की कीमत 20-40 लाख डॉलर है और एक सामान्य गोले की कीमत 3,000 से 5,000 डॉलर तक है. एक आधुनिक टैंक 50 लाख से लेकर 1 करोड़ डॉलर में आता है और एक आईसीवी 30-40 लाख डॉलर में आता है. एक आधुनिक फाइटर विमान की कीमत 10-12.5 करोड़ डॉलर है. कंधे पर रखकर दागे जाने वाले जेवलीन एटीजीएम कंट्रोल यूनिट की कीमत 2,50,000 डॉलर है और हर एक रिप्लेस्मेंट मिसाइल की कीमत 2 लाख डॉलर है. भारत 31 एचक्यू 9बी प्रिडेटर का जो सौदा कर रहा है वह 3.5-4 अरब डॉलर का है. एक अपाचे हेलिकॉप्टर कम-से-कम 10 करोड़ डॉलर में आता है.
भारत के लिए आगे का रास्ता
इसमें कोई शक नहीं रह जाना चाहिए कि सस्ते, छोटे, सर्वव्यापी, और सुलभ यूएएस आधुनिक युद्धक्षेत्र पर हावी हैं और टैंक, टॉप, अटैक हेलिकॉप्टर, फाइटर विमान जैसे बेहद महंगे वेपन प्लेटफॉर्मों के वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं. लेकिन उनका प्रभाव कई तरह के जवाबी उपायों और अनुकूलीय आर्म्स टैक्टीक्स के कारण तुलना में पिछड़ रहे हैं. कई ठिकानों पर एक साथ हमले करने वाले, पूरी तरह स्वतंत्र ‘स्वार्म ड्रोन’ कहीं से बनते नहीं दिख रहे. इस मोड़ पर, युद्धक्षेत्र पर उनका प्रभाव अभी क्रांतिकारी नहीं बल्कि प्रारंभिक चरण में ही है.
इसे ध्यान में रखकर कर भारतीय सेना को ड्रोन युद्ध के अपने सिद्धांत को स्वरूप देना चाहिए और इसे सेना में हो रहे बदलाव का अंतरंग हिस्सा बनाना चाहिए. व्यापक स्तर पर, लंबी दूरी वाले कीमती ड्रोनों की रणनीतिक तैनाती का तीनों सेनाओं से जुड़ा एकीकृत कमांड के गठन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. इस तैनाती में स्पेशल फोर्स और बाहरी फोर्स के ऑपरेशनों को भी शामिल किया जाना चाहिए. थिएटर स्तर पर तैनाती के मामलों के लिए थिएटर स्तर पर एकीकृत संगठनों का निर्माण किया जाना चाहिए. हर सेना की जरूरत के हिसाब से सामरिक संगठनों की भी जरूरत होगी. काईनेटिक और नॉन काईनेटिक ‘सी-यूएएस’ संगठनों को एकीकृत एयर डिफेंस कमांड ऐंड कंट्रोल का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. सेना में, विशेष ड्रोन शाखा को संयुक्त आर्म्स का हिस्सा जरूर बनाया जाए.
भारत में सक्षम ड्रोन उद्योग मौजूद है, और इसकी टेक्नोलॉजी में हर दिन विकास हो रहा है. ड्रोनों मे मामले में अवधारणा से युद्ध के मैदान तक पहुंचने में छह महीने से ज्यादा नहीं लगना चाहिए. उच्च टेक्नोलॉजी वाले पुराने वेपन सिस्टम्स की खरीद की समीक्षा की जाए. एक टैंक को नष्ट करने के लिए एक जेवलीन मिसाइल पर 2 लाख डॉलर क्यों खर्च किया जाए जबकि यह काम 300-500 डॉलर के एफपीवी ड्रोन से किया जा सकता है? ड्रोनों के युग में 10 करोड़ डॉलर मूल्य के
अपाशे अटैक हेलिकॉप्टर का क्या काम?
भारत को यूएएस के विकास के लिए वार्षिक बजट तय कर देना चाहिए. 2 अरब डॉलर का न्युन्तम वार्षिक ड्रोन बजट मौजूदा कमी को पूरा कर सकता है और 5 अरब डॉलर का बजट हमें प्रमुख ड्रोन महाशक्ति बना सकता है. रूस-यूक्रेन युद्ध ने ड्रोन युद्ध के विकास, पैमाने, और संभावना का प्रत्यक्ष नजारा दिखाया. ऑपरेशन सिंदूर उसका एक लघु रूप भर था. मेरा अनुमान है कि चीन या पाकिस्तान से अगले युद्ध में ड्रोन युद्ध का ही बोलबाला रहेगा, तब हमारी सेना को कमजोर नहीं साबित होना चाहिए.
लेफ्टिनेंट जनरल एच. एस. पनाग (सेवानिवृत्त), पीवीएसएम, एवीएसएम, ने 40 साल तक भारतीय सेना में सेवा की. वे उत्तरी कमान और केंद्रीय कमान के कमांडर रहे. रिटायरमेंट के बाद, उन्होंने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में सदस्य के रूप में काम किया. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.
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