(यह खबर ‘पीटीआई-भाषा’ और गांव कनेक्शन द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई, तस्वीर के साथ)
भुवनेश्वर, 14 अप्रैल (भाषा) सबिता मोहंती अतीत में घर और खेत का काम पूरा करने के बाद खाली बैठी रहती थीं। लेकिन अब स्थिति बदल गई है वह अपने समुदाय की साथी महिला मुर्गीपालकों द्वारा मदद के लिए फोन करने के लिए हरपल तैयार रहती हैं। यह ओडिशा के गांवों में आ रहे सकारात्मक बदलाव के संकेत हैं।
एक समय था जब मयूरभंज जिले के मिटुआनी गांव की रहने वाली मोहंती केवल साधारण गृहणी थीं लेकिन आज उनकी एक नई पहचान है। वह 200 सामुदायिक कृषि -पुशपालन उद्यमियों या आसपास ऐसी महिलाओं के लिए प्रयुक्त लोकप्रिय उपनाम ‘केव दीदियों’ में से एक हैं। उन्होंने मुर्गी पालन में लगी महिलाओं को महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करके राज्य के क्योंझर और मयूरभंज जिलों के गांवों में जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाया है।
मोहंती (37) ने 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई की है और अब उन्हें न केवल एक नई पहचान मिली है, बल्कि जीवन में उद्देश्य और सशक्तिकरण की भावना भी जगी है।
मोहंती ने गांव कनेक्शन से कहा, ‘‘मुर्गी पालन हमेशा से हमारे समुदाय का हिस्सा रहा है, लेकिन शुरू में जागरूकता सीमित थी। जब सम्मानित व्यक्तियों ने हमारे गांव का दौरा किया और सुझाव दिया कि मैं ‘केव दीदी’ बन सकती हूं, दूसरों की सहायता कर सकती हूं, तब मुझे बदलाव लाने की ताकत महसूस हुई।’’
सबिता इस समय न केवल 80 से अधिक मुर्गियों की देखरेख करती हैं बल्कि दूसरों की मुर्गियों की भी देखभाल करती हैं।
इस परिवर्तनकारी कदम को हेफ़र इंटरनेशनल की ओर से कार्यान्वित हैचिंग होप ग्लोबल इनिशिएटिव द्वारा बढ़ावा दिया गया। इसका उद्देश्य मुर्गीपालन में शामिल आदिवासी महिलाओं और किसानों का उत्थान करना है।
क्योंझर और मयूरभंज जिलों के गांवों में काम करने वाली समर्पित दीदियां मुर्गीपालन कर रही महिलाओं के रोजमर्रा के जीवन में सकारात्मक बदलाव कर रही हैं।
मोहंती की तरह ही मिटुआनी गांव की जयंती महतो भी हैं जो आजीविका के लिए मुर्गियां पालते हैं। पहले, उनकी मुर्गियां अक्सर बीमार पड़ जाती थीं जिसकी वजह से उन्हें आर्थिक क्षति पहुंचती थी। हालांकि,अब मुर्गी पालन करने वाली दीदियां हमेशा मदद के लिए उपलब्ध रहती हैं।
जयंती (32) ने कहा, ‘‘अब, जब भी मुर्गियां बीमार पड़ती हैं, तो एक फोन कॉल दीदी को हमारी सहायता के लिए ले आता है। वे हमें बहुमूल्य जानकारी प्रदान करती हैं।’’
नवंबर 2018 में मयूरभंज जिले में शुरू की गई, हैचिंग होप पहल का उद्देश्य घर में मुर्गी पालन और पोल्ट्री उत्पादों की खपत को बढ़ावा देकर पोषण और आय के स्तर को बढ़ावा देना है।
समृद्ध प्रोटीन स्रोतों के रूप में चिकन और अंडे की सामर्थ्य और पहुंच को पहचानते हुए हैचिंग होप ग्लोबल इनिशिएटिव ने दुनिया भर में एक महत्वपूर्ण कार्य किया। इस पहल को विशेष रूप से केव दीदियों के अमूल्य समर्थन से लाभ मिल है, जो मुर्गीपालन के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और टीकाकरण प्रदान करते हैं।
इस परियोजना ने पिछले पांच वर्षों में अंडा उत्पादन में 33.31 प्रतिशत की वृद्धि में योगदान दिया है, जिससे क्षेत्र में प्रोटीन स्रोतों की उपलब्धता पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है।
ओडिशा में हैचिंग होप के राज्य समन्वयक अक्षय बिस्वाल ने गांव कनेक्शन को बताया, ‘‘2018 में शुरू की गई यह परियोजना तीन साल से चल रही है, जिससे ओडिशा में लगभग 30,000 आदिवासी परिवारों को लाभ हुआ है।’’
भाषा धीरज रंजन
रंजन
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
