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Thursday, 9 April, 2026
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जलवायु अभियांत्रिकी से राष्ट्रीय सुरक्षा को जोखिम- फिर भी भीष्ण गर्मी से जूझ रहे देश आजमा सकते

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(बेन क्रैवित्ज, इंडियाना विश्वविद्यालय तथा टायलर फेलजेनहॉयर, ड्यूक विश्वविद्यालय)

ब्लूमिंगटन/डरहम, सात अप्रैल (द कन्वरसेशन) ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौता विकासशील देशों की ओर से दिए गए मंत्र‘‘जीने के लिए 1.5 डिग्री पर सीमित’’ से शुरू हुआ। इसका तात्पर्य जलवायु परिवर्तन से रोकने के लिए वैश्विक तापमान में वृद्धि को औद्योगिक पूर्व काल की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य से है। लेकिन दुनिया संभवत: एक ही दशक में इस तय सीमा को पार कर जायेगी तथा ग्लोबल वार्मिंग की गति मद्धिम होने के बहुत कम संकेत दिख रहे हैं।

तापमान बढ़ने के साथ दुनिया पहले से ही बहुत बड़ी प्राकृतिक आपादाओं का सामना कर रही है। तापमान के रिकॉर्ड लगातार टूट रहे हैं। जंगलों में आग की स्थिति भयंकर हो रही है। समुद्री तूफान की ताकत बढ़ रही है। समुद्र का स्तर बढ़ने से कई द्वीपीय देश एवं तटीय क्षेत्र धीरे-धीरे जलमग्न हो रहे हैं।

इस तापमान वृद्धि को शीघ्र रोकने का एकमात्र ज्ञात समर्थ उपाय जलवायु अभियांत्रिकी है। (कभी-कभी इसे भू अभियांत्रिकी, सौर प्रकाश उपशमन प्रविधियां या सौर जलवायु हस्तक्षेप कहा जाता है।) यह जलवायु में जानबूझकर बदलाव करने के लिए प्रस्तावित कार्यों/कदमों की सूची है।

इन कदमों में वायुमंडल में बड़ी मात्रा में परावर्तक कण डालकर, या समुद्र के ऊपर निचले बादलों को प्रकाशमान बनाकर बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों के प्रशीतन प्रभावों की नकल करना शामिल है। दोनों रणनीतियां ग्रह को ठंडा करने के लिए सूर्य के प्रकाश की थोड़ी मात्रा को वापस अंतरिक्ष में प्रतिबिंबित करेंगी।

हालांकि जलवायु में जानबूझकर बदलाव करने के प्रभावों के बारे में कई अनुत्तरित प्रश्न हैं तथा इस बात पर कोई सर्वसम्मति नहीं है कि क्या यह पता करना एक अच्छा विचार है।

जब जलवायु परिवर्तन की बात आती है तो कई देशों के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में एक राष्ट्रीय सुरक्षा है। उसका मतलब युद्ध नहीं है। जलवायु जनित प्रवासन की भांति ही खाद्य, ऊर्जा और जलापूर्ति जोखिम राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे हैं।

क्या जलवायु परिवर्तन अभियांत्रिकी जलवायु परिवर्तन के राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों को घटाने में मदद कर सकती है या फिर, क्या यह चीजों को और बदतर बनायेगी। उस प्रश्न का उत्तर दे पाना सरल नहीं है लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं राष्ट्रीय सुरक्षा का अध्ययन करने वाले अनुसंधानकर्ता चाहते हैं कि हमें सामने आने वाले जोखिमों की समझ हो।

जलवायु परिवर्तन की विशाल समस्या

यह समझने के लिए कि जलवायु अभियांत्रिकी भविष्य में कैसी नजर आ सकती है, सबसे पहले हमें यह चर्चा करनी होगी कि कोई देश क्यों इसे आजमाना चाहेगा। औद्योगिक क्रांति के समय से इंसानों ने बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन जलाकर वायुमंडल में करीब 1740 अरब टन कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ी है। यह कार्बन डाई ऑक्साइड उष्मा को शोषित करती है और ग्रह (धरती को) को गर्म करती है।

जो सबसे महत्वपूर्ण बातें हम कर सकते हैं, उनमें एक है कि वायुमंडल में कार्बन डाइ ऑक्साइड छोड़ना बंद कर दें। लेकिन उससे स्थिति शीघ्र बेहतर नहीं होगी क्योंकि कार्बन सदियों तक वायुमंडल में रहता है। उत्सर्जन घटाने से बस यह होगा कि चीजें बदतर नहीं होंगी।

विभिन्न देश वायुमंडल से कार्बन डाइ ऑक्साइड वापस सोख सकते हैं और उत्सर्जन बंद कर सकते हैं, इस प्रक्रिया को कार्बन डाइ ऑक्साइड निष्कासन प्रक्रिया कहा जाता है। फिलहाल, पेड़ लगाने और वायु अभिग्रहण उपकरणों समेत कार्बन डाइ ऑक्साइड निष्कासन परियोजनाएं हर साल वायुमंडल से करीब दो अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड वापस सोखती हैं।

हालांकि, इंसान फिलहाल जीवाश्म ईंधन उपयोग एवं उद्योगों के मार्फत हर साल वायुमंडल में 37 अरब टन से अधिक कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जित कर रहे हैं। वायुमंडल में जबतक कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन वहां से अवशोषण की गयी कार्बन डाइ ऑक्साइड से अधिक रहेगा तबतक, सूखा, बाढ़ , समुद्री तूफान, लू, समुद्र तल में वृद्धि की स्थिति, जो जलवायु परिवर्तन के अन्य कई परिणामों में शामिल है, बदतर होती रहेगी।

‘‘शुद्ध शून्य’ उत्सर्जन तक पहुंचने में लंबा वक्त लग सकता है, यह एक ऐसी स्थिति है जहां इंसान वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैस सांद्रता नहीं बढ़ा रहे हों। जलवायु अभियांत्रिक अंतरिम तौर पर मदद कर सकती है।

कौन अभियांत्रिकी को आजमा सकता है और कैसे?

विभिन्न सरकारी अनुसंधान संस्थाएं पहले ही परिदृश्य को आजमा रही हैं और यह देख रही हैं कि कौन जलवायु अभियांत्रिकी का निर्णय ले सकता है और कैसे।

उम्मीद है कि जलवायु अभियांत्रिकी ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को खत्म करने की लागत की तुलना में सस्ती हो सकती है। लेकिन हर साल समतापमंडल में भारी मात्रा में परावर्तक कणों को ले जाने में सक्षम विमानों के बेडे के विकास एवं निर्माण में अब भी अरबों अमेरिकी डॉलर की लागत आएगी और सालों लगेंगे। कोई अरबपति, जो ऐसे उपक्रम पर विचार करेगा, शीघ्र ही पैसे की कमी से जूझने लगेगा, भले ही विज्ञान कल्पना कोई सुझाव दे।

हालांकि, जलवायु परिवर्तन के नुकसान को देख कोई एक देश या देशों का समूह लागत और भू-राजनीतिक गणना कर सकता है और अपने दम पर जलवायु अभियांत्रिकी शुरू करने का निर्णय ले सकता है।

पड़ोसियों के लिए जोखिम पैदा करने से संघर्ष की आशंका बढ़ जाती है।

जलवायु की समस्या राष्ट्रीय सीमाओं से नहीं बंधी हुई है। इसलिए, एक देश की जलवायु अभियांत्रिकी परियोजना से पड़ोसी देशों में तापमान और वर्षा प्रभावित हो सकती है। यह फसलों, जल आपूर्ति और बाढ़ के खतरे के लिए अच्छा या बुरा हो सकता है। इसके व्यापक अनपेक्षित परिणाम भी हो सकते हैं।

कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन की तुलना में मध्यम मात्रा में जलवायु अभियांत्रिकी के व्यापक लाभ होने की संभावना है। लेकिन हर देश पर एक जैसा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

एक बार जब जलवायु अभियांत्रिकी का इस्तेमाल किया जाता है, तो सबूतों की परवाह किए बिना, देशों में तूफान, बाढ़ और सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाओं के लिए जलवायु अभियांत्रिकी को दोषी ठहराने की आशंका बढ़ सकती है।

जलवायु अभियांत्रिकी देशों के बीच संघर्ष को जन्म दे सकती है, जिससे प्रतिबंध और मुआवजे की मांग हो सकती है। जलवायु परिवर्तन सबसे गरीब क्षेत्रों को नुकसान के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील बना सकता है, और जलवायु अभियांत्रिकी को उस नुकसान को नहीं बढ़ाना चाहिए। कुछ देशों को जलवायु अभियांत्रिकी से लाभ होगा और इस प्रकार वे भू-राजनीतिक संघर्ष के प्रति अधिक लचीले होंगे, और कुछ को नुकसान होगा और इस प्रकार वे अधिक असुरक्षित हो जाएंगे।

द कन्वरसेशन राजकुमार धीरज

धीरज

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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