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Friday, 3 April, 2026
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न्यायालय ने केंद्र के पास कॉलेजियम की 70 सिफारिशों के लंबित होने का मुद्दा उठाया

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नयी दिल्ली, 26 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को न्यायाधीशों की नियुक्ति में “देरी” पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि कॉलेजियम की 70 सिफारिशें बीते नवंबर से अब तक सरकार के पास अटकी हुई हैं और अटॉर्नी जनरल से इस मुद्दे को हल करने के लिए उनके कार्यालय का उपयोग करने को कहा।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ द्वारा मामला उठाए जाने के बाद अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए लंबित सिफारिशों पर निर्देश लेने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कौल ने वेंकटरमणी को बताया, “आज मैं चुप हूं क्योंकि अटॉर्नी जनरल ने बहुत कम समय मांगा है, अगली बार मैं चुप नहीं रहूंगा। इन मुद्दों का समाधान देखने के लिए अपने कार्यालय का उपयोग करें।”

वेंकटरमणी के निर्देश के लिए एक हफ्ते का समय मांगने पर न्यायमूर्ति कौल ने कहा, “मैंने बहुत कुछ कहने के बारे में सोचा था, लेकिन अटॉर्नी जनरल क्योंकि केवल सात दिन का समय मांग रहे हैं, इसलिए मैं खुद को रोक रहा हूं”

न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि न्यायपालिका सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को लाने की कोशिश करती है लेकिन लंबित मामलों के कारण जिन वकीलों के नाम न्यायाधीश बनाने के लिए अनुशंसित किए गए थे, उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से अच्छे उम्मीदवार न्यायाधीश बनने के लिए अपनी सहमति वापस लेते हैं वह “वास्तव में चिंताजनक” है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत नियमित अंतराल पर नियुक्ति प्रक्रिया की निगरानी करेगी।

कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति अतीत में उच्चतम न्यायालय और केंद्र के बीच टकराव की प्रमुख वजह बन गई है और इस तंत्र की विभिन्न क्षेत्रों से आलोचना हो रही है।

पीठ ने कहा, “पिछले सप्ताह तक 80 सिफारिशें लंबित थीं, जब 10 नामों को मंजूरी दी गई। अब, यह आंकड़ा 70 है, जिनमें से 26 सिफारिशें न्यायाधीशों के स्थानांतरण की हैं, सात सिफारिशें दोहराई गई हैं, नौ कॉलेजियम को वापस किए बिना लंबित हैं और एक मामला संवेदनशील उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का है।”

न्यायालय ने कहा कि ये सभी सिफारिशें पिछले साल नवंबर से लंबित हैं।

न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि लंबित सिफारिशों पर कोई ठोस कार्रवाई सात महीनों से नहीं हुई है और मामूली प्रक्रियागत कदम उठाने से यह काम हो जाते हैं।

शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति को देखने वाले उच्चतम न्यायालय का हिस्सा न्यायमूर्ति कौल ने कहा, “हमने चीजों को आगे बढ़ाने और बारीकी से निगरानी करने का प्रयास किया है। मैंने अटॉर्नी जनरल से कहा है कि हर 10-12 दिन में यह मामला उठाया जाएगा, ताकि मेरे पद छोड़ने (25 दिसंबर) से पहले पर्याप्त काम हो जाए।”

शीर्ष अदालत बेंगलुरु के एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 2021 के फैसले में अदालत द्वारा निर्धारित समय-सीमा का कथित तौर पर पालन नहीं करने के लिए केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय के खिलाफ अवमानना ​​कार्रवाई की मांग की गई थी।

सुनवाई के दौरान एक अन्य याचिकाकर्ता एनजीओ ‘कॉमन कॉज’ की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने सरकार के पास लंबित सिफारिशों से संबंधित एक चार्ट प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि एक समय में कॉलेजियम द्वारा नामों के एक बैच की सिफारिश किए जाने के बाद भी सरकार इसे अलग कर देती है और चुनिंदा नियुक्तियां करती है।

उन्होंने कहा, “इससे वकीलों का मनोबल प्रभावित होता है और मेरी जानकारी के अनुसार, उनमें से कई ने अपनी सहमति वापस ले ली है।”

न्यायमूर्ति कौल ने भूषण के विचारों से सहमति जताते हुए कहा कि नौ ऐसे नाम हैं, जहां सरकार ने नामों को वापस न करके लंबित रखा है।

न्यायमूर्ति कौल ने इस मामले में आगे की सुनवाई नौ अक्टूबर को निर्धारित करते हुए कहा, “इस बात से सहमत हूं कि जिस तरह से अच्छे उम्मीदवार न्यायाधीश बनने के लिए अपनी सहमति वापस लेते हैं वह वाकई चिंताजनक है। हम सर्वोत्तम प्रतिभाओं को लाने का प्रयास करते हैं, लेकिन मामला लंबित होने के कारण जिन वकीलों के नाम न्यायाधीश बनाने के लिए अनुशंसित किए गए थे, उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया है।”

भाषा प्रशांत माधव

माधव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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