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Friday, 1 May, 2026
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फर्जी खबरों के खिलाफ आईटी नियम पर अदालत ने कहा: यदि कानून का प्रभाव असंवैधानिक तो उसे हटाना ही होगा

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मुंबई, छह जुलाई (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि नियम बनाते समय मंशा कितनी भी अच्छी क्यों न हो, अगर किसी नियम या कानून का प्रभाव असंवैधानिक है तो उसे हटाना ही होगा।

न्यायमूर्ति गौतम पटेल और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि केंद्र सरकार इस बात पर चुप है कि फर्जी खबरों की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में संशोधन की अब जरूरत क्यों है।

पीठ ने हाल ही में संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। संशोधित नियमों के तहत, केंद्र को सोशल मीडिया में सरकार के खिलाफ फर्जी खबरों (फेक न्यूज) की पहचान करने का अधिकार है।

हास्य कलाकार कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स ने संशोधित नियमों के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर करते हुए उन्हें मनमाना, असंवैधानिक बताया था। याचिकाओं में दलील दी गई है कि संशोधित नियमों का नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर ‘खतरनाक प्रभाव’ होगा।

कामरा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नवरोज सीरवई ने बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान कहा कि संशोधित नियम के जरिये केंद्र सरकार यह कहना चाहती है कि ‘‘मेरी बात मान लें, अन्यथा दफा हो जाएं।’’

उन्होंने कहा, ‘सरकार कह रही है कि वह सुनिश्चित करेगी कि सोशल मीडिया में वही चीज आए जो सरकार चाहती है और जिसे वह (सरकार) सच मानती है…।’’ उन्होंने कहा कि सरकार जनता के लिए माता-पिता या अभिभावकों की भूमिका निभाना चाहती है।

सीरवई ने कहा, ‘‘अपने नागरिकों की बुद्धिमत्ता को लेकर सरकार की इतनी निम्न राय क्यों है कि उनके साथ अभिभावक जैसा व्यवहार किया जाए। क्या सरकार को जनता पर इतना कम भरोसा है कि उसे अभिभावक की भूमिका निभानी पड़ रही है।’’

उन्होंने कहा कि संशोधित नियम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं और अदालत को विचार करना चाहिए कि क्या इसके प्रभाव असंवैधानिक हैं।

इस पर न्यायामूर्ति पटेल ने कहा, ”मंशा कितनी भी अच्छी क्यों न हो, अगर प्रभाव असंवैधानिक होंगे तो इसे हटाना ही होगा।”

पीठ ने कहा कि पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) लंबे समय से फर्जी खबरों पर नजर रख रहा है, जैसा कि केंद्र सरकार ने स्वीकार किया है।

न्यायमूर्ति पटेल ने कहा, “जब कभी पीआईबी कोई स्पष्टीकरण जारी करता है, तो हर समाचार चैनल और समाचार पत्र उसे प्रसारित करता है। हमें केंद्र से कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला कि इस ढांचे को बदलने की अब जरूरत क्यों है। यदि यह ढांचा अच्छी तरह से काम कर रहा था, तो इसमें संशोधन की आवश्यकता क्यों है? हम यही जानना चाहते हैं, लेकिन केंद्र द्वारा दायर हलफनामा में इसका कोई उल्लेख नहीं है।’’

पीठ ने कहा कि ‘‘प्रिंट’’ के दिनों में इसकी आवश्यकता नहीं होती थी। न्यायमूर्ति पटेल ने कहा, ‘‘प्रौद्योगिकी और इंटरनेट की ताकत और उनकी पहुंच कल्पनातीत है। सरकार इंटरनेट के बिना काम नहीं कर सकती, क्योंकि यहीं से वे अपना काम करते हैं, लेकिन यह अपनी सीमाओं के साथ है। यह किसी अज्ञात भय की तरह है।’’

केंद्र सरकार ने इस साल छह अप्रैल को, सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 में कुछ संशोधनों की घोषणा की थी, जिनमें सरकार से संबंधित फर्जी, गलत या गुमराह करने वाली ऑनलाइन सामग्री की पहचान के लिए तथ्यान्वेषी इकाई का प्रावधान भी शामिल हैं।

इन तीन याचिकाओं में अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह संशोधित नियमों को असंवैधानिक घोषित कर दे और सरकार को नियमों के तहत किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई से रोकने का निर्देश दे।

केंद्र सरकार ने इससे पहले अदालत को आश्वासन दिया था कि वह 10 जुलाई तक तथ्यान्वेषी इकाई को अधिसूचित नहीं करेगी।

भाषा अविनाश सुरेश

सुरेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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