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Friday, 1 May, 2026
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उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को रखा बरकरार

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नयी दिल्ली, छह जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने विदेश यात्रा के लिए किसी अजनबी से होटल बुकिंग स्वीकार करने पर दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा (डीएचजेएस) के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है।

न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने बर्खास्त न्यायिक अधिकारी द्वारा बर्खास्तगी आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करने के उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से मना कर दिया।

पीठ ने कहा, “हमें विचारणीय निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई वैध कारण नहीं मिला और इसलिए, विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है।”

न्यायिक अधिकारी ने उच्च न्यायालय के 23 मार्च के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि लगाए गए जुर्माने में कमी करने और नरमी बरतने का कोई मामला नहीं बनता है। उसने कहा कि याचिकाकर्ता के न्यायिक अधिकारी के पद पर होने की बात को विचार करते हुए, एक “अजनबी” से एहसान के रूप में धन स्वीकार करने का आरोप अपने आप में “गंभीर” है और लगाया गया जुर्माना आरोप के “अनुरूप” है।

उच्च न्यायालय ने कहा, “हमें क्षमा करें लगाए गए जुर्माने में कमी करने के लिए नरमी बरतने का कोई मामला नहीं बनता है। इस अदालत द्वारा हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं होने की बात को मानते हुए, वर्तमान याचिका कानून और/या तथ्यों की दृष्टि से विचारणीय नहीं है। तदनुसार, तथ्यात्मक तानेबाने/पहलुओं पर गौर करने की कोई आवश्यकता नहीं है और वर्तमान रिट याचिका में कोई योग्यता नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है…।”

उच्चतम न्यायालय का आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्ण अदालत के फैसले के बाद नवंबर 2021 में सेवा से बर्खास्तगी के दंड को चुनौती देने वाली दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा (डीएचजेएस) के न्यायिक अधिकारी की याचिका पर आया। उन्होंने बर्खास्तगी आदेश को रद्द करने और पूर्ण दोषमुक्ति, बकाया राशि के अलावा सेवा की निरंतरता के अन्य परिणामी लाभों के साथ नौकरी बहाल करने का याचिका में अनुरोध किया था।

भाषा

प्रशांत माधव

माधव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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