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Tuesday, 24 March, 2026
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तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी से मुर्मू की मुलाकात से संथाली भाषा को संवैधानिक मान्यता सुनिश्चित हुई

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नयी दिल्ली, 20 जून (भाषा) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी मातृभाषा संथाली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए मनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस वक्त वह ओडिशा सरकार में मंत्री थीं। एक नई पुस्तक में यह जानकारी दी गई है।

मुर्मू मंगलवार को 65 साल की हो गईं। वह देश की दूसरी महिला और पहली आदिवासी राष्ट्रपति हैं। भुवनेश्वर निवासी एक पत्रकार संदीप साहू ने अपनी नयी पुस्तक ‘मैडम प्रेसीडेंट: द बायोग्रॉफी ऑफ द्रौपदी मुर्मू’ में लिखा कि संथाली को संवैधानिक मान्यता दिलाने के मामले की पैरवी करने के लिए मुर्मू ने अपनी तरह से प्रयास किया।

पुस्तक के मुताबिक मुर्मू ने इसके लिए सब कुछ किया, वह चाहे मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से इस बारे में कई बार बात करना रहा हो या फिर जनजातीय सलाहकार परिषद में संथाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए एक प्रस्ताव लाना रहा हो। जनजातीय सलाहकार परिषद की बैठक में यह प्रस्ताव पारित भी किया गया था।

पुस्तक में लिखा है कि ओडिशा में वर्ष 2000 से 2004 के दौरान बीजू जनता दल (बीजद) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गठबंधन सरकार में मंत्री रहीं मुर्मू के लिए इस दिशा में सबसे कारगर साबित हुई अटल बिहारी वाजपेयी से उनकी मुलाकात।

दरअसल मुर्मू ने महसूस किया कि संथाली भाषा के मामले को केंद्र सरकार में शीर्ष स्तर पर ध्यान में लाने की जरूरत है और इसके बाद वह बालासोर लोकसभा क्षेत्र से तीन बार के भाजपा सांसद एम खरवेला स्वैन से मिलीं और उनसे वाजपेयी से मुलाकात कराने का अनुरोध किया।

स्वैन और उनके निजी सचिव बिजय नायक के साथ वह वाजपेयी से मिलीं और उन्हें परिमल चंद्र मित्रा लिखित एक पुस्तक भेंट की जिसका नाम था-‘संथाली: द बेस ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज’।

एक साक्षात्कार में मुर्मू के एक बयान के हवाले से पुस्तक में लिखा है, ‘‘खरवेला भाई आपको धन्यवाद। हमें केवल 10 मिनट में प्रधानमंत्री से मिलने का समय मिल गया…। वाजपेयी जी ने पुस्तक के पन्नों को पलटा और फुसफुसाए कि ‘अच्छा’ है। जब मैंने उन्हें बताया कि ज्यादातर भारतीय भाषाओं के विपरीत संथाली में कोई मात्रा नहीं होती, तो वह बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि वह आठवीं अनुसूची में संथाली भाषा का समावेश सुनिश्चित करेंगे।’’

पुस्तक में बताया गया है कि इसके छह महीने बाद संथाली को संवैधानिक मान्यता मिल गई और इसे आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया।

वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संथाली को बोडो, डोगरी और मैथिली भाषा के साथ संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में ओडिशा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मिजोरम, झारखंड और बिहार में 70 लाख से अधिक लोग संथाली बोलते हैं, इसके अलावा बांग्लादेश, भूटान और नेपाल के भी कुछ हिस्सों में संथाली बोलने वाले लोग रहते हैं।

वर्ष 1925 में जनजातीय विद्वान पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा विकसित ओल चिकी लिपि संथाली के लिए आधिकारिक लेखन प्रणाली है।

भाषा संतोष ब्रजेन्द्र

ब्रजेन्द्र

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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