नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय में बृहस्पतिवार को एक जनहित याचिका दायर की गई जिसमें भारत के विधि आयोग को निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह उच्च न्यायालयों के परामर्श से न्यायिक शब्दावली, वाक्यांशों, अदालती शुल्क संरचना और मामले के पंजीकरण के लिए प्रक्रिया आदि को एक समान बनाते हुए समान न्यायिक संहिता पर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करे।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने कहा कि उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायिक शब्दावली, वाक्यांशों, न्यायालय शुल्क और मामला पंजीकरण प्रक्रिया में भारी अंतर पाया है।
उन्होंने कहा कि राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर और जोधपुर में दो पीठें हैं और दोनों पीठों में मामलों के प्रकार (शब्दावली) के संबंध में अलग-अलग विवरण हैं।
याचिका में कहा गया है कि यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि न्यायिक समानता संवैधानिक अधिकार का मामला है और अदालतों के अधिकार क्षेत्र के आधार पर इसमें अंतर संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या भारत के अंदर कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। वहीं अनुच्छेद 15 में कहा गया है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
जनहित याचिका में कहा गया है कि अलग-अलग राज्यों में अदालती शुल्क में अंतर के कारण जन्म स्थान और निवास स्थान के आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव होता है और यह ‘क्षेत्रवाद’ को बढ़ावा देता है, इसलिए यह अनुच्छेद 14 और 15 का साफ उल्लंघन है।
भाषा अविनाश नरेश
नरेश
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.