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Wednesday, 22 April, 2026
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न्यायालय ने अवमानना करने वाले को फटकार लगाई, कहा-आपने भरोसे को तोड़ा

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नयी दिल्ली, 12 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2004 से अमेरिका के निवासी और अपने बच्चे को भारत वापस लाने में विफल रहने के लिए दीवानी अवमानना के दोषी ठहराए गए शख्स से कहा कि उसने अदालत के ‘‘भरोसे को तोड़ा है’’ कि लोग विदेश यात्रा की अनुमति मिलने के बाद वापस आ जाएंगे।

सजा के मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति ए एस ओका की पीठ ने कहा कि उसे व्यक्ति के आचरण के कारण उस पर विश्वास नहीं है।

शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी के अपने आदेश में व्यक्ति को दीवानी अवमानना ​​का दोषी ठहराते हुए कहा था कि उस महिला द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका एक दुर्भाग्यपूर्ण वैवाहिक विवाद का परिणाम था, जिससे उसने 2007 में शादी की थी। महिला को उसके 12 साल के बेटे का संरक्षण देने से वंचित कर दिया गया जबकि वह 11 मई, 2022 के आदेश के अनुसार इसकी हकदार है।

बुधवार को सजा के पहलू पर दलीलें सुनते हुए पीठ ने व्यक्ति की ओर से पेश वकील से कहा, ‘‘ऐसी कई घटनाएं हुई जिससे साबित होता है कि आपके मुवक्किल ने भरोसे को तोड़ा।’’

पीठ ने कहा कि वह व्यक्ति भारत में अदालती कार्यवाही से दूर रहा और लगातार झूठ बोलता।’’ पीठ ने कहा, ‘‘विदेश जाने की अनुमति पर आपने (व्यक्ति) हमारे उस विश्वास को बहुत नुकसान पहुंचाया। किसी को विदेश जाने की अनुमति देने में हम अब बहुत सतर्क रहेंगे।’’

महिला की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि व्यक्ति ने चालबाजी की और जानबूझकर शीर्ष अदालत को गुमराह किया जिसने उसे बच्चे को अमेरिका ले जाने की अनुमति दी थी। व्यक्ति की तरफ से पेश वकील ने पीठ से आरोपी के प्रति उदारता दिखाने का आग्रह किया। पीठ ने कहा, ‘‘सजा के मुद्दे पर बहस पूरी हो गई। फैसला सुरक्षित रखा जाता है।’’

शीर्ष अदालत ने जनवरी में पारित अपने आदेश में कहा था कि पूर्व में हुए समझौते की शर्तों के अनुसार बच्चा, जो उस समय छठी कक्षा में था, अजमेर में ही रहेगा और 10वीं कक्षा तक की शिक्षा पूरी करेगा और इसके बाद, उसे अमेरिका स्थानांतरित कर दिया जाएगा जहां उसका पिता रह रहा है।

इस बात पर भी सहमति बनी थी कि जब तक बच्चा 10वीं तक की शिक्षा पूरी नहीं कर लेता, तब तक वह हर साल एक जून से 30 जून तक अपने पिता के साथ कनाडा और अमेरिका का भ्रमण करेगा।

पीठ ने जनवरी के अपने आदेश में कहा कि वह व्यक्ति पिछले साल सात जून को अजमेर आया था और अपने बेटे को कनाडा ले गया था लेकिन वह उसे भारत वापस लाने में विफल रहा। कनाडा में उस व्यक्ति की मां और बहन रह रही थीं।

शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला के मामले के मुताबिक, उसके बच्चे के जन्म के बाद व्यक्ति के कहने पर उसे और उसके बेटे, दोनों को कनाडा भेजा गया था।

महिला ने कहा कि जुलाई 2013 में, उसे और उसके बेटे को घर से बाहर निकाल दिया गया, जिससे वह अगस्त 2013 में भारत आने के लिए मजबूर हुई। शीर्ष अदालत ने कहा था कि व्यक्ति ने अपने बेटे का संरक्षण देने के लिए कनाडा की अदालत का रुख किया था और संरक्षण के संबंध में उसके पक्ष में आदेश पारित किया गया था।

पीठ ने यह भी कहा कि कनाडा की अदालत ने आदेश को लागू करने के लिए विभिन्न एजेंसियों और इंटरपोल को निर्देश जारी किए थे और महिला के खिलाफ भी एक वारंट जारी करने का आदेश दिया था। इसके बाद महिला ने याचिका दायर कर राजस्थान उच्च न्यायालय में बच्चे की पेशी की मांग की। बाद में, यह मामला शीर्ष अदालत पहुंचा और पिछले साल 11 मई को दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित और नोटरीकृत समझौते की शर्तों को रिकॉर्ड पर रखा गया।

भाषा आशीष अविनाश

अविनाश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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