नयी दिल्ली, चार अप्रैल (भाषा) प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) के सदस्य राकेश मोहन ने मंगलवार को कहा कि देश में लॉजिस्टिक लागत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 14 प्रतिशत होने का आधार उनकी समझ से परे है। यह महत्वपूर्ण है कि इसी लागत के आधार पर उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना जैसे सरकारी कार्यक्रम शुरू किये गये हैं।
आर्थिक शोध संस्थान इक्रियर (इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल एकोनॉमिक रिलेशंस) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन ने कहा कि वह यह समझने में असमर्थ हैं कि शोध संस्थान या शोधकर्ता आखिर कैसे 14 प्रतिशत लॉजिस्टिक लागत के आंकड़े पर पहुंचे।
रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर ने कहा, ‘‘आमतौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि भारत में लॉजिस्टिक लागत वैश्विक मानक के मुकाबले काफी ऊंची है। लेकिन मैं यह कभी समझ नहीं पाया कि इस आंकड़े का आधार क्या है…रिपोर्ट (इक्रियर रिपोर्ट) में हमेशा देश की लॉजिस्टिक लागत जीडीपी के 14 प्रतिशत पर होने की बात कही जाती है।’’
सरकार इस अनुमान को मानती है कि लॉजिस्टक लागत देश के जीडीपी के करीब 13 से 14 प्रतिशत है। इसके साथ सरकार ने उद्योग की प्रतिस्पर्धी बनाने और लॉजिस्टिक लागत में कमी लाने के लिये राष्ट्रीय लॉजिस्टिक नीति और पीएम गतिशक्ति पहल शुरू की है।
मोहन ने कहा, ‘‘यह समझ से बाहर है… सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण का हिस्सा 17 प्रतिशत है। यानी आप कह रहे हैं कि लॉजिस्टिक लागत देश में जोड़े गये विनिर्माण मूल्य के बराबर है…।’’
उन्होंने कहा कि देश की लॉजिस्टिक लागत जीडीपी के 14 प्रतिशत होने के आधार पर पीएलआई (उत्पादन आधारित प्रोत्साहन) योजना लाई गई है और उद्योग इसे पसंद कर रहे हैं।
पीएमईएसी के सदस्य ने कहा, ‘‘उद्योग जगत के लोग कहते हैं कि हम उच्च लॉजिस्टिक लागत के कारण प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। इसीलिए मुझे पैसा दीजिए। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि किसानों को पैसा मत दीजिए…।’’
उल्लेखनीय है कि सरकार ने कपड़ा, वाहन कलपुर्जा समेत 14 क्षेत्रों के लिये पीएलआई योजनाएं शुरू की हैं। इस योजना का मकसद घरेलू विनिर्माण को प्रतिस्पर्धी बनाना, विनिर्माण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अगुवा बनाना, निर्यात को बढ़ावा देना तथा रोजगार सृजित करना है।
उन्होंने कहा, ‘‘इन चीजों को लेकर गंभीरता से कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि इससे वास्तव में सरकारी पैसा खर्च होता है।’’
मोहन ने कहा कि आर्थिक शोध संस्थान एनसीएईआर (नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लायड इकनॉमिक रिसर्च ) की रिपोर्ट में 2017-18 में भारत की लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी के 8.8 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है। यह अन्य देशों की तुलना में अधिक नहीं है। यह रिपोर्ट 2019 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की लॉजिस्टिक इकाई को सौंपी गयी थी।
उन्होंने कहा,‘‘लेकिन कभी भी कोई इस रिपोर्ट का जिक्र नहीं करता। हम लगातार आर्थिक समीक्षा के आंकड़े को दोहराते हैं जो एनसीएईआर की 2017-18 की रिपोर्ट के बाद आई।’’
वित्त वर्ष 2022-23 की आर्थिक समीक्षा में देश में लॉजिस्टिक लागत जीडीपी के 14 से 18 प्रतिशत होने की बात कही गयी है। जबकि वैश्विक मानक आठ प्रतिशत है।
मोहन के अनुसार, यह सही है कि देश विनिर्माण और खासकर श्रम के अधिक उपयोग वाले उत्पादों के मामले में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं है।
उल्लेखनीय है कि पिछले महीने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने कहा था कि देश में लॉजिस्टक लागत के निर्धारण के लिये रूपरेखा तैयार के लिए कार्यबल बनाया जाएगा।
भाषा रमण अजय
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