नयी दिल्ली, 24 फरवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने अवमानना कार्यवाही का सामना कर रहे एक याचिकाकर्ता पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाते हुए कहा कि सुनवाई के दौरान व्यग्रता किसी न्यायाधीश पर आक्षेप लगाने को न्यायोचित नहीं ठहराती।
यह मामला एक आपराधिक मुकदमे में एक निचली अदालत की कार्यवाही से उत्पन्न हुआ, जहां वादकारी ने पीठासीन न्यायिक अधिकारी पर आक्षेप लगाये।
मामले के ‘न्याय मित्र’ ने कहा कि याचिकाकर्ता (प्रतिवादी) ने बिना शर्त माफी मांग ली है। उन्होंने आगे कहा कि प्रतिवादी ने दुर्भाग्य से अपनी एक अर्जी में असंयमित भाषा का इस्तेमाल किया था और संभव है कि प्रतिवादी व्यग्र हो सकते हैं तथा गलती कर सकते हैं।
गौरतलब है कि प्रतिवादी के पास कोई औपचारिक कानूनी शिक्षा नहीं है, फिर भी वह निचली अदालत के समक्ष अपने मामले की पैरवी खुद कर रहा था।
न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने हाल ही में जारी एक आदेश में कहा, ‘इस अदालत की राय है कि सुनवाई के दौरान प्रतिवादी ने जिस व्यग्रता का सामना किया था, उससे पीठासीन न्यायाधीश पर आक्षेप लगाने के उसके कार्यों को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह तथ्य कि प्रतिवादी अपने मामले में खुद बहस कर रहा था, पीठासीन न्यायाधीश के प्रति असम्मानजनक होने को उचित नहीं ठहरा सकता।’
अदालत ने जुर्माने की राशि दिल्ली उच्च न्यायालय कानूनी सेवा समिति के पास जमा करने का निर्देश दिया।
भाषा सुरेश माधव
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