नयी दिल्ली, 31 दिसंबर (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के अधिकारियों द्वारा धन के कथित गबन के एक मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के एक मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
साथ ही अदालत ने संबंधित पुलिस आयुक्त को निष्पक्ष, पारदर्शी और शीघ्र जांच सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
मजिस्ट्रेट अदालत के निर्देशों पर आपत्ति के लिए राज्य सरकार के दृष्टिकोण पर अप्रसन्नता जताते हुए, अदालत ने कहा, ‘‘यह समझ से परे है कि राज्य मामले को उजागर करने के प्रयास के प्रति इतना अनिच्छुक क्यों है।’’ अदालत एमसीडी के कोषाध्यक्ष कुलदीप सिंह की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने कहा था कि मजिस्ट्रेट अदालत का आदेश टिकाऊ नहीं है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने अपने हालिया आदेश में कहा, ‘‘आरोपों की भूलभुलैया में शामिल पेचीदगियों को ध्यान में रखते हुए, मुझे एक मई, 2019 के आदेश में कोई विसंगति नहीं मिली। पुनरीक्षण याचिका में कोई तथ्य नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।’’
अदालत ने कहा कि एमसीडी की पूर्व पार्षद शिकायतकर्ता गुड्डी देवी को सिविल लाइंस जोन में सार्वजनिक धन के गबन की कुछ घटनाओं के बारे में पता चला और उन्होंने वार्ड समिति तथा सदन के समक्ष इस मुद्दे को उठाया।
अदालत ने कहा कि एक ऑडिट कमेटी ने आरोपों की जांच की और पाया गया कि एमसीडी कर्मचारियों द्वारा लगभग 97.64 लाख रुपये का गबन किया गया तथा समिति की आपत्तियों के बाद सिंह ने लगभग 83.74 लाख रुपये जमा किए।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने कहा कि जब पुलिस कोई कार्रवाई शुरू करने में विफल रही, तो गुड्डी देवी ने मजिस्ट्रेट अदालत में शिकायत दर्ज की, जिसने तब संबंधित थाना प्रभारी को प्राथमिकी दर्ज करने और मामले की जांच करने का निर्देश दिया। अदालत के आदेश के खिलाफ, सिंह ने वर्तमान पुनरीक्षण याचिका दायर की।
मजिस्ट्रेट अदालत ने उन धाराओं का उल्लेख नहीं किया, जिनके तहत प्राथमिकी दर्ज की जानी थी, इस दलील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि यह वांछनीय था, लेकिन मजिस्ट्रेट अदालत के लिए धाराओं का उल्लेख करना अनिवार्य नहीं है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘जाहिर तौर पर, आरोप एमसीडी के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ हैं और मामला वर्ष 2017-2018 से संबंधित है, इसलिए, मुझे यह उचित लगता है कि इस मामले को दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों के ध्यान में लाया जाना चाहिए।’’
अदालत ने कहा, ‘‘सड़ांध को साफ करने के प्रयासों का समर्थन करने के बजाय सरकार ने ट्रायल कोर्ट के निर्देशों का विरोध करने के लिए एक विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया। सरकार का यह दृष्टिकोण वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है।’’
अदालत ने आदेश की एक प्रति संयुक्त पुलिस आयुक्त को भेजने का निर्देश दिया, जिसमें संबंधित पुलिस अधिकारियों की भूमिका समेत मामले में ‘‘निष्पक्ष, पारदर्शी और शीघ्र’’ जांच सुनिश्चित करने को कहा गया है।
भाषा आशीष दिलीप
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