(हर्षवर्धन प्रकाश)
इंदौर, 21 अगस्त (भाषा) मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के चार दशक पुराने सैलाना अभयारण्य में लगातार चौथे साल एक भी खरमोर (लेसर फ्लोरिकन) नहीं देखा गया है।
जानकारों के मुताबिक, इससे संकेत मिलता है कि दुनिया की सबसे ज्यादा संकटग्रस्त नस्लों में शामिल परिंदे के वजूद को लेकर खतरा और गहरा हो गया है।
मध्य प्रदेश में खरमोर को बचाने के लिए वर्षों से सक्रिय एक पक्षी विज्ञानी के अनुसार, सैलाना अभयारण्य के आसपास बड़ी तादाद में चल रही पवनचक्कियां खरमोर को उसके प्रजनन काल के इस पसंदीदा ठिकाने से दूर कर रही हैं।
पक्षी विज्ञानी अजय गड़ीकर ने रविवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “वर्ष 1983 में घोषित सैलाना अभयारण्य में लगातार चौथे साल एक भी खरमोर नहीं देखा गया है।”
उन्होंने कहा कि करीब 1,200 हेक्टेयर में फैले सैलाना अभयारण्य में मानसून की बारिश के बाद खरमोर के लिए ग्रासलैंड (एक से डेढ़ फीट ऊंची हरी घास वाले क्षेत्र) के रूप में कई प्राकृतिक बसेरे बन जाते हैं, बावजूद इसके वहां इस मेहमान परिंदे का न दिखाई देना बेहद चिंताजनक है।
गड़ीकर ने कहा, “मैं पिछले पांच साल के आकलन के हवाले से बोल सकता हूं कि सैलाना अभयारण्य के आसपास धड़ल्ले से शुरू हुई पवनचक्कियां खरमोर को अभयारण्य से दूर कर रही हैं।”
उन्होंने बताया कि खरमोर सामान्य रूप में उसी ऊंचाई पर उड़ता है, जिस ऊंचाई पर सैलाना अभयारण्य के आसपास पवनचक्कियां लगी हैं। उन्होंने कहा कि पवनचक्कियां चलते समय आवाज भी करती हैं, जिससे पूरी संभावना है कि शर्मीले और डरपोक स्वभाव का यह प्रवासी पक्षी इनसे दूर रहना ही बेहतर समझता हो।
रतलाम के वन मंडलाधिकारी (डीएफओ) डीएस डोडवे ने भी कहा कि सैलाना अभयारण्य से खरमोर के मोहभंग के पीछे पवनचक्कियां ‘बड़ा कारण’ हो सकती हैं, लेकिन इस सिलसिले में विस्तृत अनुसंधान की जरूरत है।
उन्होंने यह भी कहा, “सैलाना अभयारण्य में नीलगाय की आबादी पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है और ये वन्य जीव वहां हजारों की तादाद में हैं। लेकिन अब तक ऐसा कोई प्रामाणिक अध्ययन सामने नहीं आया है कि जहां नीलगाय होती हैं, वहां खरमोर अपना घोंसला नहीं बनाते हैं।”
डोडवे के मुताबिक, धार जिले के सरदारपुर अभयारण्य में इन दिनों खरमोर देखा गया है और उम्मीद है कि जल्द ही सैलाना अभयारण्य में भी यह मेहमान परिंदा नजर आएगा।
पक्षी विज्ञानी गड़ीकर के अनुसार, खरमोर अपने वार्षिक ‘हनीमून’ के तहत दक्षिण की ओर से मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में हर साल जुलाई-अगस्त में पहुंचते हैं और तीन-चार महीनों के लिए डेरा डालते हैं। उन्होंने बताया कि प्रजनन के बाद ये मेहमान परिंदे अनजान ठिकानों की ओर रवाना हो जाते हैं।
गड़ीकर ने बताया कि समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में 1,000 से भी कम खरमोर बचे हैं, जबकि 20 साल पहले इनकी तादाद 3,500 से ज्यादा हुआ करती थी।
भाषा
हर्ष पारुल
पारुल
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