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Friday, 24 April, 2026
होमदेश''अगर हमें बोलने ही नहीं दिया जाएगा तो हम तो सिर उठाएंगे'' : प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा

”अगर हमें बोलने ही नहीं दिया जाएगा तो हम तो सिर उठाएंगे” : प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा

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(संपादकीय सुधार के साथ रिपीट)

(आनन्‍द राय)

लखनऊ, 10 जुलाई (भाषा) सड़कों पर आने जाने वालों को रोक कर इस या उस संगठन की ओर से पर्चे बांटे जाने के दृश्य हमारे यहां आम हैं। लेकिन कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लोगों ने जब एक दुबली पतली कंधे पर अपना पर्स लटकाए बुजुर्ग महिला को इसी तरह पर्चे बांटते देखा तो उन्हें कुछ नया लगा। लोगों ने उनके वीडियो बनाए और देखते-देखते वीडियो वायरल हो गया। चाल में चुस्ती और व्यवहार में आत्मविश्वास से लबरेज यह महिला और कोई नहीं लखनऊ विश्वविघालय की 79 वर्षीय पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा हैं जो एक सामाजिक संस्था ‘सांझी दुनिया’ से जुड़ी हुई हैं।

लखनऊ विश्वविद्यालय में 40 वर्षों तक अध्यापन से जुड़ी रहीं प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा को यह पर्चा बांटने की जरूरत क्यों पड़ी ? ‘पीटीआई-भाषा’ के इस सवाल पर उन्‍होंने कहा ” जब जुबानें ज्यादा बंद करने की कोशिश की जाती है तो यह कसक ज्यादा पैनी होती है कि हम इसे खत्म करें। हमारे देश के सैकड़ों लोग जेल में हैं, सिर्फ इसलिए कि वे कहीं आदिवासियों की, कहीं दलितों की, कहीं गरीबों की और कहीं औरतों पर अत्याचार के खिलाफ पैरवी कर रहे थे।”

सरकार पर निशाना साधते हुए उन्‍होंने कहा ” सरकार हमारी बात सुने, हम उन्‍हें अपना पक्ष दें कि आप यहां गलत कर रहे हैं। आप (सरकार) हमें समझाइए हम आपकी बात सुनेंगे। हमारा किसी से वैमनस्य नहीं हैं, हम वैमनस्य में विश्वास नहीं रखते हैं लेकिन अगर हमें बोलने ही नहीं दिया जाएगा तो हम तो सिर उठाएंगे।”

प्रोफेसर वर्मा ने ‘साझी विरासत’ को बचाने का नारा देते हुए जो पर्चे बांटे उनमें 30 जून 1857 को लखनऊ के चिनहट में अंग्रेजों व आम जनता के बीच हुई लड़ाई के संदर्भ देते हुए जुल्म के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया गया है। ‘नफरत की लाठी तोड़ो, आपस में प्रेम करो देश प्रेमियों’ शीर्षक वाले इस पर्चे के आखिर में लिखा है ” हम जानते हैं इस दौर में देश का मौसम उदास है, मगर हम ये भी जानते हैं कि अगर हम सब हर निराशा या जुल्म को फेंक कर एक हो गये — तो हर ओर फिर से फूल खिला देंगे।”

उनके इस अभियान पर बहुतों ने उन्‍हें ‘सैल्यूट’ किया तो व्यापक आलोचना के साथ सवाल भी खड़े हुए, लेकिन इससे बेपरवाह प्रोफेसर वर्मा ने कहा कि पिछले कुछ सालों में यह परिदृश्य बढ़ा है कि अगर कोई जनता के हित में ऐसी बात कहता है जो सरकार को रास नहीं आ रही है तो कोई न कोई इल्जाम लगाकर उसे जेल भेज दिया जाता है। उन्होंने कहा, ”हम इसे लोकतंत्र के खिलाफ मानते हैं और इससे बड़ा कोई और जुल्म नहीं हो सकता है। इसी तरीके से धर्म के आधार पर वैमनस्य बढ़ा है। हम तो सीधे जनता को संदेश देना चाह रहे थे कि एकजुट होकर जनता की समस्याओं का हल निकालें, विभाजित होकर नहीं।”

उन्‍होंने कहा कि ‘जैसे हिंदू-मुसलमान, अमीर-गरीब सभी मिलजुलकर लड़े तो अंग्रेज हारे, उसी तरह जाति, धर्म, लिंग भेद और वैमनस्यता भूलकर सब मिलकर जनता की समस्‍याओं पर खड़े होंगे तो देश आगे बढ़ेगा।’

लखनऊ विश्वविद्यालय में चार दशक तक अध्यापन से जुड़ी रहीं प्रोफेसर वर्मा को सामाजिक आंदोलनों से जुड़े भी करीब इतना ही वक्त गुजर गया है। आपातकाल में वह कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलित रहीं तो महिलाओं से जुड़े एक मामले में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बयान के खिलाफ सड़क पर उतर कर आंदोलन किया। कई सामाजिक, राजनीतिक मुद़दों पर भी उनके प्रतिरोध का स्वर मुखर रहा है।

मैनपुरी में जन्मी प्रोफेसर वर्मा के पिता सरकारी चिकित्सक थे तो इसलिए उनका तबादला होता रहता था। हालांकि पिता ने मैनपुरी में मकान बनवा दिया था लेकिन उच्च शिक्षा के लिए रूपरेखा लखनऊ आ गईं और यहां छात्रावास में रहीं। लखनऊ विश्‍वविद्यालय में दर्शन शास्‍त्र की छात्रा रहीं और फिर यहीं दर्शन शास्‍त्र की प्रवक्ता और प्रोफेसर बनीं और करीब एक वर्ष के लिए उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति का भी दायित्व संभाला। भाई बहनों में सबसे छोटी प्रोफेसर वर्मा ने शादी नहीं की। इस बाबत पूछने पर उन्‍होंने कहा कि ”कुछ को मैं पसंद नहीं आई और कुछ —–।”

प्रोफेसर वर्मा ने कहा, ‘मैं अपनी संस्था के काम में मदद कर रही थी। पर्चा हमारी संस्था के दीपक ने लिखा और इसे लोगों के बीच बांटा गया।’

उन्‍होंने कहा, ” अंग्रेजी राज से देश की आजादी का 75वां वर्ष है और हर जगह उस आजादी का जश्‍न मनाया जा रहा है तो हम लोग भी लखनऊ में जिस तरह आजादी की लड़ाई हुई उस पर ज्‍यादा ध्‍यान देते हुए उसे याद करना चाह रहे थे। आज हमें देश की खातिर क्‍या करना है, इसकी बात करना चाह रहे थे। 1857 में लखनऊ में अंग्रेजों से खुला संघर्ष हुआ और उनमें से एक जगह यहां चिनहट थी जहां पर अंग्रेजों से एक मौलवी अहमदुल्लाह शाह और घमंडी सिंह ने आम जनता को साथ लेकर लड़ाई लड़ी और उस लड़ाई में अंग्रेज हार गये थे। पहली बार चिनहट में अंग्रेजों को हार मिली थी तो हम लोग उसका जश्‍न मना रहे थे।”

उन्‍होंने कहा, ”वह लड़ाई आज भी हमें कुछ संदेश देने को मजबूर करती है। आप नाम देखिए अहमदुल्लाह शाह और घमंडी सिंह, यह एक उदाहरण है और विस्तार से देखिए कि हिंदू मुसलमान सभी मिलजुलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे।”

पर्चा बांटने के बाद प्रोफेसर वर्मा सोशल मीडिया पर ट्रोल हुईं। ट्विटर पर उन्‍हें कम्‍युनिस्ट से लेकर सपाई ( समाजवादी पार्टी से जुड़े) होने का आरोप लगा। इन सवालों पर उन्‍होंने कहा कि ”कुछ लोग मुझे कम्‍युनिस्ट कहते हैं। मैंने तो मार्क्स को ठीक से पढ़ा ही नहीं लेकिन लोग अपने आप लेबल चिपकाते हैं। हमें खुद ही पता नहीं कि असली कम्‍युनिस्ट कौन होता है।”

प्रोफेसर वर्मा ने किसी भी दल का होने से इनकार करते हुए कहा, ”बंगाल में सिंगूर का मामला हुआ तो मैं उनके खिलाफ सबसे आगे थी। केरल में संविधान के खिलाफ बोलने वाले कम्‍युनिस्ट के खिलाफ मैंने आवाज उठाई। उदयपुर का कांड हुआ तो उसके खिलाफ सबसे पहले मैंने लिखा। पर अगर आपके मन में मैल भरा हो, आप यह चाहते हैं कि एक तरफ सांप्रदायिकता करें, दूसरी तरफ कोड़े मारते रहें तो आपको हमारी हर बात गलत लगेगी।”

उन्‍होंने कहा कि ”दरअसल, समस्या यह है कि लोग सामान्‍य व्‍यवहार चाहते ही नहीं है। यह नहीं चाहते कि हम कट्टर मुस्लिम के खिलाफ बोलें और कट्टर हिंदू के भी खिलाफ बोलें। एक चाहता है कि हम सिर्फ कट्टर हिंदू के खिलाफ बोंलें, कट्टर मुसलमान के खिलाफ बिलकुल चुप रहें। दूसरा ये चाहता है कि हम सिर्फ कट्टर मुस्लिम के ही खिलाफ बोलें।’’

प्रोफेसर वर्मा ने दावा किया, ” मैं संतुलित हूं, जो भी गलत बोलेगा उसके खिलाफ हूं, हर कट्टरपन, बेवकूफी और जुल्म के खिलाफ हूं। चाहे सपा करे, चाहे भाजपा करे, चाहे कांग्रेस करे। हमने आपातकाल में सरकार के खिलाफ पोस्टर लगाए हैं, आंदोलन किया है। मैंने कभी लाल टोपी नहीं पहनी। किसी पार्टी के लिए प्रतिबद्ध नहीं हूं।”

लखनऊ में विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार पूजा शुक्ला के पक्ष में चुनाव प्रचार करने के सवाल पर उन्‍होंने सफाई दी ”पूजा हमारी छात्रा रही है और वह कुछ बेहतर करने में लगी है, इसलिए हमने उसका प्रचार किया।”

प्रोफेसर वर्मा अपना सपना बताती हैं, ” मैं समतावादी समाज चाहती हूं। जाति, धर्म, क्षेत्र, बोली, पहनावे, खान पान के आधार पर भेद न हो और हमारा सपना ऐसे देश को देखना है।”

उन्‍होंने कहा कि ”इधर कुछ सालों में धर्म और जाति के आधार पर नफरत और वैमनस्य बढ़ा है, इसलिए देश में विभाजनकारी चेतना ज्यादा बढ़ी है और एक दूसरे के दुख दर्द को बांटने की चेतना खत्म होने के कगार पर दिखती है। यह चीज हमें कांटे की तरह चुभती है और हम सोचते हैं कि जितना दम बचा है लड़ा जाए।”

भाषा आनन्द वैभव

वैभव

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यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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