कोलकाता, 26 मई (भाषा) पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राज्यपाल की जगह प्रदेश के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति बनाने के प्रस्ताव को शिक्षाविदों की मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है।
राज्य के मंत्रिमंडल ने इस प्रस्ताव को विधानसभा में पेश करने की मंजूरी दे दी है।
कुछ शिक्षाविदों ने इस कदम को शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता का उल्लंघन बताया है जबकि कुछ अन्य शिक्षाविदों ने कहा कि यह विश्वविद्यालय प्रमुखों और सरकार के बीच बेहतर समन्वय को बढ़ावा देने में मदद करेगा।
प्रेसीडेंसी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अमल मुखोपाध्याय ने कहा कि यह निर्णय अनावश्यक था और इससे केवल उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्त स्थिति का क्षरण होगा। प्रेसीडेंसी कॉलेज अब एक विश्वविद्यालय बन चुका है।
मुखोपाध्याय ने कहा, ‘‘मुख्यमंत्री को कुलाधिपति बनाने का प्रयास एक राजनीतिक कदम के अलावा और कुछ नहीं है। इससे संस्थानों में अकादमिक माहौल खराब हो सकता है।’’
शिक्षाविद् पबित्रा सरकार ने कहा कि राज्यपाल सदियों से इस राज्य में विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति की जिम्मेदारियों को निभा रहे हैं और अब राज्य के मंत्रिमंडल ने इसे उलटने का फैसला किया है।
उन्होंने आश्चर्य जताते हुए कहा, ‘‘हम इस तरह के कदम के पीछे का कारण नहीं जानते हैं। क्या यह अकादमिक माहौल को बेहतर बनाने में मदद करेगा?’’
प्रसिद्ध इतिहासकार और भारतविद् नृसिंह प्रसाद भादुड़ी ने हालांकि इस फैसले का स्वागत किया है।
इतिहासकार ने कहा, ‘‘हर कोई जानता है कि मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल में अकादमिक विकास के बारे में चिंतित हैं। विश्वविद्यालयों के परिसरों में दिन-प्रतिदिन के मामलों पर पकड़ रखने वाले किसी व्यक्ति के लिए कुलाधिपति का पद संभालना उचित होगा।’’
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