मुंबई, 30 मार्च (भाषा) एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले के आरोपी शिक्षाविद आनंद तेलतुम्बड़े ने बुधवार को बंबई उच्च न्यायालय को बताया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने उन्हें प्रत्यक्ष रूप से हिंसा के किसी भी कृत्य के लिए जिम्मेदार ठहराए बिना ही आतंकवादी करार दे दिया है।
तेलतुम्बड़े के वकील मिहिर देसाई ने उच्च न्यायालय को बताया कि एनआईए ने इस मामले में अपने आरोप पत्र में दावा किया था कि तेलतुम्बड़े आतंकवादी संगठनों का हिस्सा था और उसने आतंकवादी गतिविधियों को उकसाया और बढ़ावा दिया था। जबकि आरोप पत्र में तेलतुम्बड़े पर हिंसा के किसी कृत्य को लेकर सीधे आरोप नहीं लगाया गया था।
देसाई ने न्यायमूर्ति एस बी शुक्रे और न्यायमूर्ति जी ए सनप की पीठ से कहा कि आतंकवादी कहे जाने के लिए हिंसा की कार्रवाई होनी चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता देसाई इस मामले में तेलतुम्बड़े की ओर से जमानत की मांग कर रहे थे।
मिहिर देसाई ने कहा, ‘‘यह मेरा तर्क है कि एक आतंकवादी गतिविधि में किसी प्रकार की हिंसा शामिल होती है। यह एनआईए के आरोप पत्र में भी नहीं है कि तेलतुम्बड़े किसी प्रकार की हिंसा में शामिल था। वैसी स्थिति में एनआईए यह नहीं कह सकती कि तेलतुम्बड़े एक आतंकवादी है।’’
देसाई ने आगे तर्क दिया कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), जिसके तहत तेलतुम्बड़े और उसके सह-आरोपियों को मामले में आरोपित किया गया है, उस कानून के तहत आरोपियों के लिए जमानत पाना आसान नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि लेकिन, उच्च न्यायालय को उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों को ध्यान में रखना चाहिए, जिनके मुताबिक एक आरोपी को बिना मुकदमे के लंबे समय तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जाना चाहिए।
देसाई ने कहा, ‘‘आनंद तेलतुम्बड़े ने भारत में जातियों के मुद्दे पर 16 किताबें लिखी हैं। वह 35 साल से नागरिक अधिकार आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं। वह अपने करियर में भी चरम पर पहुंच चुके हैं।’’
तेलतुम्बड़े की जमानत याचिका पर उच्च न्यायालय बृहस्पतिवार को सुनवाई करेगा।
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