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एक रैली के दौरान बीजेपी समर्थक झंडा ले जाते हुए प्रतीकात्मक तस्वीर | ब्लूमबर्ग
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नई दिल्ली: लोकसभा सीटों के लिहाज से देश के पांच सूबे महत्वपूर्ण हैं और इनमें लोकसभा की 249 सीटें आती हैं. क्षेत्रीय दलों से लेकर राष्ट्रीय दलों के लिए ये राज्य किसी पहेली से कम नहीं हैं. भाजपा के लिए यही वे पांच राज्य हैं जहां यदि उसने मैदान मार लिया तो दिल्ली का रास्ता दूर नहीं है.

लोकसभा चुनाव 2019 की तारीखें जैसे-जैसे नज़दीक आती जा रही हैं, वैसे-वैसे वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार की पुन:वापसी को लेकर राजनीतिक पंडितों ने गुणाभाग करने शुरू कर दिए हैं. 2014 में प्रचंड बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई मोदी सरकार ने पांच वर्षों में विकास की धारा को राष्ट्रवाद से जोड़कर विपक्ष के लिए परेशानी पैदा की है. यही कारण है कि आगामी लोकसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी का सामना करने के लिए विपक्षी दलों को अनमने गठबंधन तक करने पड़ रहे हैं. चूंकि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुज़रता है, इसलिए घोर विरोधी सपा यानी भतीजे ने- बसपा यानी बुआ के पांव छूकर भाजपा के खिलाफ गठबंधन कर साथ-साथ आ गए हैं.

पुराना रिकार्ड दोहराने की चुनौती

हालांकि बुआ-भतीजे की जोड़ी ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की पेशानी पर बल तो डाला है. उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 73 सीटें जिसमें अपना दल की दो सीटें शामिल हैं, जीतकर इतिहास रचने वाली पार्टी इस बार कम से कम 21 सीटों पर कमज़ोर पड़ रही है. कन्नौज, बदायूं, आज़मगढ़, मैनपुरी, बागपत, मुज़फ्फरनगर, हाथरस, मथुरा, आंबेडकर नगर, गौतमबुद्ध नगर, झांसी, इलाहाबाद, फूलपुर जैसे संसदीय क्षेत्रों में इस बार भाजपा की राह आसान नहीं रहने वाली है. भले ही कांग्रेस इस महागठबंधन का हिस्सा नहीं है फिर भी जातिगत आधार पर सपा और बसपा के साथ आने से भाजपा को नुकसान होना तय है. यह बात भाजपा समर्थित अन्य दल भी समझ रहे हैं इसलिए अब उन्होंने भी पार्टी पर दबाव डालकर अपनी सीटें बढ़ाने की मांग की हैं. इसके अलावा वर्तमान में जीते हुए सांसद भी पुन: टिकट प्राप्ती के लिए पार्टी पर दबाव बनाने लगे हैं.


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दल मिले मगर दिल नहीं

इसी तरह 48 लोकसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में भी शिवसेना से भाजपा का गठबंधन हो गया है, लेकिन शिवसेना के तेवरों में अभी-अभी भी वही तलखी बरकरार है. पार्टी के मुखपत्र सामना में आज भी राममंदिर मुद्दा, धारा 370 और 35ए को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा जाता है. हिंदुत्व की राजनीति के चलते दोनों दल भले ही साथ आ गए हों पर इनके दिल अभी भी नहीं मिले हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र में सीएम देवेंद्र फडणवीस की गठबंधन सरकार कि सियासी मजबूरियों ने कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, स्वाभिमानी शेतकारी संगठन जैसे मजबूत जनाधार वाले दलों को संजीवनी दे दी है. लोकसभा सीटों के लिहाज से देश का दूसरा सबसे बड़ा सूबा किसके साथ जाएगा यह कहना अभी मुश्किल है.

जनाधार बढ़ाने की चुनौती

इस चुनाव में भाजपा यदि किसी राज्य में अपनी बढ़त को लेकर आश्वस्त है तो वह है पश्चिम बंगाल. 2014 में मात्र दो सीटें जीतने वाली पार्टी अब 22 सीटों पर जीत की उम्मीद लगाए बैठी है. हालांकि यह इतना आसान भी नहीं दिखता क्योंकि राज्य में भले ही कांग्रेस और वामदलों का अस्तिव न के बराबर हो किंतु तृणमूल कांग्रेस आज भी वहां बड़ी ताकत बनी हुई है. पिछले पांच सालों में राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा को नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा है. इससे भी बढ़कर उन्होंने सीधे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हुए सीधी लड़ाई का रूख बनाए रखा है.

राज्य की 42 लोकसभा सीटों पर सबसे पहले प्रत्याशी घोषित करके भी ममता बनर्जी ने सभी को बैकफुट पर ढकेल दिया है. खास बात यह रही कि इन 42 प्रत्याशियों में से 41 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देकर सभी पार्टियों को अपनी रणनीति फिर से तैयार करने को मजबूर कर दिया है. भाजपा के साथ बंगाल में सबसे बड़ी दिक्क्त उसके संगठन का मजबूत न होना है. हालांकि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बंगाल में मैराथन रैलियां करके माहौल तो बनाया है पर यह वोट में तबदील होगा इसमें अभी संशय है.

जीतकर भी बहुत कुछ खोना पड़ा

यदि बिहार की बात की जाए तो 2014 में अपने दम पर 22 सीटें जीतने वाली भाजपा को बदली हुई परिस्थतियों में जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के साथ गठबंधन करने को मजबूर होना पड़ा है और कहीं न कहीं राज्य में भाजपा की स्थिति छोटे भाई की बनी हुई है. 2014 में मात्र दो सीटें जीतने वाली जदयू अब 17 सीटों पर यदि चुनाव लड़ रही है तो इसे नीतीश कुमार की जीत ही मानी जानी चाहिए.

बिहार में यदि आरजेडी, कांग्रेस, रालोसपा, वामदलों आदि का गठबंधन होता है तो लड़ाई द्विपक्षीय होने के साथ ही कठिन नजर आ रही है. बता दें कि पिछले दिनों दिल्ली में सभी राजनीतिक दलों की हुई बैठक के बाद नेताओं ने एक सुर में कहा कि अभी सीट बंटवारे को लेकर एक-दो और बैठकें करनी पड़ सकती हैं. वहीं मुज़फ्फरपुर रेप केस और धवस्त कानून व्यवस्था को लेकर नीतीश कुमार पहले से ही बैकफुट पर चल रहे हैं ऐसे में इसका सबसे अधिक नुकसान भाजपा को ही उठाना पड़ सकता है.


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पहली बार मज़बूती से कमल खिलाने का दावा

भाजपा के लिए हमेशा से अछूता रहा दक्षिण भारत भी इस बार पार्टी की प्राथमिकताओं में से एक है और इसी वजह से उसने तामिलनाडु में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीमके) के साथ गठबंधन किया है. जयललिता की मृत्यु के बाद एआईएडीएमके में दो फाड़ हो गई थी और उसे अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए मोदी के करिशमाई नेतृत्व की आवश्यकता थी. दूसरी ओर डीएमके और कांग्रेस के गठबंधन ने भी दोनों दलों को साथ आने पर मजबूर किया है.

हालांकि एआईएडीएमके में चल रही आपसी खींचतान से भाजपा अभी भी असमंजस में है और राज्य की 39 लोकसभा सीटों पर जीत को लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता. वहीं पार्टी कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन की वादा खिलाफी को लेकर मैदान में उतरेगी. पिछले लोकसभा चुनाव में यहां से भाजपा ने 17 सीटें हासिल की थीं. इस बार भी अपना ऐसा ही प्रदर्शन करने की तैयारी में जुटी हुई है.

परंपरागत हिंदी पट्टी राज्यों से इस बार उम्मीद कम

इन पांच बड़े राज्यों के अलावा भाजपा को इस बार अपने वोट बैंक रहे हिंदी पट्टी के राज्य मध्यप्रदेश में 29, राजस्थान में 25 और छत्तीसगढ़ में 11 इस बार पार्टी को पहले की अपेक्षा कम ही लग रही हैं. इन राज्यों में कुल 65 लोकसभा सीटे हैं. पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का यहां बेहद निराशाजनक प्रदर्शन रहा था. हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने तीनों राज्यों में दमदार वापसी की है.

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पार्टी ने अपने बल पर सरकार बनाई है. मध्य प्रदेश में निर्दलियों के समर्थन से सत्ता पर काबिज है. तीनों राज्यों में अभी लोगों का कांग्रेस के प्रति झुकाव प्रतीत हो रहा है. इससे चितिंत भाजपा लोकसभा चुनावों की तैयारी जोर-शोर से कर रही है. पार्टी को उम्मीद है कि राज्यों के लोकसभा चुनावों के परिणाम विधानसभा चुनाव में आए परिणामों से बिल्कुल अलग होंगे.

नार्थ ईस्ट से जागी उम्मीद, नागरिकता संशोधन ने खड़ी की परेशानी

हिंदी पट्टी के राज्यों में होने वाले नुकसान को देखते हुए भाजपा ने अपनी नज़र नार्थ ईस्ट के राज्यों पर बना रखी है. कांग्रेस का गढ़ रहे असम और पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में अब कांग्रेस सत्ता से लगभग बेदखल हो चुकी है. उन राज्यों में भाजपा अपने सहयोगी दलों के सहयोग से सरकार चला रही है. इन सातों राज्यों में 25 लोकसभा की सीटे हैं. पार्टी ने लोकसभा चुनाव में 21 सीटें हासिल करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन भाजपा के लिए नागरिकता संशोधन बिल 2016 उठा विवाद पार्टी के लिए मुसीबत बना हुआ है.

किसी हद तक पार्टी इस विवाद को अंदरूनी तौर पर थाम भी रही है. असम गण परिषद जैसी पार्टी जो साथ छोड़ चुकी थी वह लोकसभा में फिर से पार्टी के साथ जुड़ गई है. अन्य राज्यों में इसका विरोध था लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उसे पूरी तरह से दबा दिया है.


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पंजाब और हरियाणा में कड़ी टक्कर

हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में पंजाब में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की है. 2014 में पंजाब में भाजपा और शिरोमणी अकाली दल को छह सीटें हासिल हुई थी. वहीं कांग्रेस ने इस चुनाव में तीन और आम आदमी पार्टी ने चार सीटें हासिल की थीं. कांग्रेस ने राज्य में आप पार्टी से गठबंधन का इंकार कर दिया है. विधानसभा नतीजों से उत्साहित पार्टी अब लोकसभा में जोरदार तरीके से वापसी की उम्मीद लगाए बैठी है.

भाजपा अपने पुराने साथी शिरोमणी अकाली दल के साथ ही मैदान में उतर रही है. इस बार के चुनावों में भाजपा गठबंधन को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिलने की उम्मीद है. भाजपा के लिए हरियाणा में इस बार जातिगत गणित हावी दिखाई दे रहा है. हरियाणा का बड़ा वोट बैंक माने जाने वाले जाट किस पाले बैठेंगे और उन्हें मनाने के लिए पार्टी कौन सा कदम उठाएगी यह देखना रोमांचक होगा.

बता दें कि मोदी सरकार में अभी तक आरक्षण को लेकर किए गए आंदोलनों में जाट आंदोलन सबसे चर्चित आंदोलन रहा है. यहां पार्टी को पुराना प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है. यहां विपक्ष ने बेराज़गारी और कर्ज माफी को लेकर सत्ताधारी भाजपा को लेकर घेरा हुआ है.

छोटे राज्यों से अच्छे की उम्मीद बरकरार

पिछले चुनावों में भाजपा ने दिल्ली, हिमाचल और उत्तराखंड में उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया था. दिल्ली में दोबारा सात सीटें हासिल करने के लिए केंद्र सरकार की योजनाओं, विकास का सहारा है. पार्टी में आप और कांग्रेस के गठबंधन नहीं होने से उम्मीद जागी है. पार्टी उम्मीद जता रही है कि पांच सीटें दोबारा हासिल कर लेगी. कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि पार्टी कई सीटों पर पुराने सांसदों के टिकट काटने पर विचार कर रही है. वहीं पार्टी हिमाचल और उत्तराखंड से भी कांग्रेस से अच्छी स्थिति में है.

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए सीटों के लिहाज से पांच सूबे बहुत ही महत्वपूर्ण है. इसके अलावा पार्टी अपने हिंदी पट्टी वाले राज्यों में दोबारा दम-खम के साथ मैदान में उतर रही है. वहीं पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्यों से पार्टी में अच्छे परिणाम की आस जगी हुई है. 2014 का लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर लड़ा था और जीत हासिल की थी. 2019 लोकसभा चुनावों में पार्टी ने केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी के साथ एनडीए गठबंधन को रखा है और गठबंधन की बात कर रही है.

अबकी बार 300 पार और ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के नारे के साथ भाजपा पूरी जोर से मैदान में उतर तो रही है लेकिन अपने गठबंधन के साथियों को साथ दिखाने और खड़ा करने की बात भी कर रही है. यही नहीं भाजपा इस चुनाव में यह भी बता रही है कि अबकी बार उनके पास पहले से भी ज़्यादा गठबंधन के साथी हैं. जिस तरह भाजपा नेताओं ने एनडीए साथियों को इन पांच सालों में नज़रअंदाज़ किया था उससे लग रहा था कि भाजपा अकेली पड़ जायेगी. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में करारी हार के बाद भाजपा की नज़र गठबंधन के अपने साथियों पर पड़ी और उसे उनकी अहमियत समझ आ गई. जिसके मद्देनजर 2019 लोकसभा चुनाव भाजपा मैं नहीं हम की राजनीति कर रही है और अपने गठबंधन के साथियों को भी मनाकर साथ लाने में जुटी दिखाई दे रही है.


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