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Monday, 9 February, 2026
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जिनकी हम परवाह करते हैं यह सीमित हैं – लेकिन ‘नैतिक दायरे’ का विस्तार कैसे कर सकते हैं

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(जेम्स किर्बी, मनोविज्ञान में एसोसिएट प्रोफेसर, क्वींसलैंड विश्वविद्यालय और चार्ली क्रिमस्टन, मनोविज्ञान में व्याख्याता, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी)

ब्रिस्बेन, 29 जनवरी (द कन्वरसेशन) जीवन यापन की लागत का संकट, कोविड, जलवायु परिवर्तन और कई वैश्विक संघर्षों और शरणार्थी संकटों के बीच जब इन सबके कारण परेशान होने वाले लोगों के बारे में सोचते हैं, तो हम यह कैसे तय करें कि हमें अपनी करुणा को कहाँ निर्देशित करना है?

एक ऐसी दुनिया में जो तेजी से खंडित होती जा रही है, हम यह पता लगाना चाहते थे कि क्या लोग ‘‘हम’’ और ‘‘वह’’ के बीच विभाजन को पाट सकते हैं – दूसरों की मदद करने की इच्छा की भावना को बढ़ाने के लिए, जो आम तौर पर उनके ‘‘नैतिक दायरे’’ से परे होते हैं।

हमने पाया कि करुणा प्रशिक्षण की आश्चर्यजनक रूप से छोटी अवधि किसी व्यक्ति के उस निकटतम दायरे से परे लोगों की संख्या को बढ़ा सकती है, जिनकी वह परवाह करता है।

यह समझना कि हमारे लिए कौन सबसे अधिक मायने रखता है

सभी नैतिक संबंध समान नहीं होते हैं। यदि परेशान व्यक्ति हमारा बच्चा, हमारा साथी, हमारा दोस्त है, तो हम मदद करने के लिए तत्पर हैं। लेकिन जब किसी अनजान अजनबी, या ग्रह के दूसरी ओर के किसी व्यक्ति की पीड़ा का सामना करना पड़ता है, तो मदद करने की हमारी प्रेरणा कम हो जाती है।

थोड़ा और आगे बढ़ें तो, क्या होगा यदि पीड़ित व्यक्ति वास्तव में कोई ऐसा व्यक्ति था जिसे हम नापसंद करते थे, या यहां तक ​​​​कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने दूसरों को नुकसान पहुंचाया हो? तो क्या हम परवाह करेंगे?

पीटर सिंगर जैसे दार्शनिकों ने उन लोगों को संदर्भित करने के लिए लोकप्रिय शब्द ‘‘नैतिक चक्र’’ विकसित किया है जिन्हें हम अपनी चिंता के योग्य मानते हैं और जिन्हें हम नहीं मानते हैं। आम तौर पर हम पहले अपने परिवार और अंतर्समूह (जिस सामाजिक समूह से हम जुड़े हैं) की नैतिक ज़रूरतों को प्राथमिकता देते हैं, और हम उन लोगों की बहुत कम परवाह करते हैं जो हमसे अलग या दूर हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि हम समूहों को इस तरह से क्रमबद्ध करते हैं: परिवार/मित्र, अंतर्समूह, श्रद्धेय, कलंकित, बहिर्समूह, जानवर (उच्च भावना), पर्यावरण, जानवर (कम भावना), पौधे और खलनायक।

शोध से यह भी पता चलता है कि ऑस्ट्रेलिया नैतिक विस्तार के मामले में विशेष रूप से अच्छा नहीं है। 2022 के एक अध्ययन में, नैतिक विस्तार पैमाने (एमईएस) पर ऑस्ट्रेलिया 32वें स्थान पर है, जबकि कनाडा, फ्रांस और चीन जैसे देशों की रैंकिंग काफी ऊंची है।

लेकिन क्या हमारी नैतिक सीमाएँ तय हैं, या क्या हम नैतिक विस्तार की सीढ़ी पर आगे बढ़ सकते हैं? यह प्रश्न कि क्या दूसरों के प्रति हमारी नैतिक चिंता स्थिर है या शून्य है (अर्थात्, ‘‘किसी के लिए मेरी चिंता दूसरे की कीमत पर आती है’’) एक अनुभवजन्य प्रश्न है।

क्या हम अपने नैतिक दायरे का विस्तार कर सकते हैं?

जब हम अपने नैतिक दायरे को बढ़ाने के तरीकों के बारे में सोचते हैं, तो सहानुभूति और सचेतनता जैसी बातें दिमाग में आ सकती हैं। लेकिन हमारा काम दिखाता है कि किसी के नैतिक दायरे के आकार की भविष्यवाणी करने में करुणा दोनों की तुलना में अधिक मजबूत है।

हमारा काम यह भी दर्शाता है कि करुणा उन लोगों की मदद करने की हमारी इच्छा की भविष्यवाणी करती है जिन्हें हम नापसंद करते हैं। और अन्य शोध से पता चलता है कि करुणा प्रशिक्षण से किसी नापसंद व्यक्ति के प्रति निकटता की भावना बढ़ती है।

इस पर आधारित, हमारे नवीनतम शोध में पाया गया कि एक संक्षिप्त करुणा प्रशिक्षण हस्तक्षेप हमारे नैतिक विस्तार को बढ़ा सकता है।

इस अध्ययन में, 102 प्रतिभागियों को करुणा प्रशिक्षण पर दो घंटे की एक संक्षिप्त संगोष्ठी को पूरा करने के लिए यादृच्छिक रूप से या एक नियंत्रण समूह को सौंपा गया था जो संगोष्ठी में शामिल नहीं हुए थे।

सेमिनार में हमने करुणा को परिभाषित करने पर ध्यान केंद्रित किया। संदेश यह था: क्रोध, चिंता और उदासी जैसी चीजें सामान्य मानवीय भावनाएं हैं, लेकिन हमारी जिम्मेदारी है कि हम सीखें और अभ्यास करें कि इन भावनाओं के साथ सहायक तरीकों से कैसे काम किया जाए।

प्रतिभागियों को निर्देशित अभ्यास के ऑडियो प्रदान किए गए, जिन्हें सुनकर उनपर अमल जारी रखने के लिए उनके पास दो सप्ताह का समय था, इन ऑडियो में श्वास और कल्पना अभ्यासों के साथ-साथ ध्यान का एक संयोजन था।

करुणा ध्यान आम तौर पर एक निर्धारित संरचना का पालन करता है। हम किसी लक्ष्य के प्रति करुणा व्यक्त करने से शुरुआत करते हैं – जिसे हम पसंद करते हैं – लेकिन फिर इसका विस्तार अन्य लक्ष्यों तक होता है, जैसे अजनबी या नापसंद, जानवरों जैसे अन्य संवेदनशील प्राणियों और प्राकृतिक पर्यावरण के तत्वों, जैसे मूंगा चट्टानों या जंगलों तक।

हमने पाया कि कार्यक्रम के दो सप्ताह बाद, जिन प्रतिभागियों ने करुणा प्रशिक्षण पूरा कर लिया था, उनमें परिवार और समाज में सम्मानित समूहों (उदाहरण के लिए, दान कार्यकर्ता) के प्रति अधिक नैतिक विस्तार था।

तीन महीने के फॉलो-अप में, इन परिणामों में और सुधार हुआ। इस दौरान दूसरों के प्रति नैतिक चिंता बढ़ गई थी, जिसमें बाह्य समूह के सदस्यों (जैसे राजनीतिक विरोधियों), समाज के कलंकित सदस्यों, जानवरों, पौधों, पर्यावरण – और यहां तक ​​कि हमारे समाज के कथित ‘‘खलनायक’’ (उदाहरण के लिए, दोषी अपराधियों) भी शामिल थे।

इससे पता चलता है कि करुणा और नैतिक विस्तार का गहरा संबंध है। हम निश्चित रूप से नहीं जानते, लेकिन तीन महीने के बाद बेहतर परिणाम ऑडियो अभ्यास जारी रखने के कारण हो सकते हैं, या शायद ‘‘स्लीपर प्रभाव’’ के कारण हो सकते हैं – लोगों को अपना नैतिक दृष्टिकोण बदलने में समय लगता है।

एक आशापूर्ण भविष्य?

वर्ष 2024 बड़े विकल्पों से भरा है, जिसमें 4 अरब लोग इस बात पर वोट करने के पात्र हैं कि उनके देश का नेतृत्व किसे करना चाहिए।

चुनावी वर्ष अक्सर ‘‘हम’’ और ‘‘वह’’ के विभाजन में बदल जाते हैं, जिसमें ‘‘हम’’ जनता को लोगों और नीतियों के बीच चयन करना होता है, हमें उम्मीद है कि इससे हमारी दुनिया में सुधार होगा।

करुणा यह सुनिश्चित करने का एक तरीका प्रदान कर सकती है कि हम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ होने के जाल में न फँसें। हम सभी लोगों और संवेदनशील प्राणियों के लिए पीड़ा से मुक्त जीवन जीने के अधिकार को पहचान सकते हैं।

और अगर करुणा हमारे निर्णयों और कार्यों में हमारा मार्गदर्शन करने में मदद करती है, और यहां तक ​​कि हमारी नैतिक संवेदनाओं का विस्तार भी करती है, तो हम अपने सामने आने वाली कुछ बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में हो सकते हैं – और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि जो लोग सबसे अधिक पीड़ित हैं, वे पीछे न रह जाएं।

द कन्वरसेशन एकता एकता

एकता

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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