नई दिल्ली: शेख मुजीबुर रहमान की विरासत को मिटाने की एक और पहल के तहत, बांग्लादेश की सबसे बड़ी सार्वजनिक यूनिवर्सिटी ने अपने प्रसिद्ध हॉल का नाम मारे गए छात्र-कार्यकर्ता उस्मान हादी के नाम पर रखने का प्रस्ताव दिया है.
ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, ढाका यूनिवर्सिटी की सबसे बड़ी नीति-निर्माण संस्था, सिंडिकेट, ने नाम बदलने के फैसले को आगे बढ़ाया है और इसे मंजूरी के लिए सीनेट के पास भेज दिया है. उस्मान हादी, जो पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के मुखर आलोचक थे, उनकी दिसंबर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. यह घटना बांग्लादेश में चुनाव की तारीखों की घोषणा के एक दिन बाद हुई थी.
34-वर्षीय हादी ने ‘इंकिलाब मंचो’ नाम से एक मंच की स्थापना की थी और वह ढाका से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाले थे. उनकी हत्या के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिनका निशाना खास तौर पर भारतीय राजनयिक मिशन बने. आरोप लगे कि हत्यारे पड़ोसी देश भाग गए.
पिछले एक साल में अगस्त में शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के बाद से, बांग्लादेश ने मुजीबुर के संदर्भों को हाइवे, एक्सप्रेसवे, छात्रावासों और यहां तक कि पाठ्यपुस्तकों के सिलेबस से भी हटा दिया है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिंडिकेट ने चार टीचर्स के खिलाफ आरोप तय किए हैं, जिन्हें “आवामी लीग के शिक्षक नेता” के रूप में जाना जाता था. सीनेट से इसके मंजूर होने की संभावना है. उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. रिपोर्ट में इसके कारण का उल्लेख नहीं किया गया है.
ढाका यूनिवर्सिटी के प्रॉक्टर सैफुद्दीन अहमद के हवाले से द डेली स्टार ने कहा, “उनके खिलाफ आरोप तय किए गए हैं और उनसे यह बताने को कहा जाएगा कि ये आरोप क्यों लगाए गए हैं और उन्हें बर्खास्त क्यों न किया जाए.”
उन्होंने कहा, “वे कारण बताओ नोटिस का जवाब देंगे और उसके आधार पर जांच आगे बढ़ेगी. उन्हें अभी बर्खास्त नहीं किया गया है, लेकिन बर्खास्तगी के लिए आरोप तय कर दिए गए हैं.”
पिछले साल सितंबर में ढाका यूनिवर्सिटी ने छात्र परिषद का चुनाव कराया—यह जुलाई में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के बाद पहला चुनाव था, जिसमें जमात समर्थित छात्र शिबिर ने जीत हासिल की. इससे पहले चुनाव 2019 में हुए थे.
नाम बदलने की होड़
जनवरी में ही मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने मुजीब के नाम पर रखे गए चार हाइवे और आठ पुलों के नाम बदल दिए थे.
ढाका–मावा हाइवे, जिसे पहले ‘फादर ऑफ द नेशन बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान एक्सप्रेसवे’ कहा जाता था, उसका नाम बदलकर ‘ढाका–मावा–भंगा एक्सप्रेसवे’ कर दिया गया. वहीं, सिलहट में स्थित ‘फादर ऑफ द नेशन बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान हाइवे’ का नाम बदलकर ‘एयरपोर्ट बायपास इंटरसेक्शन–लालबाग–सालुटीकर–कंपनीगंज–भोलागंज नेशनल हाइवे’ कर दिया गया.
पिछले साल जून में, अंतरिम सरकार ने कानून में संशोधन कर शेख मुजीबुर रहमान के लिए इस्तेमाल होने वाला ‘फादर ऑफ द नेशन’ का खिताब हटा दिया था. इसके बाद बैंक नोटों से भी मुजीबुर की तस्वीर हटाई गई, जिसकी जगह प्राकृतिक दृश्य और ऐतिहासिक स्थलों की तस्वीरें लगाई गईं.
संशोधित कानून के तहत, शेख मुजीबुर रहमान से जुड़े सभी संदर्भ हटा दिए गए हैं, जिनमें ‘फादर ऑफ द नेशन’ की उपाधि का इस्तेमाल भी शामिल है. मुक्ति संग्राम की परिभाषा में भी बदलाव किया गया है और इसे एक संप्रभु लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना के लिए सशस्त्र संघर्ष के रूप में बताया गया है, जिसमें मुजीबुर का कोई उल्लेख नहीं है.
इसके अलावा, मुजीब सरकार से जुड़े राष्ट्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ की बजाय ‘मुक्ति संग्राम के सहयोगी’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है. यह युद्ध की विरासत को कानून में परिभाषित करने के तरीके में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है.
इसके बाद दिसंबर में, देश ने राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तक बोर्ड (NCTB) में बदलाव किए और संशोधित पाठ्यपुस्तकों को ऑनलाइन अपलोड किया, जिनमें माध्यमिक स्तर की बांग्लादेश एवं ग्लोबल स्टडीज और बांग्ला की किताबों से शेख मुजीबुर रहमान के संदर्भ हटा दिए गए.
इनमें आठवीं क्लास की बांग्ला पाठ्यपुस्तक ‘साहित्य कनिका’ भी शामिल है, जिसमें पहले ‘एबारेर संग्राम स्वाधीनतार संग्राम’ शीर्षक के तहत शामिल मुजीबुर का 7 मार्च का भाषण हटा दिया गया. इसकी जगह ‘गण अभ्युत्थान’ (जन आंदोलन) नाम से एक नया अध्याय जोड़ा गया है.
छठी से आठवीं क्लास तक की पाठ्यपुस्तकों में भी इसी तरह के बदलाव किए गए हैं. उच्च माध्यमिक स्तर पर भी अंग्रेज़ी की पाठ्यपुस्तक से मुजीबुर के भाषण से जुड़ा एक पाठ हटा दिया गया है.
स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, ये बदलाव माध्यमिक और उच्च शिक्षा निदेशालय के निर्देशों के बाद किए गए, जिसमें शेख मुजीबुर रहमान से जुड़ी “बढ़ा-चढ़ाकर दी गई जानकारी” हटाने को कहा गया था.
हालांकि, 7 मार्च के भाषण को काफी हद तक हटा दिया गया है, लेकिन उससे जुड़ी तीन पंक्तियां आठवीं क्लास की बांग्लादेश एवं ग्लोबल स्टडीज की पाठ्यपुस्तक में एक अलग शीर्षक के तहत अब भी मौजूद हैं, जहां मुजीबुर का नाम ‘बंगबंधु’ उपाधि के बिना लिखा गया है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
