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Friday, 23 January, 2026
होमविदेशवह रात जब बांग्लादेश में प्रेस जला और लोकतंत्र की लौ डगमगाई, कैसे राख से उठे 2 बड़े अखबार

वह रात जब बांग्लादेश में प्रेस जला और लोकतंत्र की लौ डगमगाई, कैसे राख से उठे 2 बड़े अखबार

19 दिसंबर की सुबह बांग्लादेश बिना ‘प्रोथोम आलो’ के जागा. देश के दो सबसे प्रभावशाली अखबारों के दफ्तरों में आग लगाए जाने की उस रात पर संपादकों ने दिप्रिंट से बात की.

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नई दिल्ली: 19 दिसंबर 2025 वह पहली सुबह थी जब 27 साल में पहली बार ‘प्रोथोम आलो’ नहीं छपा. जिस देश को रोज़ अपने सबसे प्रभावशाली अखबार के साथ जागने की आदत है, वहां उसकी गैर-मौजूदगी खामोशी से भी ज्यादा भारी लगी.

दरअसल, बांग्लादेश के दो सबसे प्रभावशाली अखबारों—देश का प्रमुख अंग्रेज़ी अखबार द डेली स्टार और सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला बांग्ला अखबार प्रोथोम आलो—पर संगठित भीड़ ने आगजनी की. यह एक दुर्लभ पल था, जब देश की प्रेस खुद भीड़ की हिंसा का निशाना बनी.

द डेली स्टार के एडिटर-इन-चीफ महफूज़ अनाम ने कहा कि बांग्लादेश के 53 साल के इतिहास में किसी भी मीडिया संस्थान ने 18 दिसंबर जैसी आगज़नी कभी नहीं देखी.

जब द डेली स्टार के मुख्यालय के गलियारों में घातक धुआं भरने लगा, तो 26–27 स्टाफ सदस्य छत पर भाग गए और वहां रेस्क्यू होने का इंतज़ार करते रहे. सच तो यह है कि उन्हें लंबा इंतज़ार करना पड़ा. एक पत्रकार, ज़ायमा इस्लाम ने फेसबुक पर एक डरावना संदेश लिखा: “मैं सांस नहीं ले पा रही हूं, आप मुझे मार रहे हैं.”

नीचे सड़क पर फायर ब्रिगेड की गाड़ियां पहुंच चुकी थीं, लेकिन कई घंटों तक वे इमारत के पास नहीं जा सकीं, क्योंकि चारों तरफ भीड़ जमा थी.

बाद में एक सार्वजनिक बैठक में अखबार के संपादक महफूज़ अनाम ने कहा, “यह सिर्फ किसी इमारत को जलाने की बात नहीं थी. वे द डेली स्टार के स्टाफ को मारना चाहते थे.”

अखबार के कंसल्टिंग एडिटर कमाल अहमद ने दिप्रिंट से कहा कि हालांकि, किसी स्टाफ सदस्य को शारीरिक चोट नहीं आई, लेकिन आग के दौरान इमारत के अंदर फंसे रहने से सभी गहरे सदमे में हैं.

उन्होंने कहा, “वे बिना गंभीर शारीरिक चोट के बच गए, लेकिन मानसिक असर बहुत बड़ा है. यह सिर्फ उन साथियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे संगठन के लिए बेहद दुखद और डरावना अनुभव रहा.”

प्रोथोम आलो के लिए भी हालात उतने ही भयावह थे. भले ही उनकी सर्वर बिल्डिंग को नुकसान नहीं हुआ, लेकिन पहली बार दशकों में छपाई और ऑनलाइन काम रोकना पड़ा.

लेकिन सिर्फ एक दिन के लिए. 24 घंटे में वे फिर लौट आए.

प्रोथोम आलो के एग्जीक्यूटिव एडिटर सज्जाद शरीफ ने दिप्रिंट से कहा, “हमले के अगले ही दिन सुबह न्यूज़रूम के वरिष्ठ सदस्यों ने आपात बैठक की और तय किया कि अगले ही दिन अखबार फिर छापा जाएगा.”

मुश्किल हालात में दोनों संस्थान डटे रहे. द डेली स्टार के फ्रंट पेज पर सिर्फ एक शब्द था: “अनबोउड” (झुके नहीं).

शरीफ ने भी इसी तरह का एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था, “फिर भी, हम अपना सिर नहीं झुकाएंगे.”

शरीफ ने कहा, “हर वर्ग के पाठकों ने सोशल मीडिया पर अखबार की तस्वीरें साझा कीं. सैकड़ों पोस्ट थे, जिनमें सिर्फ एक दिन बाद अखबार के लौटने पर राहत और खुशी जताई गई. पत्रकारों के लिए यह पल बेहद हौसला देने वाला था.”

उन्होंने कहा कि इतनी तेज़ी से वापसी न्यूज़रूम के सामूहिक संकल्प का नतीजा थी.

“हर किसी ने असाधारण प्रतिबद्धता के साथ काम किया. यही वह प्रतिरोध है, जो एक स्वतंत्र प्रेस दिखाती है.”

संपादकीय में क्या कहा गया

हमलों के बाद निकले पहले संस्करणों में दोनों अखबारों ने सिर्फ अपने अडिग हौसले की पुष्टि ही नहीं की, बल्कि इस हिंसा को बांग्लादेश की प्रेस और उसके साथ-साथ उसकी राजनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ के रूप में भी पेश किया.

द डेली स्टार के संपादकीय ने इसे प्रेस के खिलाफ गुस्से की कोई अलग-थलग घटना मानने से इनकार किया और जवाबदेही की मांग की.

संपादकीय में कहा गया, “हम आभारी हैं, लेकिन हम इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि पहले से धमकियों और कामकाज में बाधा डालने की कोशिशों के बावजूद सरकार का समाचार संस्थानों की सुरक्षा को लेकर रवैया ढीला रहा है. द डेली स्टार और प्रोथोम आलो, दोनों को अलग-अलग जगहों से बार-बार धमकियां मिलीं, लेकिन न तो उन्हें गंभीरता से लिया गया और न ही उनकी जांच हुई.”

इसमें आगे कहा गया, “गुरुवार रात शुरू हुआ और शुक्रवार तड़के तक चला यह हमला सिर्फ दो अखबारों पर हमला नहीं है. यह स्वतंत्र पत्रकारिता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और निजी संपत्ति की पवित्रता पर हमला है. इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए.”

प्रोथोम आलो कार्यालय में आग लगने के बाद का दृश्य | एएनआई
प्रोथोम आलो कार्यालय में आग लगने के बाद का दृश्य | एएनआई

टकराव के दशक

प्रोथोम आलो के संपादकीय ने एक और व्यापक नागरिक दृष्टिकोण अपनाया और इस हमले को बांग्लादेश में बहुलवाद और असहमति को लेकर लंबे संघर्ष के संदर्भ में रखा.

शरीफ ने लिखा, “तब से कई लोग इस तारीख को बांग्लादेश के मीडिया इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक बता रहे हैं. हालांकि, इस घटना की जड़ें और पीछे जाती हैं—जुलाई के जन-उभार के बाद. उसी दौर से कुछ लोकतंत्र-विरोधी, अतिदक्षिणपंथी व्यक्तियों और समूहों ने प्रोथोम आलो के खिलाफ योजनाबद्ध प्रचार और ज़हरीले हमले शुरू किए.”

उन्होंने यह भी कहा कि भले ही प्रोथोम आलो पर हमले शेख हसीना के शासन में अपने चरम पर पहुंचे हों, लेकिन सच्चाई यह है कि “बांग्लादेश में किसी भी सरकार के तहत पत्रकारिता कभी दबाव से मुक्त नहीं रही.”

अपने संपादकीय में उन्होंने कहा, “मीडिया की आज़ादी किसी देश की लोकतांत्रिक स्थिति से गहराई से जुड़ी होती है. सच तो यह है कि प्रेस की स्वतंत्रता यह बताने का भरोसेमंद पैमाना है कि कोई सरकार कितनी लोकतांत्रिक है. बांग्लादेश में यह पैमाना कभी भी मनचाहे स्तर तक नहीं पहुंच पाया.”

अपने तीन दशक के इतिहास के बड़े हिस्से में द डेली स्टार टकराव से ही गढ़ा गया है—चाहे वह सरकारों से हो, जनरलों से या राजनीतिक वंशों से. 1991 में स्थापित यह अखबार बांग्लादेश की निर्णायक राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की बेबाक कवरेज के लिए जाना गया: शेख हसीना की अवामी लीग और खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बीच कड़ा संघर्ष.

2000 के शुरुआती वर्षों तक इसने द बांग्लादेश ऑब्ज़र्वर और वीकली हॉलिडे जैसे पुराने प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ दिया और देश का सबसे अधिक प्रसार वाला अंग्रेज़ी अखबार बन गया. इसके पाठक मुख्य रूप से शहरी अभिजात वर्ग, कारोबारी नेता और ढाका व चटगांव के राजनयिक थे.

लेकिन इस प्रसिद्धि के साथ जोखिम भी जुड़े थे. 2007 में, सेना-समर्थित शासन के दौरान, एडिटर-इन-चीफ महफूज़ अनाम ने राजनीतिक सुधारों का प्रस्ताव देने पर सेना प्रमुख जनरल मोईन यू. अहमद को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई और कहा कि ऐसे हस्तक्षेप सेना के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं. एक व्यापक रूप से पढ़े गए कॉलम में उन्होंने शेख हसीना की गिरफ्तारी के लिए कार्यवाहक सरकार की भी आलोचना की, जिससे अखबार जनरलों के विरोध में खड़ा हो गया.

दो साल बाद, द डेली स्टार ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान और बीएनपी के सत्ता केंद्र हावा भवन से जुड़े लोगों को 2004 के ढाका ग्रेनेड हमले से जोड़ा गया, जिसमें 24 लोग मारे गए थे. बाद में रहमान को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई.

दिलचस्प बात यह है कि आगजनी के हमले रहमान की 17 साल के निर्वासन के बाद औपचारिक रूप से बांग्लादेश वापसी से ठीक एक हफ्ते पहले हुए, ताकि वे चुनाव लड़ सकें—जब मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने उनके खिलाफ सभी 87 मामलों से उन्हें बरी कर दिया था.

2015 में, शेख हसीना सरकार ने अखबार में सभी सरकारी विज्ञापनों को निलंबित कर दिया, जो सरकारी सूचनाओं पर काफी निर्भर मीडिया बाज़ार में एक बड़ा आर्थिक झटका था. बाद में इन्हें बहाल कर दिया गया.

2022 में “क्या हम सच में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करा सकते हैं?” शीर्षक से लिखे एक लेख में अनाम ने हसीना सरकार के तहत लोकतंत्र के पीछे जाने की चेतावनी दी थी. अगले दो साल में उन्होंने बार-बार सिकुड़ते नागरिक स्पेस, प्रेस की आज़ादी, अब रद्द हो चुके डिजिटल सुरक्षा अधिनियम और चुनावी संस्थाओं के कमजोर होने पर लिखा.

पिछले साल के राजनीतिक उथल-पुथल और अंतरिम सरकार के गठन के बाद भी, द डेली स्टार ने यूनुस के नेतृत्व में राज्य सत्ता की कड़ी निगरानी जारी रखी और संपादकों के मुताबिक, यही निगरानी अख़बार को असुरक्षित बनाती गई.

अहमद ने कहा कि नुकसान की पूरी तस्वीर का आकलन अभी जारी है, लेकिन शुरुआती अनुमान के मुताबिक द डेली स्टार को लगभग 40 करोड़ टका (करीब 29 करोड़ रुपये) का नुकसान हुआ है.

इलाके को अपराध स्थल मानकर मंगलवार तक अखबार के परिसर में प्रवेश सीमित रखा गया था. सुरक्षा अवरोध हटाए जाने के बाद अब इमारत को फिर से चालू करने की तैयारियां चल रही हैं. अहमद ने कहा कि अगले दो हफ्तों में दफ्तर से सीमित कामकाज दोबारा शुरू हो सकता है.

आगे और हमलों की आशंका पर पूछे जाने पर अहमद ने माना कि खतरे अभी भी हैं, लेकिन उन्होंने भरोसा जताया कि अधिकारी किसी भी हालात को बिगड़ने से रोकने के लिए कदम उठाएंगे.

उन्होंने कहा, “देश भर में इस घटना को लेकर गुस्सा है और इस तरह की हिंसा के खिलाफ एक व्यापक एकजुटता बनी है. हमें नहीं लगता कि सरकार फिर से नाकाम होगी.”

‘27 साल में पहली बार प्रकाशित नहीं हुआ’

प्रोथोम आलो की स्थापना 1998 में हुई थी और यह बांग्ला भाषा का दैनिक अखबार शुरुआती 42,000 प्रतियों के प्रसार से बढ़कर रोज़ाना आधे मिलियन से ज़्यादा प्रतियों तक पहुंच गया. नेशनल मीडिया सर्वे के मुताबिक, इसके प्रिंट संस्करण के 66 लाख पाठक रोज़ाना हैं और इसका डिजिटल प्लेटफॉर्म दुनिया की सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली बांग्ला भाषा की वेबसाइट है.

इसकी रिपोर्टिंग में अक्सर पैरवी और जांच का मेल रहा है. एसिड हमलों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर शुरुआती खुलासों ने सरकार को एसिड बिक्री को नियंत्रित करने वाले सख्त कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ने पर मजबूर किया.

लेकिन इसकी पहुंच ने इसे अक्सर निशाना भी बनाया है. इस्लामिक समूहों ने कई बार प्रोथोम आलो पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगाया है. 2007 में, इसके व्यंग्यात्मक परिशिष्ट में छपे एक कार्टून ने देशभर में विरोध प्रदर्शन कराए, अस्थायी प्रतिबंध लगा और कार्टूनिस्ट को जेल भेजा गया. बाद में धार्मिक ग्रंथों का मज़ाक उड़ाने के आरोपों को लेकर किताबों और कॉलमों पर भी विवाद हुए.

2024 के आखिर में तनाव फिर बढ़ गया, जब बांग्लादेश में दोनों अखबारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज़ हो गए. प्रदर्शनकारियों ने उन पर शेख हसीना की पूर्व सरकार का समर्थन करने, इस्लाम-विरोधी और भारत समर्थक होने के आरोप लगाए. बरिसाल, चटगांव, सिलहट और राजशाही जैसे शहरों में देशभर में प्रदर्शन हुए, जिनमें इनके बहिष्कार और बंद करने की मांग की गई.

सोशल मीडिया पर इन अखबारों को बार-बार पक्षपाती बताया गया और प्रचार फैलाने का आरोप लगाया गया. संपादकों ने इन प्रदर्शनों को योजनाबद्ध डराने-धमकाने की कोशिश बताया.

शरीफ ने तब दिप्रिंट से कहा था, “अगस्त के उथल-पुथल के बाद हम सभी को लोकतंत्र की बहाली की उम्मीद थी. लोकतांत्रिक राज्य में आप किसी अखबार के वितरण को ऐसे ही नहीं रोक सकते. शिकायतें रखने के और भी तरीके होते हैं. यह सत्ता में बदलाव के दौर में समाज के कुछ लोगों की ओर से डराने की कोशिश है. लेकिन हम दबने वाले नहीं हैं.”

‘हम हत्या के दौर में प्रवेश कर चुके हैं’

आगज़नी के हमलों के कुछ दिन बाद हुई एक विरोध सभा में, तत्काल दिए गए भाषण में अनाम ने इंटरनेट पर घूम रहे एक वीडियो का ज़िक्र किया, जिसमें एक भीड़ फायर ब्रिगेड की गाड़ियों को जलती इमारत के पास जाने से रोकती दिख रही थी.

उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता आपने वह वीडियो देखा है या नहीं, लेकिन जब लोग खुलेआम कहते हैं कि वे पत्रकारों को मारना चाहते हैं, तो इसे हादसा या गुस्से का पल कहकर टाला नहीं जा सकता.”

बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फख़रुल इस्लाम आलमगीर के बयानों को दोहराते हुए उन्होंने राष्ट्रीय प्रेस को चेताया कि अब सिर्फ प्रतिक्रिया देना काफी नहीं है.

अनाम ने कहा, “हम सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं दे सकते. हमें साथ खड़ा होना होगा और मिलकर जवाब देना होगा. हम हत्या के दौर में प्रवेश कर चुके हैं. अभिव्यक्ति की आज़ादी अब बहुत दूर है; पहले हमें जीने के अधिकार की मांग करनी होगी.”

उन्होंने बताया कि कैसे हमलावरों ने बाहर निकलने के रास्ते बंद कर दिए और दमकल सेवाओं को जलती इमारत के पास आने से रोका.

उन्होंने कहा, “अगर यह सिर्फ संपत्ति का मामला होता, तो वे हमारे साथियों से बाहर निकलने को कह सकते थे. उन्होंने ऐसा नहीं किया. यह किसी एक न्यूज़रूम की बात नहीं है.” अनाम ने प्रेस से कहा, “यह पत्रकारिता के अस्तित्व का सवाल है.”

उन्होंने कहा, “आलोचनात्मक पत्रकारिता सिर्फ पत्रकारिता की आज़ादी के लिए ज़रूरी नहीं है; यह अच्छे शासन का एक मौका भी है. मैं झूठी जानकारी देकर आप (सरकार) की आलोचना क्यों करूंगा? नौकरशाही आपको कभी सच नहीं बताएगी, खुफिया एजेंसियां आपको कभी सच नहीं बताएंगी. यहां तक कि आपकी पार्टी के साथी भी आपको सच नहीं बताएंगे. सच बोलने वाली एकमात्र संस्था स्वतंत्र मीडिया है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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