scorecardresearch
Sunday, 8 March, 2026
होमविदेशमानसिक समस्या जितनी गंभीर, सहानुभूति उतनी कम - ऐसा क्यों?

मानसिक समस्या जितनी गंभीर, सहानुभूति उतनी कम – ऐसा क्यों?

Text Size:

( रॉबिन बेली, यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में क्लीनिकल साइकोलॉजी विभाग में सहायक प्राध्यापक )

लंदन, 26 फरवरी (द कन्वरसेशन) समाज में चिंता (एंग्जायटी), अवसाद (डिप्रेशन) और एडीएचडी जैसी कुछ मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों को पहले की तुलना में अब अधिक स्वीकार्यता मिली है। लोग अब कार्यस्थल, घर और सोशल मीडिया पर इनके बारे में खुलकर बात कर पाते हैं और अक्सर उन्हें सलाह भी मिलती है।

यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे मदद मांगना आसान हुआ है और संस्थानों के लिए मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को आधार बना कर कड़े कदम उठाना कठिन हो गया।

लेकिन सार्वजनिक सहानुभूति समान रूप से नहीं मिलती है। कुछ स्थितियां व्यापक रूप से समझी जाती हैं, जबकि अन्य को अब भी संदेह और कठोर निर्णय का सामना करना पड़ता है। जैसे-जैसे लोग कुछ बीमारियों से परिचित होते जाते हैं, वे बीमारियां मानसिक रोग की “स्वीकार्य” छवि तय करने लगती हैं। जो लक्षण इस छवि में फिट नहीं बैठते, उन्हें अलग नजर से देखा जाता है। यहां बात ‘अस्वीकार्यता’ से संबंधित है।

शोध से पता चलता है कि अवसाद और चिंता के प्रति सामाजिक नजरिया नर्म है, जबकि शिज़ोफ्रेनिया और व्यक्तित्व विकारों (जैसे बॉर्डरलाइन या नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर) के प्रति समाज में अधिक दूरी और भय वाली सोच है।

नौ अलग-अलग निदानों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि लोगों द्वारा दूरी बनाए रखने की इच्छा शिज़ोफ्रेनिया और पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के मामलों में सबसे अधिक थी। सभी मामलों में “डर” सबसे बड़े कारण के रूप में सामने आया।

पहचान (रिकग्निशन) भी सहानुभूति के अंतर में भूमिका निभाती है। जब लोग किसी व्यवहार को नाम नहीं दे पाते, तो उसे “अजीब”, “खतरनाक” या “बुरा” मान लेना आसान हो जाता है। एक अंतर-सांस्कृतिक अध्ययन में लगभग 70 प्रतिशत प्रतिभागियों ने एडीएचडी को सही पहचाना, जबकि केवल एक-तिहाई लोग बाइपोलर डिसऑर्डर की पहचान कर सके।

यहीं “सहानुभूति का पदानुक्रम” नुकसान पहुंचाता है। चिंता और अवसाद को कष्ट के रूप में पहचाना जाता है, लेकिन अन्य लक्षणों को नैतिक कमी के रूप में देखा जाता है। मिजाज में उतार-चढ़ाव को स्वार्थ, संदेह को दुर्भावना, आवाजें सुनने को खतरनाक प्रवृत्ति और भावनात्मक अस्थिरता को चालाकी समझ लिया जाता है। विशेषकर पर्सनैलिटी डिसऑर्डर की समस्या अक्सर चरित्र पर निर्णय की तरह सुनी जाती है, न कि पीड़ा के वर्णन की तरह।

ऑनलाइन दुनिया में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट है। शोध के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य संबंधी शब्दों का उपयोग अक्सर मजाक या अपमान के रूप में किया जाता है। “साइकोटिक” अपशब्द बन जाता है, “बाइपोलर” मूड बदलने का मजाक, “नार्सिसिस्ट” खराब रिश्ते का लेबल और “बॉर्डरलाइन” किसी को बदनाम करने का तरीका। इस तरह बीमारी सामाजिक हथियार में बदल जाती है।

“ट्रॉमा” शब्द एक अलग आयाम जोड़ता है। जब मानसिक कष्ट को किसी स्पष्ट आघात से जोड़ा जाता है, तो अधिक सहानुभूति मिल सकती है। फिर भी शोध दर्शाता है कि कई लोग आघात झेल चुके व्यक्तियों को भी अस्थिर या खतरनाक मानते हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य में गंभीर बीमारी अक्सर अधिक सहानुभूति लाती है। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य में पैटर्न उल्टा दिख सकता है। सबसे गंभीर स्थितियों को कभी-कभी चरित्र या अन्य अहम घटना का परिणाम मान लिया जाता है, जबकि वे जैविक और विकासात्मक कारकों से गहराई से जुड़ी होती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता बढ़ी है, लेकिन जब तक सहानुभूति उन स्थितियों तक नहीं पहुंचेगी जिन्हें लोग डरावना या समझना कठिन मानते हैं, तब तक यह असमानता बनी रहेगी।

(द कन्वरसेशन ) मनीषा पवनेश

पवनेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

share & View comments