Saturday, 2 July, 2022
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‘बिना प्रैक्टिकल के मेडिकल की पढ़ाई’: वीज़ा बैन के चलते चीन में पढ़ रहे भारतीय छात्रों पर संकट

कोविड के समय चीन ने अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को वीज़ा देने पर रोक लगा दी थी, जिसका असर वहां महामारी के पहले पढ़ रहे 23,000 छात्रों पर हुआ था. इनमें सबसे ज़्यादा मेडिकल के छात्र हैं.

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नई दिल्ली: भारत की 23 साल की मेडिकल छात्रा सोनाली भोईर को अभी चीन के कॉलेज में पढ़ते हुए दो साल भी पूरे नहीं हुए थे, तभी दुनिया कोविड-19 के चपेट में आ गई. भोईर को अपने साथ पढ़ने वाले 30 भारतीय छात्रों के साथ फरवरी 2020 में रातों-रात हॉस्टल खाली करके, कॉलेज छोड़कर भारत वापस आना पड़ा. वह झियानिंग के हुबेई यूनिवर्सिटी में विज्ञान और तकनीक की छात्रा हैं. उनका परिवार महाराष्ट्र के नागपुर में रहता है. चीन से वापस आने के बाद से वह ऑनलाइन पढ़ाई कर रही हैं.

कोविड महामारी के फैलने पर चीन ने अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के वीज़ा पर बैन लगा दिया था. इसका असर भारत के लगभग 23,000 छात्रों पर पड़ा था, जो महामारी शुरू होने के पहले वहां के विभिन्न यूनिवर्सिटी में शिक्षा पा रहे थे. इनमें मेडिकल छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा है.

भारत में कोविड का पहला मरीज केरल में मिला था. यह मरीज वुहान की यूनिवर्सिटी का मेडिकल छात्र था और महामारी के बाद अपने घर लौटा था.

2020 से इन छात्रों के वर्चुअल क्लास चल रहे हैं, जिसका मतलब है कि उनके पास प्रैक्टिकल का कोई अनुभव नहीं है. प्रैक्टिकल को मेडिकल शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.

भोईर पांच साल की एमबीबीएस कोर्स में चौथे साल की छात्रा है. दिप्रिंट से बातचीत में भोईर ने कहा, ‘ज्यादातर प्रैक्टिकल तीसरे साल के बाद शुरू होते हैं और मेरे पास कोई प्रैक्टिकल अनुभव नहीं है. ऑनलाइन पढ़ाई करना आसान नहीं है. कभी-कभी नेटवर्क की समस्या होती है, तो कभी सिद्धांतों को समझने में दिक्कत होती है. अगर मुझे कुछ पूछना होता है, तो मेरी समस्या का समाधान अगले दिन ही हो पाता है.’

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भोईर की एक सहपाठी नागपुर में रहती है. उसने अपना नाम न छपने की शर्त पर बताया कि किस तरह से कैंपस के अनुभव की कमी उसे महसूस हो रही है.

उसने कहा, ‘मैंने एमबीबीएस में दाखिला लिया था, तो मुझे अपने जीवन को लेकर निश्चित तौर पर कुछ उम्मीदें थीं. लेकिन, हमारे लिए इतना जल्दी सब कुछ बदल गया. जब हमने 2020 में चीन छोड़ा था, तब हमें नहीं मालूम था कि हम इतने लंबे समय तक वापस नहीं जा पाएंगे. मेरा यह चौथा साल है, किसी को नहीं पता कि मैं अपने फाइनल ईयर में पहुंचने के पहले वहां जा पाऊंगी या नहीं.’

हालांकि, चीन सरकार ने पिछले हफ्ते कहा था कि वह विदेशी छात्रों को वापस बुलाने के लिए (भारत के साथ मिलकर) प्रयास कर रही है. लेकिन, सरकार ने छात्रों को वापस बुलाने का कोई पक्का समय नहीं बताया.

राजनयिक सूत्रों के अनुसार भारतीय सरकार भी चीन पर भारतीय छात्रों को वापस बुलाने के लिए दबाव डाल रही है, ताकि वे अपनी शिक्षा फिर से शुरू कर सकें. इसी बीच, भारत के मेडिकल नियंत्रक नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) ने देश भर के छात्रों से अपील की है कि वे वीजा बैन चलने तक चीन के संस्थानों में एडमिशन लेने से बचें.

लेकिन, जिन छात्रों ने पहले से ही वहां के यूनिवर्सिटी में दाखिला ले रखा है, उनके सामने दो वर्षों से चल रही ऑनलाइन क्लास के चलते कैरियर में काफी चुनौतियां आ गई हैं.


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आर्थिक चिंता बहुत महत्वपूर्ण नहीं

चीन के ज्यादातर मेडिकल कॉलेजों में कोर्स का सालाना शुल्क 3 से 4 लाख रुपये है. हॉस्टल का खर्च भी लगभग 50,000 रुपये सालाना पड़ता है, हालांकि, कई यूनिवर्सिटी ने वर्चुअल पढ़ाई के चलते इसे खत्म कर दिया था.

चीन के मेडिकल की पढ़ाई का खर्च भारत की तुलना में काफी सस्ता है. इसी कारण भारतीय छात्रों के लिए मेडिकल शिक्षा को लेकर चीन काफी लोकप्रिय है. भारत के कॉलेजों में सीटें भी काफी कम है, जबकि चीन के कॉलेजों में दाखिला लेना बहुत आसान है.

दिप्रिंट ने जिन छात्रों से संपर्क किया उनमें ज्यादातर मध्यम और उच्च मध्यम आय वाले परिवारों से ताल्लुक रखते हैं. उन्होंने चीन की यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने में जो पैसे खर्च किए उसकी चिंता उन्हें ज्यादा नहीं है. उनकी सबसे बड़ी चिंता है कि वे ऑनलाइन क्लास के चलते प्रैक्टिकल और इंटर्नशिप जैसी महत्वपूर्ण ट्रेनिंग के अनुभवों से वंचित हो गए हैं. यह चिंता सबसे ज्यादा उन मेडिकल छात्रों को है जो एमबीबीएस अंतिम साल में हैं.

जिंद, हरियाणा की निवासी कीर्ति पाठक ने पिछले साल चीन के एक यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस की शिक्षा पूरी की है (एक साल से ज्यादा समय तक वर्चुअल क्लास किया है). दिप्रिंट से बातचीत के दौरान कीर्ति ने कहा, ‘चीन में एमबीबीएस की पढ़ाई करना बहुत महंगा नहीं है. समस्या यह है कि एमबीबीएस का कोर्स पूरा करने के बावजूद मेरे पास कोई प्रैक्टिकल अनुभव नहीं है. साथ ही, बतौर डॉक्टर प्रैक्टिस करने का मेरे पास कोई अवसर नहीं है.’ कीर्ति ने चीन यून्नान राज्य के कनमिंग मेडिकल यूनिवर्सिटी से सालाना 3.5 लाख रुपये का शुल्क देकर मेडिकल का कोर्स किया था.


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इंटर्नशिप करने की दिक्कतें

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के मोहम्मद नादिर भी घर वापस आ चुके हैं. नादिर शियान शहर के हुबेई यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन के पांचवें साल के छात्र हैं.

चीन के कॉलेज में वापस जाने में असमर्थ नादिर भारत में ही इंटर्नशिप करने के कोशिश में हैं, क्योंकि उनका मेडिकल कोर्स में अंतिम साल है. फिलहाल, उनको जगह देने के लिए कोई तैयार नहीं है क्योंकि उनके पास प्रैक्टिकल का कोई अनुभव नहीं है.

सच्चाई यह भी है कि नादिर ने फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एक्जाम (एफएमजीई) की परीक्षा पास नहीं की है. इसे पास करने पर ही उन छात्रों को देश में प्रैक्टिस करने की अनुमति मिलेगी, जो मेडिसिन की शिक्षा रूस, चीन, बांग्लादेश, फिलीपींस, नेपाल, कजाकिस्तान और यूक्रेन से लेकर आते हैं.

नादिर ने दिप्रिंट से कहा कि तीसरे साल के मेडिकल छात्रों को अस्पतालों में ले जाते हैं जहां मरीज को देखते हैं, उनकी बीमारी का विश्लेषण करते हैं और बीमारी समझने की कोशिश करते हैं. मसलन हमने अस्थमा के सिद्धांत को पढ़ा है, लेकिन मैंने किसी अस्थमा के मरीज को नहीं देखा है या किसी अस्थमा के मरीज से मिलकर उसके लक्षणों का विश्लेषण किया है.

नादिर और उनके बैच के दूसरे छात्रों का कहना है कि उन्होंने राज्य सरकार और स्थानीय अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की ताकि उन्हें स्थानीय मेडिकल कॉलेज में प्रैक्टिकल करने की इजाजत मिल सके, लेकिन अनुमति नहीं मिली.

एक छात्र ने कहा, ‘हमने अपनी यूनिवर्सिटी से मांग की थी कि हमें स्थानीय यूनिवर्सिटी या अस्पतालों में प्रैक्टिकल क्लास में दाखिला दिया जाए लेकिन हमारी यूनिवर्सिटी ने यहां प्रैक्टिकल में दाखिला देने से इंकार कर दिया और इस मामले से खुद निपटने को कहा.’

उसने बताया कि उसकी तरह ही कई यूनिवर्सिटी के अन्य 100 छात्र भी मामले को लेकर चिंतित हैं. एक तरफ तो कुछ छात्रों को स्थानीय क्लिनिकों में अनाधिकारिक रूप से ट्रेनिंग मिल गई लेकिन उन्हें आधिकारिक तौर पर इंटर्नशिप नहीं मिल पाई.

कीर्ति ने पिछले एक साल से भारत में इंटर्नशिप करने की कोशिश कर रही हैं. वे अभी तक दो कारणों से असफल हैं, पहला कारण तो उनको प्रैक्टिकल अनुभव का न मिल पाना है और दूसरे वे एफएमजीई की परीक्षा नहीं पास कर सकी हैं.

उन्होंने कहा, ‘अगर मैं चीन में होती तो मुझे अपने-आप इंटर्नशिप करने को मिल गई होती लेकिन भारत में मुझे तब तक इंतजार करना पड़ेगा, जबतक मैं एफएमजीई क्वालीफाई नहीं कर लेती. यहां तक कि इंटर्नशिप के लिए भी यह आवश्यक है. लेकिन, एफएमजीई निकालने के लिए भी प्रैक्टिकल ज्ञान की जरूरत होती है, क्योंकि अंततः यह परीक्षा भी मेडिसिन की प्रैक्टिस के लिए ही है.’

औसतन 20 प्रतिशत से भी कम लोग एफएमजीई की परीक्षा में पास हो पाते हैं.


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छात्रों के लिए चेतावनी

इसी बीच पिछले मंगलवार को नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) की ओर से जारी की गई एक नोटिस में कहा गया है कि ‘कोई भी भावी छात्र यह जान ले कि चीन की सरकार ने कोविड-19 की महामारी शुरू होते ही यात्रा करने पर रोक लगा दिया था और नवंबर 2020 तक सभी वीज़ा का स्थगन कर दिया था.’

चीन की कुछ यूनिवर्सिटी द्वारा एमबीबीएस के नए आवेदन मंगाने की घोषणा करने के बाद यह नोटिस निकाली गई थी.

नोटिस में यह भी कहा गया कि चीन के इन नियंत्रणों के कारण बड़ी संख्या में अंतर्राष्ट्रीय छात्र जिनमें भारतीय भी शामिल हैं, वहां वापस जाने में असमर्थ हैं. अभी तक इन नियंत्रणों में किसी तरह की कोई ढिलाई नहीं दी गई है.

नोटिस में कहा गया है, ‘चालू नियमों के मुताबिक नेशनल मेडिकल कमीशन, सिर्फ ऑनलाइन माध्यम से किए गए मेडिकल कोर्स का अनुमोदन नहीं करता या उसको स्वीकार करता है.’

इसीलिए एनएमसी ने सभी छात्रों से अपील की है कि ‘वे चीन या दूसरे देश के मेडिकल संस्थान में आवेदन करने के पहले सावधानी बरतें. इन बातों को देखते हुए, छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे मेडिकल शिक्षा बाहर लेने का फैसला सोच-समझकर करें.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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