(विंसेंट सिजायर, पेरिस लुमिएरेस विश्वविद्यालय द्वारा)
नैनटेरे (फ्रांस), 28 सितंबर (द कन्वरसेशन) फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी को 2007 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के लिए लीबिया से धन प्राप्त करने से संबंधित मामले में आपराधिक षड्यंत्र का दोषी पाया गया है।
सरकोजी को पांच साल की जेल की सजा सुनाई गई है। उन्हें अपनी कैद की तारीख जानने के लिए 13 अक्टूबर को अदालत में पेश होना है। यह अभूतपूर्व फैसला फ्रांसीसी न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जिसने धीरे-धीरे खुद को राजनीतिक सत्ता से मुक्त कर लिया है।
विन्सेंट सिजेयर ने लिखा कि इसमें कानून के समक्ष नागरिकों की पूर्ण समानता के गणतंत्रीय सिद्धांत को भी शामिल किया गया है, जिसकी घोषणा 1789 में की गई थी, लेकिन यह लंबे समय तक सैद्धांतिक ही रहा।
सरकोजी पर 2007 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के लिए तत्कालीन लीबियाई नेता मुअम्मर गद्दाफी की सरकार से कथित तौर पर अवैध धन जुटाने का आरोप था।
इस आधार पर कि यह निर्णय अनुचित और निराधार है, इसके विरुद्ध तर्क देना पूरी तरह से उचित है। यह सबसे पहले प्रतिवादियों पर लागू होता है और निर्णय के विरुद्ध अपील करने का उन्हें पूरा अधिकार है।
बेशक, यह सजा विशेष रूप से कठोर लग सकती है: 100,000 यूरो का जुर्माना, पांच साल की अयोग्यता और पांच साल की कैद। लेकिन यदि हम अपराधों पर करीब से नजर डालें, तो दंड शायद ही असंगत दिखाई देगा।
हालांकि अधिकतम सजा दस वर्ष की जेल है, इसलिए इस दंड को बहुत कठोर नहीं माना जा सकता। लेकिन जिस बात पर विवाद हो रहा है, वह है अदालतों द्वारा किसी राजनीतिक नेता को दोषी ठहराने का सिद्धांत।
हालांकि, यदि हम इसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो हम पाते हैं कि हाल के वर्षों में शासक वर्ग के सदस्यों के विरुद्ध दिए गए निर्णय, वास्तव में न्यायपालिका को अन्य शक्तियों, विशेषकर कार्यपालिका से मुक्त करने के आंदोलन का हिस्सा हैं।
कानून के समक्ष नागरिकों की समानता एक गणतांत्रिक सिद्धांत है।
यह याद रखना चाहिए कि 4-5 अगस्त 1789 की रात को घोषित क्रांतिकारी सिद्धांत कानून के समक्ष पूर्ण समानता का था।
वर्ष 1791 की दंड संहिता इससे भी आगे बढ़ गई: न केवल सत्ता में बैठे लोगों को अन्य नागरिकों के समान ही अदालतों के समक्ष जवाबदेह ठहराया जा सकता था, बल्कि उन्हें कुछ अपराधों, विशेष रूप से भ्रष्टाचार से जुड़े अपराधों के लिए कठोर दंड का भी सामना करना पड़ता था।
हालांकि, लंबे समय तक कानूनी समानता की यह आवश्यकता काफी हद तक सैद्धांतिक ही रही।
बाद में धीरे-धीरे एक कठोर आचार संहिता अपना ली गई, जिसे 1972 में न्यायिक ट्रेड यूनियनवाद को मान्यता मिलने से विशेष प्रोत्साहन मिला। न्यायाधीशों की एक नयी पीढ़ी उभरी, जिसने अब अपने मिशन को गंभीरता से लिया: पूर्ण स्वतंत्रता के साथ यह सुनिश्चित करना कि कानून का उचित ढंग से पालन हो, चाहे आरोपी की पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
इसी संदर्भ में कुछ ऐसा घटित हुआ जो कुछ दशक पहले तक अकल्पनीय था। प्रमुख व्यक्तियों पर उसी आधार पर मुकदमा चलाया जाना और उन्हें दोषी ठहराना जिस आधार पर आम लोगों पर मुकदमा चलाया जाता है।
इसका एक उदाहरण फरवरी, 2007 का संवैधानिक संशोधन है। इसके अनुसार गणराज्य के राष्ट्रपति पर उनके कार्यकाल के दौरान आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, लेकिन उनके पद छोड़ते ही कार्यवाही फिर से शुरू करने की अनुमति होती है।
हम दिसंबर, 2013 में राष्ट्रीय वित्तीय अभियोजक कार्यालय के गठन का भी उल्लेख कर सकते हैं, हालांकि इसे कार्यपालिका शाखा से वैधानिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है, तथापि यह हाल के वर्षों में अपनी वास्तविक स्वतंत्रता प्रदर्शित करने में सक्षम रहा है।
(द कन्वरसेशन)
देवेंद्र नरेश
नरेश
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