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Monday, 16 February, 2026
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एक-तिहाई वोट शेयर के साथ जमात ने बांग्लादेश में वह कर दिखाया, जो उसे पाकिस्तान में कभी नहीं मिली

दशकों तक, जमात की ब्रांच दक्षिण एशिया में सत्ता के किनारे-किनारे चलती रहीं—आइडियोलॉजिकली असरदार, लेकिन बैलेट बॉक्स में कभी हावी नहीं रहीं. बांग्लादेश में नतीजे के साथ, अब यह बदल गया है.

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ढाका: हाल ही में हुए आम चुनाव ने बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाया. जमात-ए-इस्लामी, जिस पर अगस्त 2024 तक रोक लगी थी, उसने अब तक की अपनी सबसे ज्यादा सीटें और वोट प्रतिशत हासिल किए हैं. इतना ही नहीं, उसने भारतीय उपमहाद्वीप में जमात की दूसरी शाखाओं को भी पीछे छोड़ दिया.

12 जनवरी को बांग्लादेश की 299 सीटों पर मतदान हुआ. इनमें से जमात ने 68 सीटें जीतीं. इस तरह वह भारतीय उपमहाद्वीप में जमात-ए-इस्लामी की इकलौती ऐसी शाखा बन गई जिसके पास संसद में बड़ी संख्या में प्रतिनिधि हैं.

1941 में लाहौर में इस्लामी विद्वान अबुल आला मौदूदी ने इस संगठन बनाया था. इसका मकसद एक ऐसा पॉलिटिकल सिस्टम बनाना था जो ऊपरवाले के राज से चले, और जिसे इस्लामिक कानून के ज़रिए लागू किया जाए. मौदूदी ने इसे “थियो-डेमोक्रेसी” कहा था. एक संगठन के रूप में जमात कभी अलग-थलग नहीं रही. दशकों तक उसकी शाखाएं दक्षिण एशिया में सत्ता के किनारों पर चलती रहीं. विचारधारा के हिसाब से प्रभावशाली, अनुशासित कैडर के साथ, लेकिन मतपेटी में कभी भी हावी नहीं रहीं.

बांग्लादेश के इस नतीजे के बाद अब यह स्थिति बदल गई है.

जमात की वापसी में उसके सहयोगी संगठनों के मजबूत नेटवर्क ने मदद की, जिनमें बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिबिर भी शामिल है. बड़े विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों में मिली सफलता ने युवा मतदाताओं के बीच माहौल बनाया. जिन विश्लेषकों से दिप्रिंट ने बात की, उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण महिलाओं और उन इलाकों में जहां युवाओं की संख्या ज्यादा है, वहां समर्थन बढ़ा है.

अंतरराष्ट्रीय हालात भी एक और पहलू जोड़ते हैं. बांग्लादेश में इस्लामी राजनीति की वापसी ऐसे समय हो रही है जब मुस्लिम दुनिया के अन्य हिस्सों में ऐसे आंदोलन दबाव में हैं.

विश्लेषकों ने बांग्लादेश में जमात की चुनावी वापसी के चार कारण बताए. पहुंच बढ़ाना, ग्रामीण इलाकों और युवाओं में पकड़. दो बड़ी पार्टियों की लापरवाही. अवामी लीग पर प्रतिबंध. और जमात के मौजूदा अमीर डॉक्टर शफीकुर रहमान के तहत ‘सुधारवादी’ एजेंडा.

ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और लेखक आसिफ शहान ने दिप्रिंट से कहा, “बांग्लादेश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी गरीबी रेखा के नीचे रहता है और रोज 2 डॉलर से कम कमाता है. इन मतदाताओं के लिए सिर्फ लोकतंत्र का वादा बेहतर जिंदगी में नहीं बदला है. जमात ने चैरिटी, क्लिनिक, स्कूल और राहत कार्यों के जरिए लगातार मौजूद रहकर वहां भरोसा बनाया है जहां अक्सर राज्य गैरमौजूद नजर आया.”

बांग्लादेश में जमात की जड़ें पाकिस्तान की जमात-ए-इस्लामी की पूर्वी पाकिस्तानी शाखा से जुड़ी हैं. 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान इसने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया और पाकिस्तान के समर्थन में प्रदर्शन किए. बांग्लादेश बनने के बाद शेख मुजीबुर रहमान की सरकार ने जमात पर प्रतिबंध लगा दिया. बाद में राष्ट्रपति जियाउर रहमान के समय यह प्रतिबंध हटा और 1979 में पार्टी को औपचारिक रूप से स्थापित होने का रास्ता मिला.

अपने इतिहास के बड़े हिस्से में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी गठबंधन पर निर्भर ताकत रही, खासकर बीएनपी के साथ. 2001 से 2006 के बीच बीएनपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में उसके दो नेता मंत्री भी रहे.

लेकिन प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में 2013 में इसका रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया.

गुलाम आजम और दिलावर हुसैन सईदी सहित कई वरिष्ठ नेताओं पर 1971 के युद्ध अपराधों के लिए बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल में मुकदमा चला. इनमें से कई, जैसे मतीउर रहमान निजामी और मुहम्मद कमरुज्जमां को फांसी दी गई. 1 अगस्त 2024 को छात्र आंदोलन के बीच अवामी लीग ने जमात पर फिर से रोक लगा दी गई.

हसीना के हटने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने प्रतिबंध हटा दिया और पार्टी का पंजीकरण बहाल कर दिया. इससे उसकी बांग्लादेश की राजनीति में वापसी का रास्ता साफ हुआ.

फिर भी विवाद जारी है. मतदान से तीन दिन पहले महिला अधिकार समूहों ने देशभर में विरोध प्रदर्शन किए. वजह थी शफीकुर की एक अब हटाई जा चुकी सोशल मीडिया पोस्ट, जिसमें उन्होंने सभी कामकाजी महिलाओं को सेक्स वर्कर के बराबर बताया था.

जमात की बढ़त का नक्शा

बांग्लादेश चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार जमात-ए-इस्लामी को कुल डाले गए वोटों में 31.76 प्रतिशत वोट मिले. इस तरह वह बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी बीएनपी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई. बीएनपी को 41.97 प्रतिशत वोट मिले.

30 प्रतिशत का आंकड़ा पार करना जमात के लिए बड़ी बात है, क्योंकि इससे पहले उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन लगभग 18 प्रतिशत 1991 में था. 1986 में 10 सीटें, 1991 में 20 सीटें और 2001 में 17 सीटें जीतने के अलावा उसकी सीटें ज्यादातर एक अंक तक ही सीमित रहीं.

इस बार जमात को सबसे बड़ी चुनावी बढ़त खुलना डिवीजन में मिली, जहां उसने 36 में से 25 सीटें जीतीं. रंगपुर में 33 में से 16 और राजशाही में 39 में से 11 सीटें जीतीं. सतखीरा, मेहरपुर, चुआडांगा, नीलफामारी और चपई नवाबगंज जिलों में उसने सभी सीटें जीत लीं. पहली बार उसने महानगर ढाका की 15 में से 6 सीटें जीतीं और उसके एक सहयोगी ने सातवीं सीट जीती. ढाका की कई अन्य सीटों पर हार का अंतर बहुत कम रहा. उदाहरण के लिए, वह ढाका-10 सीट 3,300 वोटों से हार गई.

Infographic: Deepakshi Sharma/ThePrint
इन्फोग्राफिक: दीपाक्षी शर्मा/दिप्रिंट

पार्टी ने खुलना में एक हिंदू उम्मीदवार भी उतारा, जो अंत में हार गया.

आंकड़े साफ दिखाते हैं कि जमात सबसे मजबूत खुलना डिवीजन में है, जहां उसे 48.26 प्रतिशत वोट मिले. यह बीएनपी के 43.55 प्रतिशत से भी ज्यादा है. इससे दक्षिण-पश्चिमी बांग्लादेश का खुलना उसका चुनावी गढ़ बन गया है. इसके अलावा उत्तर के रंगपुर डिवीजन में भी उसका मजबूत आधार है, जहां उसे 39.78 प्रतिशत वोट मिले, जबकि बीएनपी को 41.95 प्रतिशत मिले.

जमात ने देश के अन्य हिस्सों में भी कड़ी टक्कर दी. उदाहरण के लिए, राजशाही में उसे कुल वोटों का 39.71 प्रतिशत मिला, जो बीएनपी से पीछे रहने के बावजूद मजबूत पकड़ दिखाता है. खुलना, रंगपुर और राजशाही मिलकर बांग्लादेश की पश्चिमी सीमाओं के साथ एक पट्टी बनाते हैं, जहां ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जमात का समर्थन सबसे ज्यादा मजबूत दिखता है.

पहले इन इलाकों को अवामी लीग का गढ़ माना जाता था.

Infographic: Deepakshi Sharma/ThePrint
इन्फोग्राफिक: दीपाक्षी शर्मा/दिप्रिंट

इसके उलट, दूसरे डिवीज़न में जमात का परफ़ॉर्मेंस ठीक-ठाक रहा. चटगांव में इसे 28.01 परसेंट वोट मिले, जबकि BNP को 51.88 परसेंट वोट मिले. बरिशाल में इसे 23.46 परसेंट और सिलहट में 22.62 परसेंट वोट मिले, जबकि BNP को 47.64 परसेंट और 59.54 परसेंट वोट मिले. मैमनसिंह में जमात का वोट शेयर 21.85 परसेंट और BNP का 51.60 परसेंट रहा.

ढाका में, जो देश का राजनीतिक और आर्थिक केंद्र है और जहां जमात को ऐतिहासिक रूप से ज्यादा सफलता नहीं मिली, उसे 22.38 परसेंट वोट मिले. वहीं बीएनपी ने उम्मीद के मुताबिक 51.41 परसेंट के साथ मजबूत बढ़त बनाए रखी.

कुल मिलाकर नया चुनावी नक्शा दिखाता है कि जमात की अपील सबसे ज्यादा ग्रामीण और अर्ध-शहरी उत्तर और दक्षिण-पश्चिमी इलाकों में है, जबकि वह अपेक्षाकृत समृद्ध, शहरी और प्रवासी प्रभाव वाले डिवीजनों जैसे ढाका, सिलहट और चट्टोग्राम में कमजोर है.

यह भी साफ है कि जमात अब बांग्लादेश में हाशिये की चुनावी ताकत नहीं रही, बल्कि एक बड़ी राष्ट्रीय दावेदार बन गई है, जिसके पास क्षेत्रीय गढ़ और काफी बढ़ा हुआ वोट आधार है. दिप्रिंट देखता है कि इस बदलाव के पीछे क्या कारण हैं.

जमात के पक्ष में क्या काम किया

जमात की चुनावी सफलता बीएनपी से रणनीतिक दूरी के बाद आई. उसने 17 साल बाद एक गठबंधन बनाया और अवामी विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरों वाली नेशनल सिटिजन पार्टी एनसीपी के साथ हाथ मिलाया. लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है.

“जब पूछा जाता है कि जमात को ग्रामीण इलाकों में समर्थन क्यों मिलता है, तो तीन बातें सामने आती हैं. उसकी दिखने वाली चैरिटी और जमीनी मौजूदगी. मुख्यधारा की पार्टियों की तुलना में नैतिक नेतृत्व की छवि. और मुस्लिम पहचान को आर्थिक सुधार के वादों के साथ जोड़ना,” आसिफ शहान ने कहा. उन्होंने बताया कि जमात ने खुद को एक इस्लामी कल्याणकारी समाज के समर्थक और टैक्स में कटौती के पक्षधर के रूप में पेश किया. उसने चैरिटी के जरिए सामाजिक काम को भी बढ़ावा दिया.

ढाका के राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद तनवीर ने कहा, “जब एक जैसा राजनीतिक चक्र कई सालों तक चलता रहता है, तो मतदाता स्वाभाविक रूप से विकल्प तलाशने लगते हैं. जो पार्टी अलग या कम आजमाई हुई दिखती है, वह नई उम्मीद, नई भाषा और भविष्य के नए वादों का प्रतीक बन सकती है. सिर्फ यह मनोवैज्ञानिक बदलाव ही वापसी के लिए जगह बना सकता है.”

तनवीर ने कहा कि अलगाव या अन्याय की भावना भी समय के साथ सहानुभूति पैदा कर सकती है.

बांग्लादेश के मामले में जमात के समर्थकों ने अवामी लीग सरकार के तहत पंद्रह साल से ज्यादा ‘दमन’ की ओर इशारा किया. कई वरिष्ठ नेताओं को विवादित मुकदमों के बाद फांसी दी गई. हजारों नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया. पार्टी स्पष्ट राजनीतिक पहचान या संवैधानिक जगह के बिना संघर्ष करती रही. तनवीर ने कहा कि कई समर्थकों के लिए इससे सहनशक्ति और जीवित रहने की मजबूत कहानी बनी, जो धीरे-धीरे सहानुभूति और फिर राजनीतिक समर्थन में बदल सकती है.

उन्होंने यह भी कहा कि संगठन की निरंतरता बहुत अहम होती है. उनके अनुसार, भले ही कोई पार्टी ज्यादा दिखाई न दे, वह जमीनी नेटवर्क, समर्पित समर्थक और वैचारिक आधार बनाए रख सकती है. जब राजनीतिक माहौल बदलता है, तो ऐसी पार्टी तेजी से फिर उभर सकती है और दिखा सकती है कि वह कभी सच में गायब नहीं हुई थी.

इसके अलावा पीढ़ीगत बदलाव भी बड़ी भूमिका निभाता है. आज के कई मतदाता नई पीढ़ी से हैं, जिनके पास पुराने राजनीतिक संघर्षों की वही यादें नहीं हैं. वे ज्यादा ध्यान वर्तमान संदेश, नेतृत्व की शैली और भविष्य के वादों पर देते हैं.

तनवीर ने कहा कि इससे पहले किनारे की गई पार्टी को नए नजरिए से देखा जा सकता है.

भारतीय उपमहाद्वीप, राजनीतिक इस्लाम और जमात

जमात-ए-इस्लामी, जो मूल संगठन है, ब्रिटिश भारत में पैदा हुआ था. मौदूदी का मानना था कि इस्लाम सिर्फ धर्म नहीं बल्कि एक राजनीतिक व्यवस्था है. बंटवारे के बाद संगठन दो हिस्सों में बंट गया. जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान और जमात-ए-इस्लामी हिंद.

बाद में बांग्लादेश में भी इसकी एक शाखा बनी.

भारत में पुलवामा आतंकी हमले के बाद 2019 में जमात की जम्मू-कश्मीर शाखा पर प्रतिबंध लगा दिया गया. रूस में भी 2003 में मुस्लिम ब्रदरहुड से कथित संबंधों के कारण व्यापक आंदोलन को आतंकवादी संगठन घोषित किया गया.

अफगानिस्तान में भी एक शाखा है, जिसकी स्थापना 1972 में बुरहानुद्दीन रब्बानी ने की थी. वह मौदूदी से प्रेरित थे. शुरुआत में ताजिक समुदाय का प्रभाव था. अफगानिस्तान की जमीयत-ए-इस्लामी 1980 के दशक में सोवियत बलों के खिलाफ लड़ने वाले अफगान मुजाहिदीन समूहों के गठबंधन “पेशावर सेवन” का एक प्रमुख हिस्सा बनी.

पाकिस्तान में जमात ने देश को स्पष्ट रूप से इस्लामी राज्य बनाने की कोशिश की, लेकिन चुनावी सफलता सीमित रही. 1970 के आम चुनाव में उसने 151 उम्मीदवार उतारे लेकिन सिर्फ 4 नेशनल असेंबली सीटें जीतीं.

1977 में पाकिस्तान नेशनल अलायंस के हिस्से के रूप में उसने 9 सीटें जीतीं. सबसे बड़ी सफलता 2002 में मिली, जब वह मुत्तहिदा मजलिस-ए-अमल गठबंधन में शामिल हुई. इस गठबंधन ने 59 सीटें जीतीं और खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सत्ता में आया. इसके बाद उसका असर घटता गया. 2013 में 4 सीटें, 2018 में 1 सीट और 2024 में कोई सीट नहीं.

Infographic: Deepakshi Sharma/ThePrint
इन्फोग्राफिक: दीपाक्षी शर्मा/दिप्रिंट

आज भी पाकिस्तान की बंटी हुई धार्मिक राजनीति में, जिसमें फजलुर रहमान जैसे नेता शामिल हैं, कोई एक इस्लामी पार्टी पूरे देश में मजबूत जनादेश नहीं रखती.

पाकिस्तानी पत्रकार एबाद अहमद ने कहा कि इसकी वजह एक विरोधाभास है.

जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान की वैचारिक नींव मौदूदी से जुड़ी है, जिनके राजनीतिक इस्लाम के विचारों का पाकिस्तान पर गहरा और स्थायी असर पड़ा. लेकिन मौदूदी ने शुरुआत में पाकिस्तान बनने का विरोध किया था. उनका कहना था कि राष्ट्रवाद इस्लामी राज्य का आधार नहीं हो सकता. उन्होंने मुस्लिम लीग की भी आलोचना की, क्योंकि उनके अनुसार वह जमींदारों और अभिजात वर्ग की पार्टी थी, धार्मिक नेताओं की नहीं.

“लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद जमात का वैचारिक प्रभाव लगातार बढ़ता गया. 1949 का उद्देश्य प्रस्ताव, जिसने पाकिस्तान के संविधान को इस्लामी चरित्र देने की नींव रखी, उसमें जमात की सोच के कई विचार दिखते हैं. समय के साथ पार्टी के वैचारिक ढांचे ने इस्लामीकरण, शिक्षा, रक्षा की सोच और राज्य संस्थाओं पर बहस को आकार दिया,” अहमद ने कहा. उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि जो समूह जमात का विरोध करते हैं, वे भी अक्सर उसी इस्लामी वैचारिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसे मौदूदी ने व्यवस्थित किया था.

जमात की छात्र शाखा इस्लामी जमीयत-ए-तलबा का भी कॉलेज परिसरों में वैचारिक प्रभाव रहा है, लेकिन उसके कई कार्यकर्ता बाद में मुख्यधारा की पार्टियों में शामिल हो जाते हैं.

इसके अलावा पाकिस्तान के चारों प्रांतों की राजनीति अलग है. उदाहरण के लिए, बलूचिस्तान में जमात कभी मजबूत नहीं हो पाई, क्योंकि वहां स्थानीय राष्ट्रवाद और जनजातीय राजनीति हावी है. पंजाब में जमात ज्यादा एक कल्याण और राहत संगठन की तरह काम करती है, जबकि पाकिस्तान मुस्लिम लीग एन और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पीटीआई राजनीति पर हावी हैं.

सिंध में जमात का मुख्य आधार शहरी कराची है, खासकर उर्दू बोलने वाले मुहाजिरों के बीच. वहां उसका संगठन ढांचा अनुशासित और व्यवस्थित है. जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान के मौजूदा अमीर हाफिज नईम उर रहमान ने पार्टी को एक विश्वसनीय शहरी विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश की है. दिखाई देने वाली चुनावी ताकत के बावजूद, जमात समर्थन को कार्यकारी सत्ता में बदलने में संघर्ष करती रही है और अहम मौकों पर कराची के मेयर पद तक नहीं जीत पाई. अंदरूनी सिंध अब भी उसके प्रभाव से बाहर है.

खैबर पख्तूनख्वा में जमात के कुछ इलाके मजबूत हैं, लेकिन बड़े आंदोलन, खासकर इमरान खान की अगुवाई वाली पीटीआई, उसके समर्थन आधार में सेंध लगा चुके हैं. यहां एक और अहम वजह महिलाओं की भागीदारी है. पहले के दशकों में खैबर पख्तूनख्वा के रूढ़िवादी इलाकों में महिलाओं को वोट देने से रोका जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है.

रणनीतिक नई छवि

बांग्लादेश में जमात की चुनावी सफलता के केंद्र में उसके अमीर डॉक्टर शफीकुर रहमान हैं.

2019 में पार्टी के रुकन पूर्ण सदस्यों द्वारा उन्हें नेतृत्व के लिए चुना गया था. 2023 और फिर 2025 में वे दोबारा चुने गए. पार्टी के अंदर शफीकुर को इसका श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने जमात को उसकी पारंपरिक बंद सोच से बाहर निकाला. उन्होंने अलग-अलग तरह के नेताओं के लिए पार्टी के दरवाजे खोले. धार्मिक अल्पसंख्यकों से संपर्क किया. और 1971 में बांग्लादेश की आजादी पर पार्टी के रुख के कारण जो स्वतंत्रता सेनानी लंबे समय से उससे नाराज थे, उनसे भी प्रतीकात्मक रूप से संपर्क करने की कोशिश की.

इस आम चुनाव ने शफीकुर के लिए एक और व्यक्तिगत उपलब्धि दर्ज की. उन्होंने पहली बार संसद की सीट जीती. वह भी ढाका में, जहां जमात पहले कभी सीट नहीं जीत पाई थी.

उनके साथ 2019 से पार्टी के महासचिव मिया गोलाम परवर ने संगठन का विस्तार देखा. वहीं छात्र शाखा बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिबिर ने कैंपसों में अपना प्रभाव बढ़ाया और राष्ट्रीय राजनीति के लिए युवा कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाया.

हालांकि संगठन अब भी धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसे मूल राजनीतिक सिद्धांतों को लेकर संदेह में है. वह इन अवधारणाओं को अब भी ‘हराम’ इस्लाम में निषिद्ध बताता है.

जमात के प्रवक्ता नकीब-उर-रहमान ने दिप्रिंट से कहा, “77 सीटों सहयोगियों सहित के साथ हमने संसद में अपनी मौजूदगी लगभग चार गुना कर ली है और आधुनिक बांग्लादेशी राजनीति में सबसे मजबूत विपक्षी गुटों में से एक बन गए हैं. यह कोई झटका नहीं है. यह एक नींव है.”

अगर जमात की चुनावी सफलता एक मोड़ है, तो उसके नेतृत्व की भाषा क्षेत्रीय स्तर पर नई स्थिति बनाने की कोशिश दिखाती है. पिछले कुछ दिनों में शफीकुर या उनकी पार्टी के सदस्यों ने एक बार भी पाकिस्तान का नाम नहीं लिया. वे सभी के साथ सहयोग की बात करते रहे.

अक्टूबर 2025 में न्यूयॉर्क में बोलते हुए शफीकुर ने बांग्लादेश-भारत संबंधों को लेकर अपनी व्यावहारिक सोच रखी. उन्होंने कहा, “अगर हमें देश चलाने का मौका मिलता है, तो भारत के साथ हमारा रिश्ता आपसी सम्मान पर आधारित होगा.” 67 वर्षीय शफीकुर ने आगे कहा, “लोग अपना रहने का स्थान बदल सकते हैं, लेकिन अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते. हम अपने पड़ोसी का सम्मान करना चाहते हैं और बदले में वही सम्मान चाहते हैं.”

उन्होंने माना कि क्षेत्रफल के लिहाज से भारत “बांग्लादेश से 26 गुना बड़ा है” और उसके पास ज्यादा संसाधन और जनशक्ति है. उन्होंने कहा, “हम उनकी स्थिति को देखते हुए उनका सम्मान करते हैं. लेकिन उन्हें भी हमारे छोटे से क्षेत्र और लगभग 18 करोड़ लोगों के अस्तित्व का सम्मान करना चाहिए. यह हमारी मांग है. अगर ऐसा होता है, तो दोनों पड़ोसी न सिर्फ अच्छे से रहेंगे बल्कि ग्लोबल स्टेज पर एक-दूसरे का सम्मान भी बढ़ाएंगे.”

संदेश लगातार एक जैसा रहा. चुनाव से एक दिन पहले विदेशी पत्रकारों से मुलाकात में भी शफीकुर ने भारत को “शीर्ष प्राथमिकता” बताया.

सभी प्रमुख पार्टियों में जमात का घोषणापत्र ही ऐसा था जिसमें भारत के साथ संबंधों का साफ तौर पर जिक्र किया गया और सौहार्दपूर्ण रिश्तों की बात की गई.

जैसा कि शहान ने कहा, “जमात विपक्ष में रहते हुए अपना भारत-विरोधी बयानबाजी जिंदा रखेगी. एक आम धारणा है कि जमात पाकिस्तान के इशारे पर काम करती है. लेकिन बांग्लादेश के कई आम मतदाता अपने समर्थन को भारत-पाकिस्तान के नजरिए से नहीं देखते.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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