ढाका: “मुझे जनमत संग्रह समझ में नहीं आता. मैंने इसे पढ़ा नहीं है. लेकिन मैंने फेसबुक पर रील्स देखी हैं और मुझे लगता है कि यह देश के लिए अच्छा है,” ढाका के गुलशन इलाके में चाय बेचने वाले 23 साल के मोहम्मद इमरान खान ने कहा.
बांग्लादेश में आखिरी बार संवैधानिक जनमत संग्रह हुए तीन दशक से ज्यादा समय बीत चुका है. अब 12 फरवरी को मतदाता फिर से वोट डालने जाएंगे. वे सिर्फ नई संसद नहीं चुनेंगे, बल्कि जुलाई नेशनल चार्टर के भविष्य पर भी फैसला करेंगे. यह बड़ा सुधार ढांचा 2024 के एंटी-हसीना आंदोलन के बाद तैयार किया गया था और अंतरिम सरकार ने इसे मंजूरी दी है.
लेकिन ढाका की सड़कों पर इस दस्तावेज को लेकर बहुत कम जानकारी दिखी, जो देश का भविष्य तय करने वाला है. कुछ लोगों को तो यह भी नहीं पता था कि उन्हें मतदान के दिन जनमत संग्रह में भी वोट देना है.
लिंकन स्टीफन साराओ, 33 साल के हैं और गुलशन में एक कॉफी शॉप में काम करते हैं. यह इलाका बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के चेयरमैन तारिक रहमान के घर के ठीक पीछे है. उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि जनमत संग्रह में ‘हां’ वोट दें या ‘नहीं’. “मैंने सारे प्रस्तावित सुधार पढ़े हैं, लेकिन मुझे बताया गया कि कुल मिलाकर ‘हां’ बनाने के लिए मुझे सब पर ‘हां’ वोट देना होगा.”
अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने सोमवार को इस जनमत संग्रह को एक अहम मोड़ बताया. उन्होंने कहा कि अगर मतदाता जुलाई नेशनल चार्टर को मंजूरी देते हैं, तो देश में “बुनियादी बदलाव” होगा और खराब शासन दोबारा नहीं लौटेगा.
“अगर जनमत संग्रह में ‘हां’ की जीत होती है, तो बांग्लादेश का भविष्य ज्यादा सकारात्मक तरीके से बनेगा,” उन्होंने तेजगांव स्थित अपने कार्यालय में कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में वरिष्ठ सचिवों को संबोधित करते हुए कहा.
यूनुस के मुताबिक, एक साथ चुनाव और जनमत संग्रह होना, जो देश के इतिहास में पहली बार हो रहा है, बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था में “अभूतपूर्व बदलाव” लाएगा.
लेकिन आधिकारिक आशावाद के नीचे कानूनी, राजनीतिक और वैधता से जुड़े कई सवाल हैं, खासकर जुलाई नेशनल चार्टर को लेकर.
बांग्लादेश में पहले जनमत संग्रह संवैधानिक बदलावों पर केंद्रित रहे हैं. आखिरी जनमत संग्रह 1991 में हुआ था, जिसमें 35.2 प्रतिशत मतदान हुआ और 83.6 प्रतिशत लोगों ने संसदीय लोकतंत्र बहाल करने के पक्ष में वोट दिया. इससे पहले 1979 में राष्ट्रपति जियाउर रहमान के कार्यकाल में पारित पांचवें संशोधन ने संविधान की प्रस्तावना या कुछ खास धाराओं में बदलाव के लिए जनमत संग्रह अनिवार्य किया था.
यह शर्त 2011 में अवामी लीग सरकार के दौरान पंद्रहवें संशोधन से हटा दी गई थी. इस संशोधन में केयरटेकर सरकार व्यवस्था खत्म की गई, धर्मनिरपेक्षता बहाल की गई, चार मूल सिद्धांतों यानी राष्ट्रवाद, समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को दोबारा स्थापित किया गया, संसद में महिलाओं की आरक्षित सीटें 50 की गईं, और शेख मुजीबुर रहमान को ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में मान्यता दी गई.
अब फिर से दांव संविधान पर है.
उलझे हुए मतदाता
ढाका के संवैधानिक विश्लेषक रेजाउर रहमान लेनिन ने कहा कि संसदीय चुनाव से ज्यादा विवाद जनमत संग्रह को लेकर है. “मुख्य मुद्दा शायद जनमत संग्रह ही है,” उन्होंने कहा. उन्होंने बताया कि मतदाताओं से एक ही ‘हां’ या ‘नहीं’ वोट देने को कहा जा रहा है, जबकि चार्टर में चार बड़े सुधार प्रस्ताव एक साथ जोड़े गए हैं, जिनमें दो सदनों वाली संसद और केयरटेकर सरकार व्यवस्था में बदलाव शामिल हैं.
“जब कंसेंसस कमीशन ने जुलाई नेशनल चार्टर पर काम किया था, तब भी यही हुआ,” उन्होंने कहा. “लोग एक सुधार का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन दूसरे का विरोध कर सकते हैं.”

उन्होंने यह भी कहा कि लोगों में जागरूकता कम है. “लोगों को सच में नहीं पता कि ये सुधार क्या हैं और उन्हें क्यों समर्थन करना चाहिए,” उन्होंने कहा. उनका कहना है कि गरीब शहरी इलाकों में इतने जटिल सवालों के बीच सही सहमति बनाना मुश्किल है.
ढाका की मानवाधिकार संस्था एमएसएफ से जुड़ी वकील नूरझत ने भी सहमति जताई. “कोई ठीक से समझाता ही नहीं कि जनमत संग्रह किस बारे में है. ‘हां’ या ‘नहीं’ से किसे फायदा होगा और इसका क्या मतलब निकलेगा. एक मतदाता के तौर पर मुझे पता नहीं था,” उन्होंने कहा.
नेशनल सिटिजन पार्टी और बीएनपी के कार्यकर्ताओं ने बताया कि हर चुनावी रैली में उम्मीदवार मतदाताओं से ‘हां’ कहलवाते हैं. ढाका के करवान बाजार में सड़क किनारे दुकान चलाने वाले अहमद अली ने साफ कहा, “मुझे पता है कि मुझे ‘हां’ वोट देना है. किसी को इसके बारे में बात करते सुना था, लेकिन मुझे नहीं पता यह किस बारे में है. क्या वोट पार्टियों के बीच नहीं होता?”
संवैधानिक वैधता भी एक बड़ा सवाल है.
लेनिन के मुताबिक, कई कानूनी विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों, जिनमें अवामी लीग और जातीय पार्टी शामिल हैं, ने इस प्रक्रिया को असंवैधानिक बताया है. उनका कहना है कि अंतरिम सरकार के पास इतना बड़ा संवैधानिक बदलाव शुरू करने का अधिकार नहीं है.
“इस अंतरिम सरकार ने मौजूदा संविधान के तहत शपथ ली है,” उन्होंने कहा. “मेरे जैसे कोई भी संवैधानिक वकील मानेगा कि यह उस ढांचे को पार नहीं कर सकती.”
उन्होंने निष्पक्षता पर भी सवाल उठाया. उनका कहना है कि अंतरिम प्रशासन, यहां तक कि मुख्य सलाहकार भी, खुलकर ‘हां’ के लिए प्रचार कर रहे हैं. “यह कानून के शासन के सिद्धांत का उल्लंघन है. अंतरिम सरकार राजनीतिक सरकार नहीं होती,” उन्होंने कहा.
बदलता माहौल और गठबंधन
जनमत संग्रह पर राजनीतिक रुख भी एक जैसा नहीं है.
अवामी लीग इसका विरोध करती है, लेकिन उसे इसके खिलाफ प्रचार करने की अनुमति नहीं है. दूसरी ओर बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी, एनसीपी और अंतरिम सरकार ‘हां’ के समर्थन में हैं.
एनसीपी का रुख जटिल है. उसके छात्र नेताओं ने चुनाव से पहले चार्टर लागू करने की मांग की थी, लेकिन पार्टी ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए और कुछ प्रक्रियात्मक गारंटी की शर्त रखी. कुछ शर्तें मानी गईं, कुछ नहीं.
जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन के बाद एनसीपी अब इसके लागू होने के पक्ष में प्रचार कर रही है, हालांकि जमात ने गैरकानूनी गिरफ्तारी, यातना और इस्लामी विद्वानों व मदरसा छात्रों की हत्या पर कड़े शब्द जोड़ने की मांग की है.
बीएनपी अध्यक्ष तारिक रहमान के ‘हां’ समर्थन ने भी सवाल खड़े किए हैं कि पार्टी संसद के जरिए काम करेगी या सीआरसी के रास्ते.
एनसीपी जिलों में जनमत संग्रह के समर्थन में अभियान चला रही है. बीएनपी कहती है कि अगर वह सत्ता में आई तो नए सांसद ही लागू करने की दिशा तय करेंगे.
बांग्लादेश में पहले तीनों जनमत संग्रह संकट के समय हुए थे.

1977 और 1985 के जनमत संग्रह को जियाउर रहमान और हुसैन मोहम्मद इरशाद की सैन्य सरकारों को वैधता देने की कोशिश माना गया. जबकि 1991 का जनमत संग्रह संसदीय लोकतंत्र की वापसी का संकेत था.
1975 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद देश में तख्तापलट का दौर चला और 1977 में जियाउर रहमान राष्ट्रपति बने.
उस साल जनमत संग्रह में पूछा गया था कि क्या लोगों को उन पर और उनकी नीतियों पर भरोसा है. आधिकारिक नतीजों में 88.05 प्रतिशत मतदान और 98.88 प्रतिशत ‘हां’ वोट बताया गया.
1985 में इरशाद के समय भी ऐसा ही हुआ, जहां 72.44 प्रतिशत मतदान के साथ 94.11 प्रतिशत समर्थन दिखाया गया.
1991 का जनमत संग्रह सीधे संवैधानिक सवाल पर था, जिसमें संसदीय सरकार बहाल की गई और राष्ट्रपति को औपचारिक भूमिका में सीमित कर दिया गया.
जुलाई नेशनल चार्टर क्या कहता है
जुलाई नेशनल चार्टर प्रधानमंत्री की शक्तियां कम करने, राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ाने, अनुच्छेद 6(2) में “बंगाली” की जगह “बांग्लादेशी” शब्द लाने और दो सदनों वाली संसद जैसे ढांचागत सुधार का प्रस्ताव रखता है.
इसमें कुल 84 सुधार प्रस्ताव हैं. 47 संवैधानिक संशोधन से और 37 कानून या कार्यकारी आदेश से लागू होंगे. अगर इसे मंजूरी मिलती है, तो अगली संसद को 270 दिनों में इन्हें लागू करना होगा, वरना अंतरिम सरकार का विधेयक अपने आप लागू हो जाएगा.
अगर जनमत संग्रह में मंजूरी मिलती है, तो सभी मातृभाषाओं को बांग्ला के साथ राज्य भाषा का दर्जा मिलेगा और नागरिकों की पहचान “बांग्लादेशी” के रूप में होगी, न कि “बंगाली राष्ट्र” के रूप में.
संविधान के मूल सिद्धांत भी बदलेंगे. बंगाली राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की जगह समानता, मानव गरिमा, सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और सद्भाव को रखा जाएगा.

दो नए मौलिक अधिकार जोड़े जाएंगे. बिना रुकावट इंटरनेट की पहुंच और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा.
राष्ट्रपति का चुनाव गुप्त मतदान से होगा, न कि सार्वजनिक वोट से. वह कई आयोगों के प्रमुखों की नियुक्ति बिना प्रधानमंत्री से सलाह लिए कर सकेंगे.
राष्ट्रपति अपराधियों को तभी माफी दे सकेंगे जब पीड़ित या उनके परिवार की सहमति हो. महाभियोग के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा.
प्रधानमंत्री अधिकतम दो कार्यकाल या कुल 10 साल तक ही पद पर रह सकेंगे. वे एक साथ कई पद नहीं रख सकेंगे. आपातकाल की घोषणा के लिए पूरे मंत्रिमंडल की मंजूरी जरूरी होगी और उसमें विपक्ष मौजूद होगा.
संसद अब दो सदनों वाली होगी. एक नया उच्च सदन बनेगा, जिसमें 100 सदस्य होंगे. उच्च सदन की सीटें चुनाव में मिले वोटों के हिसाब से बांटी जाएंगी. महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें धीरे-धीरे 50 से बढ़ाकर 100 कर दी जाएंगी. उपाध्यक्ष विपक्ष के दल से चुना जाएगा. सांसद बजट और विश्वास मत के अलावा अन्य मामलों में अपने अनुसार वोट कर सकेंगे.
बीएनपी ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की शक्तियों से जुड़े प्रस्तावित बदलावों से सहमति नहीं जताई है.
बीएनपी के एक सदस्य ने, नाम न बताने की शर्त पर, कहा कि राष्ट्रपति पद को मजबूत करना ढांचे के लिहाज से जोखिम भरा है.
राष्ट्रपति का सीधा चुनाव जनता नहीं करती और प्रधानमंत्री की तरह वह सीधे राजनीतिक रूप से जवाबदेह नहीं होते. उनका कहना है कि अगर राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ती हैं, तो सत्ता ऐसे पद में सिमट सकती है जिसके पास साफ जनादेश नहीं है.
यह भी चिंता है कि इससे सेना के दखल का खतरा बढ़ सकता है. मौजूदा ढांचे में सशस्त्र बल राष्ट्रपति के अधीन होते हैं.
राष्ट्रपति पद को मजबूत करना अनजाने में सेना के प्रभाव या तख्तापलट के रास्ते फिर खोल सकता है. यह डर बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास से जुड़ा है.
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि इन सुधारों से प्रधानमंत्री की शक्तियां काफी कम हो जाएंगी, जिसे कई लोग सुधार नहीं बल्कि अस्थिरता मानते हैं. प्रस्तावित ढांचे में गैर-निर्वाचित संस्थाओं, खासकर न्यायपालिका की भूमिका भी बढ़ेगी.
बांग्लादेश में पाकिस्तान से भी तुलना की जा रही है, जहां पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को संसदीय महाभियोग के जरिए हटाया गया था, जब उन्होंने कार्यपालिका की शक्तियों में बदलाव की कोशिश की थी.
एक विश्लेषक ने, नाम न बताने की शर्त पर, कहा कि उनका पतन दिखाता है कि प्रधानमंत्री की स्थिति कमजोर करने से पहले संस्थागत संतुलन जरूरी है.
उनके मुताबिक, अमेरिका और तुर्की जैसे देशों में राष्ट्रपति की शक्ति सीधे चुनाव से आती है, जो बांग्लादेश में नहीं है. उनका कहना है कि उन प्रणालियों के कुछ हिस्से बिना उनके चुनावी आधार के अपनाने से ऐसा ढांचा बन सकता है जो न तो स्थिर होगा और न ही जवाबदेह.
“शेख हसीना यह बात अच्छी तरह समझती थीं,” विश्लेषक ने कहा. “उनकी कमियां अपनी जगह, लेकिन वह जानती थीं कि प्रधानमंत्री कमजोर नहीं हो सकता.”
नए रूप में संसद
जुलाई नेशनल चार्टर (संवैधानिक सुधार), 2025 के इम्प्लीमेंटेशन ऑर्डर के मुताबिक, अगर जनमत संग्रह सफल होता है तो 13वीं संसद को 180 कार्यदिवसों के लिए एक संवैधानिक सुधार परिषद (CRC) में बदल दिया जाएगा.
इस प्रावधान ने संवैधानिक विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है.
पारंपरिक संवैधानिक सोच कहती है कि संसद को अपनी ताकत संविधान से मिलती है. लेनिन कहते हैं कि जब एक कार्यकारी आदेश के जरिए पहले से ही सुधार की सामग्री और प्रक्रिया तय कर दी जाती है, तो संसद कार्यपालिका के अधीन हो जाती है.
चिंता और बढ़ जाती है क्योंकि राजनीतिक बहिष्कार भी हुआ है.
बांग्लादेश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अवामी लीग का पंजीकरण रद्द कर दिया गया है और उसे राजनीतिक गतिविधियों से, चाहे वह मैदान में हों या ऑनलाइन, रोक दिया गया है.
जतिया पार्टी (इरशाद), जतिया समाजतांत्रिक दल और वर्कर्स पार्टी को भी उस संवाद से बाहर रखा गया, जिससे यह चार्टर बना.
इसका मतलब है कि यह जनमत संग्रह बिना सभी राजनीतिक पक्षों की भागीदारी के कराया जा रहा है.
इम्प्लीमेंटेशन ऑर्डर में कहा गया है कि जुलाई नेशनल चार्टर को जुलाई आंदोलन में शामिल राजनीतिक दलों और गठबंधनों ने “संयुक्त रूप से हस्ताक्षर कर पुष्टि की” थी.
लेकिन नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP), जिसे हसीना विरोधी आंदोलन का चेहरा माना जाता है, ने जुलाई नेशनल चार्टर पर हस्ताक्षर नहीं किए. अन्य पार्टियों ने भी इससे खुद को अलग कर लिया या समर्थन देने से इनकार कर दिया.
अब दांव पर क्या है
वकील और मनुषेर पासे फाउंडेशन के सदस्य मोहम्मद दिलावर इस जनमत संग्रह का समर्थन करते हैं. उनके मुताबिक, यह “फासीवाद” को उभरने देने वाली खामियों को बंद करेगा, शक्तियों के अलगाव को सुनिश्चित करेगा और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देगा.
फिर भी उम्मीदवार और विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर सीमित सार्वजनिक समझ के साथ जनमत संग्रह कराया गया तो अस्थिरता लंबी खिंच सकती है.
नूरझात ने कहा, “जनमत संग्रह के विचार और मकसद को लेकर आम लोगों में बहुत कम समझ है.” उन्होंने आगे कहा, “इन दोनों प्रक्रियाओं के नतीजे तनाव पैदा कर सकते हैं.”
जैसे-जैसे बांग्लादेश 12 फरवरी के करीब पहुंच रहा है, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वोटर ‘हां’ कहेंगे या ‘नहीं’, बल्कि यह भी है कि क्या पूरी प्रक्रिया को स्थायी वैधता मिल पाएगी और क्या बहिष्कार से पैदा हुई संवैधानिक व्यवस्था एक गहरे बंटे हुए समाज को चला पाएगी.
लेनिन के शब्दों में, “कुल मिलाकर, हमारे सामने एक अराजक भविष्य है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
