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Thursday, 19 March, 2026
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पाकिस्तान ने ईसाइयों से इस्लामाबाद की कॉलोनी खाली करने को कहा, बताई—सरकारी ज़मीन

इस्लामाबाद की सबसे बड़ी अनौपचारिक बस्तियों में से एक, रिमशा कॉलोनी हज़ारों मेहनतकश निवासियों का घर है; इनमें से कई ईसाई हैं जो सफ़ाईकर्मी और घरेलू मज़दूर के तौर पर काम करते हैं.

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नई दिल्ली: इस्लामाबाद की रिमशा कॉलोनी में रहने वाले 25,000 से ज़्यादा ईसाइयों पर पाकिस्तान की कार्रवाई के कारण अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है. उन पर सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करने का आरोप लगाया गया है.

कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी (CDA) ने पिछले हफ़्ते रिमशा, अल्लामा इक़बाल और अकरम मसीह गिल झुग्गी बस्तियों के निवासियों को बेदखल करने का आदेश दिया था. इन आदेशों की घोषणा मेगाफ़ोन के ज़रिए की गई थी. इसके बाद तोड़फोड़ की कार्रवाई शुरू हो गई.

क्रिश्चियन डेली इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद की रिमशा कॉलोनी के आस-पास की अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले स्थानीय लोगों ने बताया कि अधिकारियों ने उन्हें सरकारी ज़मीन खाली करने के लिए मौखिक चेतावनी दी थी, जिसके कारण विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और मानवाधिकार समूहों के बीच चिंता बढ़ गई.

कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा पिछले हफ़्ते जारी किए गए ये नोटिस राजधानी भर की कई कम आय वाली बस्तियों पर लागू होते हैं, जिनमें रिमशा कॉलोनी और शरपार कॉलोनी शामिल हैं. निवासियों का कहना है कि इन चेतावनियों के कारण उन समुदायों में भारी चिंता फैल गई है जो एक दशक से भी ज़्यादा समय से यहां बसे हुए हैं.

12 मार्च से ही स्थानीय लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि बिना पुनर्वास योजना के की गई बेदखली के कारण हज़ारों लोग बेघर हो सकते हैं. समुदाय के नेताओं ने यह भी कहा कि ज़्यादातर परिवारों के पास दूसरी जगह जाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं और उन्हें पाकिस्तान के आवास बाज़ार में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके विकल्प और भी सीमित हो जाते हैं.

फ़राज़ परवेज़, एक पाकिस्तानी ईसाई कार्यकर्ता, जिन पर पहले पाकिस्तान सरकार द्वारा ईशनिंदा का आरोप लगाया गया था, ने दिप्रिंट को बताया, “ये संकेत (विरोध प्रदर्शन) उत्पीड़न के खिलाफ़ आवाज़ उठाते हैं, मसीह के प्रति हमारे प्रेम की घोषणा करते हैं और ऐसी धरती पर न्याय की मांग करते हैं जहां अक्सर न्याय से वंचित रखा जाता है. हमें न तो चुप कराया जा सकता है और न ही हमारे विश्वास या हमारे घरों से बेदखल किया जा सकता है. क्रॉस हमेशा अटल रहता है, और उसी तरह हमारी गरिमा और स्वतंत्रता की लड़ाई भी अटल है.”

‘वे कहां जाएंगे?’

राजधानी की सबसे बड़ी अनौपचारिक बस्तियों में से एक, रिमशा कॉलोनी, हज़ारों मेहनतकश निवासियों का घर है; इनमें से कई ईसाई हैं जो सफ़ाई कर्मचारी, घरेलू कामगार और निर्माण श्रमिक के रूप में काम करते हैं. कई परिवारों के लिए, यह कॉलोनी वर्षों की उथल-पुथल के बाद स्थिरता का प्रतीक है. रिमशा कॉलोनी असल में 2011 में राज्य सरकार द्वारा इन मेहनतकश लोगों को दी गई थी. इस कॉलोनी का नाम रिमशा मसीह की याद में रखा गया था; वह एक मानसिक रूप से दिव्यांग लड़की थी जिसे ईशनिंदा के झूठे आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था. उस पर आरोप था कि उसने कथित तौर पर कुरान के पन्ने जलाए थे. इन आरोपों ने आस-पास के इलाकों में डर और हिंसा फैला दी, जिससे कई ईसाई परिवारों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा.

समुदाय के नेताओं के अनुसार, विस्थापित परिवारों को बाद में उस जगह पर अस्थायी रूप से बसने की अनुमति दी गई थी.

जो जगह शुरू में टेंट की बस्ती थी, वह धीरे-धीरे एक स्थायी मोहल्ले में बदल गई, जिसे अब रिमशा कॉलोनी के नाम से जाना जाता है. आज, यह और अकरम गिल कॉलोनी मिलकर लगभग 25,000 निवासियों का घर हैं.

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने बुधवार को कहा कि अधिकारियों ने शुरू में इन परिवारों को इस इलाके में बसने की अनुमति दी थी, लेकिन अब वे उन्हें वहां से हटाना चाहते हैं.

आयोग ने कानूनी चिंताएं भी जताईं, और पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के 2015 के एक स्टे ऑर्डर (रोक आदेश) का हवाला दिया, जो उचित पुनर्वास के बिना अनौपचारिक बस्तियों से लोगों को बेदखल करने पर रोक लगाता है.

अल्पसंख्यक अधिकारों के पैरोकारों ने भी इन चिंताओं को दोहराया, और पाकिस्तान की 2001 की राष्ट्रीय आवास नीति का हवाला दिया, जो औपचारिक पुनर्वास के बिना बेदखली को हतोत्साहित करती है. उन्होंने इस तथ्य पर भी जोर दिया कि कई निवासियों के पास राष्ट्रीय पहचान पत्र हैं जिन पर इन्हीं बस्तियों के पते दर्ज हैं, और बिजली व गैस जैसी बुनियादी सुविधाएं भी वहां लगाई गई हैं — उनके अनुसार, ये इस बात के संकेत हैं कि सरकार ने लंबे समय से इन बस्तियों को मान्यता दे रखी है.

शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता ज़ीबा हाशमी ने फेसबुक पर लिखा कि इन समुदायों को पिछले कुछ वर्षों में शहर के साथ प्रभावी ढंग से एकीकृत कर लिया गया है; वहां स्कूल स्थापित हो चुके हैं और नागरिक जीवन में उनकी भागीदारी सामान्य हो गई है.

“लोगों ने यहीं अपना जीवन बसाया है,” उन्होंने लिखा. “ज़रा सोचिए कि अगर उन्हें ज़बरदस्ती वहां से निकाल दिया जाए तो कितनी बड़ी तबाही मच जाएगी. वे आखिर कहां जाएंगे?”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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