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Wednesday, 29 May, 2024
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ईरान-इज़राइल संघर्ष का भविष्य अब तय करेंगे तीन H- हूती, हमास और हिजबुल्लाह

ईरान के जवाबी हमले पर इज़राइल की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत छोटी थी और तेहरान ने भी इसे कम महत्व दिया. लेकिन ऐसे कारक हैं जो इस कथित राहत को ख़तरे में डाल सकते हैं.

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नई दिल्ली: 14 अप्रैल को इज़राइल के खिलाफ ईरान के जवाबी हमले के बारे में बताते हुए लगभग हर वैश्विक समाचार पत्र में इसे “अभूतपूर्व” बताया गया. इस हमले का बेंजामिन नेतन्याहू सरकार ने शुक्रवार सुबह इस्फ़हान में एक ईरानी एयरबेस पर मिसाइलें दागकर सैन्य रूप से जवाब दिया.

पिछले हफ्ते ईरान का जवाबी हमला बिल्कुल अप्रत्याशित नहीं था – तेहरान ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह 1 अप्रैल को सीरिया में अपने वाणिज्य दूतावास पर एक संदिग्ध इजरायली हमले का जवाब देगा जिसमें उसके दो वरिष्ठ सैन्य कमांडर मारे गए थे. इसने अपने ऑपरेशन का नाम “ट्रू प्रॉमिस” रखा, जो इसके राजनयिक मिशन पर हमला करने वालों को दंडित करने की अपनी प्रतिज्ञा को दर्शाता है.

लेकिन इसके पहले न तो ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के हमले – लगभग 300 – का कोई उदाहरण मिलता है और न ही इज़राइल द्वारा दिए गए इसके जवाब का. 45 वर्षों के शैडो वॉर के बाद यह पहली बार था, कि हमने उस क्षेत्र के दो कट्टर शत्रुओं के बीच सीधा टकराव देखा. और यही कारण है कि इज़राइल-ईरान संघर्ष में हिंसा का जो नया मोड़ आया है और जिसे अब सीधे टकराव के रूप में देखा जा रहा है, वह दिप्रिंट का इस सप्ताह का न्यूज़मेकर है.

कुछ लोग इसे ईरान द्वारा सीधे टकराने या युद्ध शुरू करने के रूप में देखते हैं. लेकिन कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इसके पीछे तेहरान का उद्देश्य न सिर्फ इज़राइल बल्कि को बल्कि इस क्षेत्र में अपने खुद के प्रॉक्सी यानि उसकी जगह युद्ध करने वाले मुखौटों को भी संदेश भेजना शामिल है.

चैथम हाउस थिंक टैंक में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका कार्यक्रम के निदेशक सनम वकील ने द गार्डियन को बताया: “ईरान की गणना यह थी कि अगर उसने जवाब नहीं दिया, तो इज़राइल पूरे क्षेत्र में उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता रहेगा. यह इसकी सीमा रेखा को तय करने और कुछ हद तक इज़राइल को रोकने के लिए था.”

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पांच दिनों तक दुनिया सांसें थाम कर इजराइल की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही थी. संघर्ष को बढ़ने से रोकने के प्रयासों में जर्मन और ब्रिटिश विदेश मंत्रियों ने इस सप्ताह की शुरुआत में इज़राइल के लिए उड़ान भरी, लेकिन यह स्पष्ट था कि इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जवाबी हमला करने जा रहे थे. मुद्दा सिर्फ इतना था कि कब और कैसे.

पारंपरिक रणनीतियों से विमुखता

दशकों के गुप्त अभियानों, साइबर हमलों और छद्म युद्धों के बाद एक-दूसरे की धरती पर सीधे हमले शुरू करके, इज़राइल और ईरान ने लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति की रणनीतियों को अलग मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है.

एक ओर, ईरान ने हमेशा “रणनीतिक धैर्य” की नीति का पालन किया है, जिसमें मध्य पूर्व में इज़राइल और उसके पश्चिमी सहयोगियों से लड़ने के लिए छद्म ताकतों को शामिल करना, साथ ही क्षेत्र में शक्ति का प्रदर्शन करना भी शामिल है. लेबनान में हिज़्बुल्लाह इसका प्रमुख उदाहरण है. 1982 में, जब इज़राइल ने फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) को बाहर निकालने के लिए लेबनान पर आक्रमण किया, तो ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने सीरिया में “पैगंबर मोहम्मद कॉर्प्स” को भेजा, जिसे बाद में इजरायल के खिलाफ लड़ने के लिए लेबनान भेजा गया था. यहीं से हिजबुल्लाह का जन्म हुआ.

गल्फ इंटरनेशनल फोरम के लिए एक लेख में रूसी और मध्य पूर्वी अध्ययन के जानकार और दक्षिण फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में पीएचडी उम्मीदवार अरमान महमूदियन बताते हैं, “इस्लामिक गणराज्य एक अस्तित्ववादी शासन है.”

उन्होंने आगे कहा, “हिजबुल्लाह के मूलभूत उद्देश्य से सवाल उठता है: आतंकवादी समूह अब तक टकराव से क्यों बचता रहा है? संक्षिप्त उत्तर यह है कि हिज़्बुल्लाह इतनी मूल्यवान संपत्ति है कि उसे लापरवाही से तैनात नहीं किया जा सकता,”

इज़राइल में 300 ड्रोन और मिसाइलें दाग करके, तेहरान ने प्रभावी रूप से इस नीति और इज़राइल पर सीधे हमला करने में सावधानी बरतने को त्याग दिया.

इसी तरह, ऐसा लगता है कि इज़राइल अपने “रिवर्स पेरीफेरी सिद्धांत” से भटक गया है. इससे पहले, इज़राइल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन के शासनकाल में इज़राइल ने मध्य-पूर्व में अपने अलग-थलग पड़ने को समाप्त करने के लिए “परिधि सिद्धांत” का पालन किया था. यह विचार मध्य-पूर्व के ‘किनारों’ पर गैर-अरब राज्यों, मुख्य रूप से ईरान और तुर्की के साथ संबंधों को बेहतर बनाना था.

‘मौन’ प्रतिक्रियाएं

ईरान और इज़राइल के अपनी पारंपरिक रणनीतियों से हटने के साथ, बड़ा सवाल यह है कि क्या एक घमासान युद्ध होने वाला है और क्या यह ऐसा युद्ध है जो इज़राइल के सहयोगी, अमेरिका को भी इसमें खींच सकता है. फ़िलहाल, दो कारणों से वे डर ख़त्म होते दिख रहे हैं.

सबसे पहले, जैसे को तैसा के हमलों के बाद इज़राइल और ईरान की प्रतिक्रियाएं, जिन्हें कुछ समाचार पत्रों ने “मौन” बताया है. दूसरा, शुक्रवार की सुबह इज़राइल द्वारा अपेक्षाकृत छोटे पैमाने पर किए गए हमले, जिससे कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि पारंपरिक रूप से युद्ध के निरोध की नीति वापस आ गई है.

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में शुक्रवार के हमले पर इजरायली नेतृत्व की ओर से आधिकारिक टिप्पणी के होने का उल्लेख किया गया, जबकि ईरानी टेलीविजन रिपोर्ट्स ने इजरायल के बारे में बताने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामान्य शब्द – “ज़ियोनिस्ट एंटिटी” का प्रयोग न करके “हमले को कम महत्व दिया”.

ऐसा लगता है कि ईरानी राज्य मीडिया ने वादी-ए-रहमत नामक क्षेत्र के पास ताब्रीज़ में विस्फोट की आवाज़ को कमतर करके बताया है, जिसके बारे में इस्लामिक रिपब्लिक न्यूज़ एजेंसी (आईआरएनए) ने कहा है कि यह वर्तमान में “शांतिपूर्ण स्थिति” में है.

इसके अलावा, रविवार को ईरान के हमले और शुक्रवार को इज़राइल के हमले के बाद किसी के मरने का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी देश में किसी भी परमाणु स्थल को निशाना नहीं बनाया गया. अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक और लेखक इयान ब्रेमर जैसे विशेषज्ञ तो यहां तक कह चुके हैं कि इजराइल का हमला “युद्ध को कम या खत्म करने की कोशिश वाला” था.

क्या ऐसा हो सकता है कि नेतन्याहू की वॉर कैबिनेट ने अंततः ईरान के 300 ड्रोन और मिसाइलों के बदले अपेक्षाकृत छोटे हमले करने का विकल्प इसलिए चुना क्योंकि जो बाइडेन प्रशासन ने कहा था कि वह इज़राइल की ओर से किसी भी बदले की प्रक्रिया में उठाए गए कदम में शामिल नहीं होगा? या शायद छोटे पैमाने पर किया गया हमला देश में समर्थन जुटाने के लिए काफी था साथ ही साथ कुछ राजनयिक समर्थन को बचाने में भी मदद मिली जो कि गाज़ा पर हमले के बाद इसकी आलोचना की जा रही थी.

किसी भी तरह, ईरान प्रतिक्रिया देने के लिए उत्सुक नहीं दिखता. एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि शुक्रवार के हमले के लिए इज़राइल के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने की कोई योजना नहीं थी.

क्या इसका मतलब यह है कि चीजें यथास्थिति में लौट आई हैं? इसका छोटा से जवाब है- ‘नहीं’. इज़राइल और ईरान दोनों को “रणनीतिक धैर्य” और “रिवर्स पेरीफेरी सिद्धांत” की अपनी-अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा. लाल सागर में एक नई बिसात बिछ चुकी है और कई तत्व अभी भी काम में हैं – यमन के हाउथी, गाजा में हमास और लेबनान में हिजबुल्लाह. इन क्षेत्र में कोई भी हलचल इस कथित राहत को ख़तरे में डाल सकती है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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