scorecardresearch
Monday, 9 March, 2026
होमThe FinePrintनेपाल में ‘बालेन वेव’, सबसे युवा पीएम के साथ नई राजनीति की शुरुआत

नेपाल में ‘बालेन वेव’, सबसे युवा पीएम के साथ नई राजनीति की शुरुआत

नेपाल में अब ‘बालेन वेव’ की चर्चा है. चार साल से भी कम पुरानी एक पार्टी सत्ता में आ गई है. क्या नेपाल अपनी हाल की उथल-पुथल भरी राजनीति में नया पन्ना पलटने वाला है?

Text Size:

काठमांडू: नेपाल की संसद में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को अभूतपूर्व बहुमत मिलने जा रहा है. इसके साथ ही हिमालयी देश को अब तक का सबसे युवा प्रधानमंत्री मिलने वाला है—35 साल के बालेन्द्र शाह. पहले वे काठमांडू के मेयर रहे हैं और चुनाव लड़ने से तीन महीने पहले ही अपेक्षाकृत नई आरएसपी पार्टी में शामिल हुए थे. शाह के नाम एक और रिकॉर्ड होगा कि वे पूरे उपमहाद्वीप के इतिहास में सबसे युवा प्रधानमंत्री बनेंगे.

नेपाल की राजनीति में अब विश्लेषकों के अनुसार ‘बालेन वेव’ देखने को मिल रही है. पत्रकार से नेता बने रबी लमिछाने ने 2022 में इस पार्टी की स्थापना की थी. 2023 के चुनाव में यह चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. लमिछाने को के.पी. ओली के प्रधानमंत्री रहने के दौरान धोखाधड़ी और नागरिकता से जुड़े आरोपों में जेल भेजा गया था. सितंबर में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान रिहा होने के बाद वे अधिकतर मंचों पर शाह के साथ दिखाई दिए और युवा जेन-ज़ी प्रदर्शनकारियों को आगे लाए.

और इसका असर दिखा: चुने गए 59 युवा सांसदों में से 51 आरएसपी से हैं.

जहां तक मतगणना पूरी हो चुकी है, वहां आरएसपी ने 165 में से 125 सीटें जीत ली हैं. नेपाल की संसद में कुल 275 सीटें हैं और दो-तिहाई बहुमत के लिए 184 सीटों की ज़रूरत होती है.

इनमें से 165 सीटों का फैसला सीधे वोटिंग से हुआ है, जबकि 110 आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली सीटों में से 58 के नतीजे आ चुके हैं. इससे पार्टी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से सिर्फ दो सीट पीछे है. प्रतिनिधि सभा के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में अब तक गिने गए वोटों में से आरएसपी को आधे से ज्यादा वोट मिले हैं. देशभर के मतगणना केंद्रों के ताज़ा संयुक्त आंकड़ों के अनुसार पार्टी को कुल 29,10,677 मतों में से 14,61,381 वोट मिले हैं, जो लगभग 50.2 प्रतिशत हैं.

अगर आरएसपी यह आंकड़ा हासिल कर लेती है, तो कई दशकों में पहली बार होगा जब किसी एक पार्टी को इतना बड़ा जनादेश मिलेगा. नेपाल की दोहरी मतदान प्रणाली, जिसमें सीधे चुनाव और आनुपातिक प्रतिनिधित्व दोनों शामिल हैं, की वजह से अब तक किसी भी पार्टी के लिए साधारण बहुमत पाना भी मुश्किल रहा है, दो-तिहाई बहुमत तो बहुत दूर की बात है.

अब नेपाल के सामने एक बड़ा सवाल है जो सिर्फ एक व्यक्ति की लोकप्रियता से कहीं ज्यादा बड़ा है: क्या शहर की राजनीति को बदलने वाली यह नई ऊर्जा एक ऐसे लोकतंत्र को संभाल पाएगी जो आर्थिक ठहराव, बड़े पैमाने पर पलायन और भारी भू-राजनीतिक दबाव का सामना कर रहा है?

बालेन शाह के लिए लोगों की पसंद हमेशा सीधी रही है. इंजीनियर और रैपर से नेता बने शाह 2022 के काठमांडू मेयर चुनाव में देश की बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों को हराकर चर्चा में आए थे. उन्होंने खुद को एक ऐसे सुधारक के रूप में पेश किया जो धीमी और अप्रभावी मानी जाने वाली राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देना चाहता है. उन्होंने अपने ही क्षेत्र झापा-5 में पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को हराया, जिससे उनके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया.

एक ऐसे देश में जहां पारंपरिक पार्टियां, जैसे नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट–लेनिनिस्ट) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) दशकों से राजनीति पर हावी रही हैं, शाह का उभार यह दिखाता है कि युवा मतदाताओं के बीच पुरानी राजनीतिक व्यवस्था पर भरोसा तेज़ी से कम हो रहा है.

घरेलू और वैश्विक चिंताएं

नेपाल की अर्थव्यवस्था काफी हद तक उन लाखों नागरिकों की मेहनत पर टिकी है जो विदेशों में काम करते हैं. जापान, खाड़ी देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया में काम करने वाले प्रवासियों द्वारा भेजा गया पैसा देश की आय का बड़ा हिस्सा है.

हाल के वर्षों में यह पैसा देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 23 प्रतिशत से 28 प्रतिशत तक रहा है. वित्त वर्ष 2024–25 में यह राशि रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई और देश के जीडीपी का 28.6 प्रतिशत हो गई. देश के कई गांवों में परिवार अक्सर अपने किसी बेटे, बेटी या माता-पिता के विदेश में काम करने पर निर्भर रहते हैं.

इतने बड़े स्तर पर पलायन ने नेपाल के समाज और राजनीति दोनों को बदल दिया है. इनमें से कई कामगार चुनाव में आसानी से वोट नहीं दे पाते, जबकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को विदेश में रहने वालों के लिए वोटिंग की व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए हैं. फिर भी प्रवासी लोग राजनीति को परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं और अपने घर वालों से सुधारवादी उम्मीदवारों को समर्थन देने को कहते हैं.

इस राजनीतिक बदलाव के पीछे गुस्सा आर्थिक कारणों से भी जुड़ा है. कई युवा नेपाली के लिए देश छोड़ने का फैसला विदेश में अवसर मिलने की वजह से नहीं बल्कि देश में अवसर की कमी की वजह से होता है. शुरुआती नौकरियों में सैलरी इतनी कम मिलती है कि शहर में रहने का खर्च, किराया, यात्रा और खाना जल्दी ही पूरी महीने की कमाई खत्म कर देता है.

अब जब शाह देश का नेतृत्व करेंगे, तो मतदाताओं की उनसे मुख्य उम्मीद साफ होगी: ऐसे रोज़गार पैदा करना ताकि युवाओं को देश छोड़कर बाहर जाने के लिए मजबूर न होना पड़े.

समर्थक शाह की काम करने की शैली को साहसी और समझौता न करने वाली बताते हैं. काठमांडू में उनके प्रशासन के दौरान कई सख्त कार्रवाई अभियान चलाए गए, जिनमें अवैध निर्माण को तोड़ना और सार्वजनिक जगहों से सड़क किनारे दुकानदारों को हटाना शामिल है.

इसके अलावा पार्टी के अंदर की राजनीति भी एक मुद्दा हो सकती है. पार्टी के संस्थापक और पूर्व पत्रकार रवी लमिछाने अपने मजबूत व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं. ऐसे में उनके लिए उस पार्टी में पीछे रहना आसान नहीं हो सकता जिसे उन्होंने खुद बनाया है.

उनकी पिछली प्रतिक्रियाएं, जैसे 2023 में नागरिकता से जुड़े सवालों के कारण गृह मंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर होने के बाद उनका गुस्सा, संकेत देती हैं कि ऐसे तनाव बढ़ भी सकते हैं.

शाह ने भी कई बार आक्रामक रुख दिखाया है. विश्लेषक प्रणय राणा ने नेपाल की बदलती राजनीति पर अपने लेख में लिखा है कि शाह ने कभी सिंह दरबार को जलाने की धमकी दी थी, वह भी उससे काफी पहले जब पिछले साल के अशांति के दौरान प्रदर्शनकारियों ने वास्तव में वहां आग लगा दी थी.

लमिछाने संभवतः फिर से उसी शक्तिशाली गृह मंत्रालय में लौटना चाहेंगे जो पहले उनके पास था, लेकिन लामिछाने से जुड़े कानूनी मामले स्थिति को और जटिल बना सकते हैं, जिससे शाह के सामने यह मुश्किल फैसला आ सकता है कि वे अपने पार्टी नेता को बचाएं या कानून के नियम को प्राथमिकता दें.

भू-राजनीति

नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित है, जबकि उसके अमेरिका के साथ भी बढ़ते संबंध हैं. नेपाल की पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का मसौदा तैयार करने का श्रेय पाने वाले ब्रिगेडियर केशर भंडारी (सेवानिवृत्त) ने द प्रिंट को बताया कि शाह शायद संतुलन बनाकर चलने की कोशिश करेंगे और संभव है कि वे अपनी पहली सरकारी यात्रा भारत की करें.

चीन के साथ नेपाल का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) है, जबकि अमेरिका ने स्टेट पार्टनरशिप प्रोग्राम जैसे सुरक्षा सहयोग प्रस्ताव आगे बढ़ाए हैं. इस प्रस्ताव ने नेपाल के अंदर काफी राजनीतिक बहस पैदा की थी.

झापा-5 में, जहां बालेन शाह ने ओली को हराया, वहां BRI के तहत एक परियोजना को पिछली सरकार पहले ही मंजूरी दे चुकी है और उस पर हस्ताक्षर भी हो चुके हैं. हालांकि, शाह के मौजूदा घोषणापत्र में इसका जिक्र नहीं है. इससे सवाल उठता है कि उस परियोजना का क्या होगा? चीन, जाहिर है, इसे बंद होने देना नहीं चाहेगा.

दिसंबर 2025 में नेपाल की भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी ने देश के इतिहास का ‘सबसे बड़ा भ्रष्टाचार मामला’ बताया जाने वाला केस भी दर्ज किया था. इसमें 55 वरिष्ठ नेपाली अधिकारियों और चीन की सरकारी ठेकेदार कंपनी CAMC के कर्मचारियों पर पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट परियोजना की लागत लगभग 74 मिलियन डॉलर बढ़ाने का आरोप लगाया गया. यह परियोजना चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का एक प्रमुख प्रोजेक्ट है.

इसी समय अमेरिका ने नेपाल को अपने सिक्योरिटी पार्टनरशिप प्रोग्राम (SPP) में शामिल करने की कोशिश की, जिसका उद्देश्य रक्षा सहयोग को बढ़ाना है. वहीं चीन ने जेन-Z विरोध प्रदर्शनों से ठीक पहले संसद में अपना ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव (GSI) प्रस्तावित किया था. ये दोनों पहलें नेपाल में रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने की बड़ी प्रतिस्पर्धा को दिखाती हैं.

फिलहाल शाह की लोकप्रियता इस बात पर टिकी है कि लोग उन्हें पारंपरिक राजनीति से अलग एक नई शुरुआत के रूप में देखते हैं. आगे यह बड़ा सवाल रहेगा कि वे घरेलू और क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ अपनी पार्टी के अंदर की राजनीति को कैसे संभालते हैं, और क्या RSP का भारी बहुमत नेपाल की सामान्य ‘घूमती हुई सरकार’ वाली राजनीति को बदल पाएगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: नेपाल में RSP और बालेन की जीत से नए दौर की शुरुआत. माओवादियों और पुराने नेताओं का युग खत्म


 

share & View comments