नई दिल्ली: भारत के लोगों को एक मैसेज में, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की मैनेजिंग डायरेक्टर, क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा, “आप खुशकिस्मत हैं कि आपके देश ने पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में इन्वेस्ट किया, एंटरप्रेन्योरशिप की रुकावटों को दूर किया, और आपके पास आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अपनाने वाली युवा, एनर्जेटिक, इनोवेटिव आबादी है.
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में “बिल्डिंग ट्रस्टेड एआई एट स्केल. सिटीज, स्टार्टअप्स एंड डिजिटल सॉवरेनिटी” शीर्षक वाले पैनल चर्चा में बोलते हुए आईएमएफ प्रमुख ने कहा, “देश अलग-अलग स्थिति में हैं. कुछ देशों में एआई कौशल की मांग ज्यादा है और आपूर्ति कम, जबकि कुछ में आपूर्ति ज्यादा है और मांग कम, और कुछ में दोनों ही नहीं हैं. इसलिए हमें देशों और स्थानीय इलाकों की वास्तविक स्थिति के आधार पर कई मोर्चों पर काम करना होगा.”
उन्होंने कहा कि आईएमएफ देशों के साथ काम करता रहेगा ताकि समझा जा सके कि क्या हो रहा है और संगठन भविष्य की नीतियों को कैसे तय कर सकता है.
उन्होंने कहा, “मैं अब तक तीन निष्कर्ष निकालूंगी, और हमें एआई को लेकर अपने नजरिए में लचीला रहना होगा. पहला, शिक्षा को नई दुनिया के अनुसार बदलना होगा. लोगों को सिर्फ खास कौशल नहीं, बल्कि सीखना कैसे है, यह सीखना होगा.
दूसरा, उन स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में लोगों को सहारा देना होगा जहां श्रम बाजार तेजी से बदल रहा है. सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक समर्थन जरूरी है, ताकि उनके साथ वही न हो जो अमेरिका में औद्योगिक मजदूरों के साथ हुआ जब उनकी नौकरियां विदेश चली गईं.”
उन्होंने कहा, “तीसरा, यह बहुत जरूरी है कि हम पूरे माहौल को देखें. क्यों कुछ जगहों पर एआई से काम तेजी से होता है और कुछ जगहों पर नहीं. हमें जो मिला, वह हैरान करने वाला नहीं है. अर्थव्यवस्था और समाज के कुछ हिस्से पहले से ही डिजिटल दुनिया का हिस्सा हैं, जहां मांग ज्यादा है. वहां उद्यमिता ज्यादा मजबूत है.”
उन्होंने कहा कि हमें ध्यान से देखना होगा कि वास्तव में क्या हो रहा है और फिर आगे की दिशा तय करनी होगी. “नीति बनाने वालों और फंड के लिए इसका क्या मतलब है. हमने एक बहुत रोचक शोध किया. अमेरिका में यह आकलन करते हुए कि एआई श्रम बाजार को कितना प्रभावित कर रहा है, हमने पाया कि हर दस में से एक नौकरी में पहले ही अतिरिक्त कौशल की जरूरत है. और जिनके पास ये कौशल हैं, उन्हें ज्यादा वेतन मिलता है.”
उन्होंने कहा, “अब जब लोगों के पास ज्यादा पैसा आता है तो वे स्थानीय सेवाएं ज्यादा खरीदते हैं. वे रेस्तरां और मनोरंजन पर खर्च करते हैं, जिससे कम कौशल वाली नौकरियों की मांग बढ़ती है. हमें हैरानी हुई कि कुल मिलाकर रोजगार पर असर सकारात्मक है. एआई से जुड़ी एक नौकरी कुल मिलाकर 1.3 नौकरियां पैदा करती है.”
उन्होंने कहा, “लेकिन इसका मतलब क्या है. इसका मतलब है कि एक छोटा वर्ग ज्यादा अवसर पाता है. एक बड़ा वर्ग हां, उन्हें नौकरी मिलती है, लेकिन कम वेतन वाली. सबसे ज्यादा समस्या उन लोगों की है जो बीच में फंस जाते हैं. उनकी नौकरियां नहीं बदलतीं. तुलना में उन्हें कम वेतन मिलता है और कुछ नौकरियां खत्म भी हो जाती हैं.”
एआई के कारण नौकरी जाने के डर पर बोलते हुए जॉर्जीवा ने कहा, “हमें सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि जो नौकरियां खत्म होती हैं, वे अक्सर शुरुआती स्तर की होती हैं. वे रोजमर्रा के काम वाली होती हैं और आसानी से ऑटोमेट हो सकती हैं. अगर आप श्रम बाजार के उस हिस्से में हैं जिसे आसानी से ऑटोमेट किया जा सकता है, तो यह आपके लिए जोखिम है.”
उन्होंने कहा, “दुनिया को बहुत ध्यान से देखना होगा कि क्या काम कर रहा है और क्या नहीं, और तस्वीर को मीठा बनाकर पेश नहीं करना चाहिए. अगर हम ऐसा करेंगे तो लोग वैश्वीकरण के खिलाफ खड़े हो जाएंगे, जबकि उससे फायदे भी हुए हैं. हां, दुनिया को कुल मिलाकर फायदा हुआ, लेकिन कुछ समुदाय बुरी तरह प्रभावित हुए और दुनिया ने समय रहते उनकी ओर ध्यान नहीं दिया.”
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