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Thursday, 10 September, 2026
होमविदेशभारत को मक्का समझौते पर नजर रखनी चाहिए, पर घबराना नहीं चाहिए: भारत के पूर्व राजदूत संजय भट्टाचार्य

भारत को मक्का समझौते पर नजर रखनी चाहिए, पर घबराना नहीं चाहिए: भारत के पूर्व राजदूत संजय भट्टाचार्य

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए समझौते का पूरा ब्योरा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. राजदूत ने कहा कि जब तक पूरी जानकारी सामने नहीं आ जाती, तब तक भारत को जल्दबाजी में कोई नतीजा निकालने से बचना चाहिए.

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नई दिल्ली: भारत के तुर्की, मिस्र और अरब देशों में पूर्व राजदूत संजय भट्टाचार्य ने कहा कि मक्का पैक्ट की जानकारी जानबूझकर सार्वजनिक नहीं किए जाने की वजह से भारत को घबराने के बजाय इस मामले पर करीब से नजर रखनी चाहिए.

उन्होंने मंगलवार को नई दिल्ली में एक चर्चा के दौरान पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौते के असर पर बात की. भट्टाचार्य ने कहा कि पाकिस्तान ने इस समझौते के जरिए क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की है और उसकी रणनीतिक मंशा नई दिल्ली के लिए पहले से साफ है.

उन्होंने कहा, “लेकिन भारत को तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए और तेजी से बदलते पश्चिम एशिया में किसी एक पक्ष का साथ देने के लिए खुद को मजबूर नहीं करना चाहिए.” उन्होंने कहा कि इस समय समझौते में शामिल कोई भी देश भारत के खिलाफ रुख नहीं अपना रहा है.

मक्का में हुए समझौते का पूरा पाठ अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. साथ ही, यह भी साफ नहीं है कि आपसी रक्षा से जुड़े प्रावधानों को जमीन पर लागू करने के लिए किस तरह की व्यवस्था, कमांड स्ट्रक्चर या कमांड की पूरी श्रृंखला होगी. उन्होंने कहा कि जब तक ये जानकारी सामने नहीं आती, भारत को किसी नतीजे पर पहुंचने से बचना चाहिए.

भट्टाचार्य ने कहा, “भारत पाकिस्तान नहीं है. भारत के पास काफी ज्यादा रणनीतिक क्षमता और सामर्थ्य है. भारत को किसी गठबंधन की जरूरत नहीं है. भारत अपनी सुरक्षा खुद कर सकता है.”

इस समझौते को इसके साइन करने वाले देशों ने सामूहिक आपसी रक्षा और सुरक्षा व्यवस्था बताया है. इसे विचार के स्तर पर नाटो के आर्टिकल 5 के सिद्धांत जैसा माना जा सकता है. इसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है.

तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान पहले ही कह चुके हैं कि समझौते को लागू करने के तरीके को तय करने के लिए आपसी समन्वय जरूरी होगा. भट्टाचार्य ने कहा, “फिलहाल मुझे मिशन के उद्देश्यों का वास्तव में पता नहीं है. उनमें से कई ने क्षेत्रीय भूमिका की बात की है. उन्होंने अतिरिक्त क्षेत्रीय भूमिका की बात नहीं की है. जब तक कोई व्यवस्था, ढांचा और कमांड की श्रृंखला नहीं होगी, तब तक आप सैन्य कार्रवाई कैसे करेंगे?”

समझौते में किसी दुश्मन या विरोधी देश का सार्वजनिक रूप से नाम नहीं लिया गया है. ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि इसका रणनीतिक मकसद मुख्य रूप से ईरान, इजरायल या क्षेत्रीय सुरक्षा की किसी व्यापक सोच से जुड़ा है.

सऊदी अरब लंबे समय से पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों, सलाहकारों और सुरक्षा विशेषज्ञता पर निर्भर रहा है. इसलिए पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सैन्य संबंध अचानक नहीं बने हैं, उन्होंने कहा. नया पहलू यह है कि तीन अलग-अलग तरह की रणनीतिक ताकतों को एक साथ लाने की संभावना है. इसमें सऊदी अरब के वित्तीय संसाधन, ड्रोन सहित तुर्की की सैन्य तकनीक और हथियार तथा पाकिस्तान की सैन्य जनशक्ति शामिल हैं.

लेकिन लेखक राज शुक्ला के मुताबिक, इस समझौते में मुख्य भूमिका तुर्की की रही है. वह करीब तीन साल से इस तरह की व्यवस्था बनाने की दिशा में काम कर रहा है.

अंकारा की महत्वाकांक्षाओं में पश्चिम एशिया में अपनी नेतृत्व की भूमिका बढ़ाना, सीरिया और इराक में अपना प्रभाव दोबारा मजबूत करना और इजरायल की बढ़ती सक्रियता का जवाब देना शामिल है. उदाहरण के लिए, सितंबर 2025 में हमास से जुड़ी बातचीत के दौरान इजरायल के कतर पर हमले ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया.

व्यापक तौर पर देखा जाए तो एर्दोगन की पैन-इस्लामिस्ट और नियो-ओटोमन सोच पूर्वी भूमध्यसागर और एजियन सागर से लेकर सोमालिया और लीबिया तक एक बड़े क्षेत्र में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है. इसमें बांग्लादेश, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ सैन्य मदद और सहयोग भी शामिल है.

भट्टाचार्य ने कहा, “मेरे लिए यह ऐसा लगता है जैसे यह एक ड्रॉइंग रूम की चीज है, जिसका मकसद उन लोगों को खुश करना और प्रभावित करना है जो प्रभावित होना चाहते हैं और उन लोगों को डराना है जो डरना चाहते हैं.”

समस्या यह है कि किसी भी तरह की रोकथाम आखिरकार सैन्य क्षमता पर निर्भर करती है. MDA का भौगोलिक दायरा यूरोप के किनारे से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप तक काफी बड़ा हो सकता है, लेकिन फिलहाल इसकी सैन्य क्षमता इतनी बड़ी नहीं दिखती कि इतने बड़े क्षेत्र में लंबे समय तक सैन्य अभियान चला सके.

इस समझौते के आगे और विस्तार की संभावना भी एक बड़ा अनसुलझा सवाल है. मिस्र ने बातचीत में हिस्सा लिया था, लेकिन संवैधानिक जरूरतों का हवाला देते हुए समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए. कतर भी इस समझौते से बाहर रहा, जबकि संयुक्त अरब अमीरात ने इस पर काफी शांत रुख अपनाया है. वहीं, बांग्लादेश ने इसमें शामिल होने में रुचि दिखाई है.

पाकिस्तान के सऊदी अरब और तुर्की के साथ बढ़ते संबंधों पर करीबी नजर रखना जरूरी है, क्योंकि इसका असर पश्चिम एशिया से आगे भी जा सकता है. पूर्व राजदूत ने बताया कि सऊदी अरब की आर्थिक मदद से इस्लामाबाद को अपने फैसले लेने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिल सकती है. वहीं, तुर्की की सैन्य तकनीक से अंकारा और इस्लामाबाद के बीच संबंध और मजबूत हो सकते हैं. नई दिल्ली पहले से ही इस रिश्ते को चिंता की नजर से देखती रही है.

भट्टाचार्य ने कहा, “तुर्की-पाकिस्तान का गठजोड़, तकनीक का गठजोड़, जिसे हमने पहले भी देखा है और हाल के मामले में भी सामने आते देखा है, समय के साथ इसका असर बढ़ेगा, क्योंकि सऊदी अरब से मिलने वाले ज्यादा वित्तीय संसाधनों के कारण पाकिस्तान के और ज्यादा मजबूत होकर आगे बढ़ने की संभावना है.”

लेकिन उन्होंने इस सोच से सावधान किया कि सऊदी अरब हर रणनीतिक मुद्दे पर अपने आप पाकिस्तान का साथ देगा. उनके मुताबिक, भारत के लिए इससे भी बड़ा सवाल यह हो सकता है कि इस नए समीकरण का क्षेत्र में चल रही राजनीतिक गतिविधियों पर क्या असर पड़ेगा. इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड की भविष्य की भूमिका भी शामिल है.

और भारत को यह याद रखना चाहिए कि वह पाकिस्तान से बिल्कुल अलग स्थिति में काम कर रहा है. CAPSS की डिस्टिंग्विश्ड फेलो शालिनी चावला ने कहा, “इस समझौते को अभी के समय में सैन्य गठबंधन के बजाय राजनीतिक सुरक्षा तालमेल के तौर पर ज़्यादा समझा जा सकता है.”

भट्टाचार्य ने कहा कि भारत के सामने ऐसी कोई रणनीतिक जरूरत या मजबूरी नहीं है, जिसके कारण औपचारिक गठबंधन करना स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो. इसके बजाय भारत को अपनी क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए और पूरे क्षेत्र में अपने संबंध बनाए रखने चाहिए.

उन्होंने कहा, “ऐसी स्थिति में जाना, जब हम बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं और दुनिया के उस हिस्से में स्थिति बहुत तेजी से बदल रही है, मेरी नजर में बेहद गलत कदम होगा. हमें खुद को मजबूत करना चाहिए, अपने संसाधनों को बढ़ाना चाहिए, सभी पक्षों के साथ अपने पुराने अच्छे संबंध बनाए रखने चाहिए और इस बदलाव के दौर से निकलने का रास्ता तैयार करना चाहिए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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