(नील्स मैलॉक, किंग्स कॉलेज, लंदन)
लंदन, 26 सितम्बर (द कन्वरसेशन) हाल के सप्ताहों में कई देशों ने फलस्तीन को औपचारिक रूप से एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी है, जिसे फलस्तीनी संप्रभुता की दिशा में एक ऐतिहासिक राजनयिक उपलब्धि माना जा रहा है। लेकिन एक स्वतंत्र राज्य के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत आवश्यक भौगोलिक सीमाएं अब भी विवादास्पद बनी हुई हैं—चाहे वह वेस्ट बैंक की पहाड़ियां हों या ग़ाज़ा के खंडहर।
इसका अर्थ समझने के लिए हमें यह पता लगाना होगा कि फलस्तीन के उथल-पुथल भरे राजनीतिक इतिहास में सीमाएँ कैसे विकसित या विलीन हुईं।
साल 1947 में संयुक्त राष्ट्र के विभाजन प्रस्ताव के तहत यहूदी और अरब राज्य के लिए अर्द्ध-संलग्न क्षेत्रों की कल्पना की गई थी, जिसमें यरुशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर के रूप में रखने का सुझाव दिया गया था।
परंतु यह योजना जल्द ही युद्ध में बदल गई, जिसके परिणामस्वरूप 1948 में इज़राइल की स्थापना हुई और फलस्तीनी जनसंख्या वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा पट्टी तक सीमित रह गई।
आज भी 1967 के पूर्व की सीमाएं फलस्तीनी राज्य की अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्य सीमाएं मानी जाती हैं। लेकिन इसी साल छह दिवसीय युद्ध के बाद इज़राइल ने वेस्ट बैंक, ग़ाज़ा पट्टी और पूर्वी यरुशलम पर नियंत्रण कर लिया। इसके बाद वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का निर्माण हुआ, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध माना गया है।
ओस्लो समझौतों के तहत वेस्ट बैंक को तीन क्षेत्रों—ए, बी और सी में विभाजित किया गया था जिनमें फलस्तीनी शासन की अलग-अलग सीमाएं तय की गईं। दूसरी इंतिफ़ादा (2000-05) के दौरान आत्मघाती हमलों के बाद इज़राइल ने एक पृथक्करण दीवार बनाई, जिससे वेस्ट बैंक का क्षेत्रफल और अधिक विभाजित हो गया।
हालिया अध्ययन में उपग्रह से मिली तस्वीरों के माध्यम से यह सामने आया है कि वेस्ट बैंक में 2014 के बाद से यहूदी बस्तियों का दायरा 72 प्रतिशत बढ़ गया है। कुल 360 बस्तियों और चौकियों का विश्लेषण किया गया, जिनमें से अधिकतर में सैन्य अवसंरचना और फलस्तीनियों की आवाजाही पर प्रतिबंध शामिल हैं।
ई1 परियोजना जैसे नए विकास कार्यक्रम वेस्ट बैंक को दो भागों में विभाजित करने की आशंका उत्पन्न करते हैं। इज़राइल के वित्त मंत्री बेज़ेलेल स्मोट्रिच ने इसे फलस्तीनी राज्य की अवधारणा को ‘‘मिटा देने’’ की दिशा में कदम बताया है।
राजनीतिक नेतृत्व के संकट के बीच ग़ाज़ा और वेस्ट बैंक में कोई स्पष्ट प्रतिनिधित्व नहीं है। ग़ाज़ा में हमास की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है, जबकि वेस्ट बैंक में फलस्तीनी प्राधिकरण (पीए) को व्यापक रूप से अक्षम और अलोकप्रिय माना जाता है। एक पुनर्गठित पीए ही निकट भविष्य में शासन का यथार्थवादी विकल्प हो सकता है।
राष्ट्रपति महमूद अब्बास (89 वर्ष) के उत्तराधिकारी को लेकर स्थिति अनिश्चित है। जेल में बंद मारवान बरगूती को एक संभावित उम्मीदवार माना जाता है, लेकिन इससे उत्तराधिकार योजना जटिल हो जाती है।
फलस्तीन को दी जा रही मान्यता केवल प्रतीकात्मक न रह जाए, इसके लिए ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ज़मीन पर व्यावहारिक कदम उठाए। जब तक यहूदी बस्तियों का विस्तार और उससे उत्पन्न हिंसा के संदर्भ में कूटनीतिक समाधान नहीं खोजा जाता, तब तक स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य की स्थापना की संभावना क्षीण बनी रहेगी।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश
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