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Thursday, 30 May, 2024
होमविदेशरिपोर्ट का दावा- अफगानिस्तान में 90 प्रतिशत मानवाधिकार रक्षकों ने ‘हिंसा और दुर्व्यवहार’ का अनुभव किया

रिपोर्ट का दावा- अफगानिस्तान में 90 प्रतिशत मानवाधिकार रक्षकों ने ‘हिंसा और दुर्व्यवहार’ का अनुभव किया

विश्लेषकों का मानना है कि मानवाधिकार रक्षकों की गतिविधियां देश को नियंत्रित करने वाले अधिकारियों के कार्यों की निगरानी के लिए ज़रूरी हैं.

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नई दिल्लीः साल 2021 में तालिबान के कब्जे में आ चुके अफगानिस्तान में मानवाधिकारों रक्षकों पर जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 90 प्रतिशत रक्षकों ने ‘हिंसा और दुर्व्यवहार’ का सामना किया है.

अमेरिका के एक संगठन, फ्रीडम हाउस ने शुक्रवार को अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट में कम से कम 90 प्रतिशत मानवाधिकार रक्षकों के अपहरण, यातना और उत्पीड़न जैसे जोखिमों और खतरों को झेलने की बात कही गई है.

अफगान की स्थानीय न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, मई और जून 2022 के बीच 663 अफगान मानवाधिकार रक्षकों का एक सर्वेक्षण किया गया था. इस दौरान तालिबान के कब्जे में रह रहे मानवाधिकार रक्षकों ने गंभीर परिस्थितियों में होने की बात कुबूल की थी.

फ्रीडम हाउस के प्रमुख माइक अब्रामोविट्ज़ ने कहा, ‘‘अफगान मानवाधिकार रक्षक डर के साये में रहते हैं और गंभीर चुनौतियों का सामना करते हैं, चाहे वे देश में रहें या विदेश चले गए हों.’’

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह सुनिश्चित करने के लिए सहायता प्रदान करनी चाहिए कि दो दशकों तक किया गया कार्य व्यर्थ न हो.

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उन्होंने कहा, ‘‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को एक स्वतंत्र और अधिक न्यायपूर्ण अफगानिस्तान बनाने के लिए इन कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों के लिए अपने समर्थन को दोगुना करना होगा.’’

वहीं, तालिबान के 15 अगस्त 2021 को काबुल में सत्ताधीन होने के बाद से देश में लगातार हालत बिगड़े हैं. इस दौरान महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाने और इस्लामिक कानून लागू करने जैसे कईं कार्य किए गए हैं.


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‘ह्यूमन राईट्स निगरानी के लिए ज़रूरी’

तालिबान के कब्जे के बाद, मानव अधिकारों की स्थिति राष्ट्रव्यापी आर्थिक, वित्तीय और मानवीय संकट से और खराब हो गई है.

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर नियंत्रण वापस लेने से पहले, देश कई समूहों और व्यक्तियों का घर था, जिन्होंने महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और हाशिए के समुदायों सहित सभी अफगानों के अधिकारों और सुरक्षा की वकालत की थी.

विश्लेषकों का मानना है कि मानवाधिकार रक्षकों की गतिविधियां देश को नियंत्रित करने वाले अधिकारियों के कार्यों की निगरानी के लिए ज़रूरी हैं.

कानूनी मामलों के विश्लेषक अजीज मारिज ने कहा, ‘‘हर समाज को न्याय सुनिश्चित करने के लिए मानवाधिकार रक्षकों की जरूरत है और वह इसके लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.’’

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘‘तालिबान के तहत मानवाधिकार रक्षकों के खिलाफ जोखिम में 47.8 प्रतिशत मामले धमकी और उत्पीड़न के हैं. 24.1 प्रतिशत मामले जान से मारने की धमकी के हैं.’’

इसके अलावा, ‘‘16. 4 प्रतिशत मामले मनमानी गिरफ्तारी और यातना, 4.4 प्रतिशत मामले मानहानि और घर की तलाशी लेने के हैं. 3.8 फीसद मामले परिवार के खिलाफ हिंसा के हैं. 3.5 प्रतिशत मामले शारीरिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान के, 0.8 फीसदी मामले अपहरण और जेल में डाले जाने के हैं.’’

क्रेडिटः @freedomhouse

फ्रीडम हाउस, अफगान में मानवाधिकार रक्षकों की जरूरतों का आकलन करने, उन्हें चैनल समर्थन देने, संकट का जवाब देने वालों के बीच सूचना साझा करने और देश में सभी के मानवाधिकारों के हितों की रक्षा की वकालत करने के लिए अफगान और अंतर्राष्ट्रीय आवाजों को एक साथ लाने का प्रयास करता है.

जनवरी 2022 में, फ्रीडम हाउस ने अफगानिस्तान मानवाधिकार समन्वय तंत्र के संस्थापकों में से एक के रूप में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी.

अफगानिस्तान में पत्रकारों की स्थिति बेहद चिंताजनक है. खामा प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 6,000 से अधिक पत्रकारों ने अपनी नौकरी गंवा दी है.


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क्या-क्या प्रतिबंधित

तालिबान ने लिंग आधारित हिंसा का जवाब देने के लिए व्यवस्था को खत्म कर दिया, स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंचने वाली महिलाओं के लिए अवरोध पैदा किए, महिला सहायता कर्मियों को उनके काम करने से रोक दिया और महिला अधिकार प्रदर्शनकारियों पर हमला किया.

पिछले साल दिसंबर में अफगानिस्तान में महिलाओं के यूनिवर्सिटी जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी. तालिबानी अधिकारियों ने देशभर में यह पाबंदी लागू की थी, जबकि तीन महीने पहले कईं लड़कियों ने प्रवेश परीक्षा दी थी.

तालिबान ने पिछले साल शिक्षा के नियमों में बदलाव करने शुरू कर दिए थे. इस दौरान यूनिवर्सिटीज़ को नए नियम मानने को मजबूर किया गया था.

नियमों में कक्षाओं में पुरुषों और स्त्रियों को अलग-अलग बिठाना और लड़कियों की कक्षाओं में सिर्फ महिला या बुजुर्ग शिक्षकों के पढ़ाने के प्रावधान शामिल हैं.

इसके अलावा तालिबान ने महिलाओं के लिए इस्लामिक शरिया कानून लागू किया था.

तालिबान ने अफगानिस्तान में महिलाओं को बिना किसी पुरुष के बाहर जाने पर प्रतिबंध है. इसके अलावा दफ्तरों में महिलाकर्मियों को या तो बर्खास्त कर दिया गया या उनकी तनख्वाहें घटा दी गई.

मार्च महीने में सेंकड्री स्कूल में पढ़ने वालीं लड़कियों को स्कूल जाने से रोक दिया गया. उन्हें घर से बाहर निकलने पर खुद को पूरी तरह ढक कर रखना होता है. नवंबर महीने में महिलाओं को पार्कों, मेलों, जिम और अन्य सार्वजनिक आयोजनों में जाने से रोक दिया गया था.

प्रतिबंध लगने के बाद से अफगानिस्तान में बहुत सारी लड़कियों की समय से पहले और उम्र से कई साल बड़े आदमियों से शादी कर दी गई.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय महिलाओं के अधिकारों, खासकर शिक्षा को लेकर चिंता जताता रहा है. सितंबर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक बयान में कहा था, ‘‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय अफगान महिलाओं और लड़कियों को भूला नहीं है.’’


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संयुक्त राष्ट्र ने मांगी माफी

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान के झंडे के सामने खड़े अपने कर्मियों की तस्वीरें सामने आने के बाद माफी मांगी है.

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी उप महासचिव अमीना मोहम्मद के नेतृत्व में एक दल के अफगानिस्तान के दौरे पर कुछ कर्मियों की ऐसी तस्वीरें सामने आने के बाद खेद जताया है जिनमें वे तालिबान के झंडे के सामने खड़े दिख रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र में सर्वोच्च रैंकिंग वाली महिला मोहम्मद, संयुक्त राष्ट्र महिला की कार्यकारी निदेशक सिमा बाहौस और राजनीतिक, शांति निर्माण मामलों और शांति संचालन विभाग के सहायक महासचिव खालिद खियारी के साथ शुक्रवार को अफगानिस्तान की चार दिवसीय यात्रा पूरी की.

यात्रा और तस्वीरों के बारे में सवाल करने पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के उप प्रवक्ता फरहान हक ने कहा, ‘‘वह तस्वीर नहीं ली जानी चाहिए थी. यह स्पष्ट रूप से एक चूक को दर्शाता है. यह एक गलती है और हम इसके लिए माफी मांगते हैं. मेरा मानना है कि इन अधिकारियों के पर्यवेक्षकों ने उनसे इस बारे में बात की है.’’

हक ने कहा कि तस्वीर तब ली गई जब उप महासचिव अफगानिस्तान में तालिबान के नेताओं से मिल रही थीं.

गौरतलब है कि नब्बे के दशक में सोवियत संघ द्वारा अफगान से अपने सैनिकों को वापस बुलाए जाने के बाद, तालिबान की शुरुआत हुई थी.

फरवरी, 2020 में दोहा समझौते के तहत, अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाने की प्रतिबद्धता जताई और तालिबान अमेरिकी सैनिकों पर हमले बंद करने को तैयार हुआ. लेकिन अमेरिका द्वारा 11 सितंबर, 2021 तक अफगानिस्तान से अपने सभी सैनिकों को हटाने की तैयारी की घोषणा के बाद तालिबान ने अपने कब्जे की कवायद तेज़ कर दी थी.

तालिबान ने अक्टूबर, 2012 को मिंगोरा नगर में अपने स्कूल से घर लौट रही मलाला यूसुफज़ई को गोली मार दी थी. तालिबानी शासन के अत्याचार पर छद्म नाम से लिखने के चलते 14 साल की मलाला से तालिबानी नाराज़ थे. इस घटना में मलाला बुरी तरह घायल हो गई थीं. उस वक्त अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना की निंदा हुई थी. हालांकि, बाद में मलाला को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया था.


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