scorecardresearch
Friday, 16 January, 2026
होमविदेशEU-भारत FTA पर 27 जनवरी को हस्ताक्षर की तैयारी, सालों की बातचीत के बाद—क्यों अहम है यह समझौता

EU-भारत FTA पर 27 जनवरी को हस्ताक्षर की तैयारी, सालों की बातचीत के बाद—क्यों अहम है यह समझौता

यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जब उसके सभी 27 सदस्य देशों के साथ निर्यात और आयात को जोड़ा जाता है. इस समझौते को बनने में लगभग दो दशक लगे हैं.

Text Size:

नई दिल्ली: लंबे समय से बातचीत में रहे भारत–यूरोपीय संघ (इयू) मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर 27 जनवरी को दोनों साझेदारों के बीच होने वाले 16वें शिखर सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षर होने की तैयारी है. यूरोपीय संघ के नेता यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और काउंसिल अध्यक्ष एंटोनिया कोस्टा—25 से 27 जनवरी के बीच भारत आएंगे.

साइप्रस, जो फिलहाल इयू काउंसिल की घूर्णन अध्यक्षता संभाले हुए है, भी एफटीए पर हस्ताक्षर के साक्षी के रूप में प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हो सकता है.

कोस्टा और वॉन डेर लेयेन भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे.

भारत के लिए यह एफटीए 18 ट्रिलियन यूरो के बाज़ार तक बेहतर पहुंच देगा, जहां 40 करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं. वहीं इयू के 27 सदस्य देशों के लिए भारत के साथ व्यापार समझौते का मतलब होगा कम टैरिफ और दुनिया के सबसे बड़े बाज़ार—1.4 अरब लोगों और तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था—तक बेहतर पहुंच.

वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने गुरुवार को कहा कि इयू नेताओं की यात्रा से पहले बातचीत का एक और दौर हो सकता है, क्योंकि 27 जनवरी से पहले समझौते के बचे हुए चैप्टर को पूरा करने के लिए वार्ताकार तेज़ी से काम कर रहे हैं. वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल 8 और 9 जनवरी को बातचीत के 15वें दौर के लिए ब्रसेल्स गए थे.

अग्रवाल ने गुरुवार को आगे बताया कि 24 में से 20 अध्याय पूरे हो चुके हैं. सामानों के व्यापार, खास तौर पर कृषि, और टिकाऊ तौर-तरीकों से जुड़े कुछ मुद्दे—जैसे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM)—अब भी बचे हैं.

अग्रवाल ने गुरुवार को भारत के व्यापार आंकड़ों पर मीडिया को जानकारी देते हुए कहा, “पिछले तीन महीनों से हम इयू के साथ बातचीत के आखिरी और सबसे कठिन चरण में थे. हमने 24 में से 20 अध्याय पूरे कर लिए हैं. कुछ मुद्दे अभी बाकी हैं और उन पर वर्चुअल बातचीत चल रही है. हम आमने-सामने मिलने की भी योजना बना रहे हैं.”

सरकारी सूत्रों ने पुष्टि की है कि “दोनों पक्षों के संवेदनशील कृषि मुद्दे बातचीत के दायरे से बाहर हैं.” जबकि नई दिल्ली CBAM जैसे विवादित मुद्दों पर छूट (कार्व-आउट) की मांग जारी रखे हुए है. CBAM 1 जनवरी से लागू हो चुका है और इसमें स्टील, सीमेंट, एल्युमिनियम, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसे सेक्टर शामिल होंगे. आगे चलकर और सेक्टर भी जोड़े जाने की उम्मीद है.

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इंस्टीट्यूट (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने दिप्रिंट को बताया, “सीबीएएम एक बड़ी चुनौती बना रहेगा. यह समझौता पर्यावरण, टिकाऊपन और श्रम जैसे गैर-कोर व्यापार क्षेत्रों को भी कवर करता है. इयू चाहता है कि भारत इन क्षेत्रों में खास प्रतिबद्धताएं करे. भारत इसके लिए तैयार नहीं है और इन अध्यायों को ‘बेस्ट एंडेवर’ क्लॉज़ तक सीमित रखना चाहता है.”

उन्होंने आगे कहा, “CBAM एक टैरिफ बाधा है. एफटीए के बाद, अगर CBAM का समाधान नहीं होता, तो यूरोपीय सामान भारत में ज़ीरो टैरिफ पर आएंगे, जबकि हमारे सामान CBAM के कारण बाधाओं का सामना करेंगे. हमें याद रखना चाहिए कि अभी EU का CBAM छह उत्पाद क्षेत्रों को कवर करता है, लेकिन आने वाले वर्षों में इयू सभी औद्योगिक उत्पादों को इसके तहत लाएगा. इसलिए अगर CBAM का समाधान किए बिना एफटीए किया गया, तो यह समझौता असंतुलित होगा.”

हालांकि, दोनों पक्षों में इस समझौते को आगे बढ़ाने की राजनीतिक इच्छा है. जैसा कि एक यूरोपीय राजनयिक ने स्थिति को बताया—व्यापार समझौते इयू की “लव लैंग्वेज” हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद छह मूल सदस्य देशों—फ्रांस, पश्चिम जर्मनी, इटली, लक्ज़मबर्ग, बेल्जियम और नीदरलैंड—के बीच व्यापार आसान करने के लिए बने इस संगठन का दायरा अब काफी बढ़ चुका है.

आज इयू एक एकल बाज़ार है, जहां सदस्य देशों के भीतर सामान, पूंजी और श्रम की मुक्त आवाजाही है. हालांकि, व्यापार को केंद्र में रखने वाला इयू अपने सदस्य देशों को तीसरे देशों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय व्यापार समझौते करने की अनुमति नहीं देता. इसी वजह से नई दिल्ली और ब्रसेल्स को मिलकर यह समझौता तय करना पड़ता है.

जब सभी 27 सदस्य देशों के साथ निर्यात और आयात को जोड़ा जाता है, तो इयू भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. दोनों पक्षों के लिए यह समझौता लगभग दो दशक से बन रहा है. व्यापार समझौते के लिए बातचीत का पहला दौर 2007 में शुरू हुआ था, लेकिन बाद में इसे रोक दिया गया था. फिर 2022 में बातचीत दोबारा शुरू हुई.

श्रीवास्तव ने बताया, “इयू को भारत का माल निर्यात लगभग 76 अरब डॉलर (वित्त वर्ष 2025 में) है, और हम उनसे जितना आयात करते हैं (60.7 अरब डॉलर), उससे ज़्यादा निर्यात करते हैं. ज़्यादातर विकसित देशों में आयात शुल्क का एक पैटर्न होता है. वे कुल मिलाकर टैरिफ कम रखते हैं, लेकिन श्रम-प्रधान सामान—जो विकासशील देशों के मुख्य उत्पाद होते हैं—उन पर ज़्यादा टैरिफ लगाते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “जब कोई विकासशील देश इयू के साथ एफटीए करता है, तो श्रम-प्रधान सामानों पर भी टैरिफ कम होते हैं और उसे प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलती है. उदाहरण के तौर पर, इयू में कपड़ा, रेडीमेड कपड़ों और चमड़े के उत्पादों पर औसतन 6 से 20 प्रतिशत तक टैरिफ है. वियतनाम के पास इयू के साथ एफटीए है, इसलिए उसे कपड़ों पर ज़ीरो टैरिफ पर इयू बाज़ार में पहुंच मिलती है. इसी तरह बांग्लादेश को ‘जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज़’ (GSP) योजना के तहत इयू बाज़ार में ज़ीरो टैरिफ पहुंच मिलती है, क्योंकि वह एक कम विकसित देश है. एफटीए के ज़रिये भारतीय कपड़ा और परिधान निर्यातकों को ज़ीरो टैरिफ पहुंच मिलेगी, जिससे वे इन देशों से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे.”

इस मुकाम तक पहुंचाने वाला साल

पिछले एक साल में ही बातचीत के पांच दौर हो चुके हैं, जबकि विशेषज्ञ समूह वर्चुअल माध्यमों से लगातार संपर्क में रहे हैं. अक्टूबर में हुए आखिरी दौर में, दोनों पक्ष व्यापार समझौते के निवेश से जुड़े हिस्सों पर ज़्यादातर सहमत हो गए थे. इस दौरान स्वच्छता और पादप-स्वास्थ्य मानकों (SPS) से जुड़े अध्याय को पूरा कर लिया गया और ऑटोमोबाइल तथा दवाइयों जैसे मुद्दों पर समझौते के पैकेज चिन्हित किए गए.

निवेश से जुड़े अध्याय में काफी बड़े मतभेद सामने आए. व्यापार समझौते में दी जाने वाली छूटों को लेकर कोई सहमति या समझौता नहीं हो पाया. वहीं, भारत पिछले तीन महीनों से पूंजी की आवाजाही को लेकर इयू के समझौता पैकेज पर विचार कर रहा है.

हालांकि, वस्तुओं के व्यापार पर टैरिफ घटाने और ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ को लेकर मतभेद बने रहे, जिन पर सत्रों के बीच लगातार चर्चा होती रही है. खास बात यह है कि भारत ने 2025 में ब्रिटेन और न्यूज़ीलैंड जैसे अन्य विकसित देशों के साथ बातचीत पूरी कर ली है, जिससे यह संकेत मिलता है कि इस समझौते को आगे बढ़ाने के लिए मेज़ पर कई तरह के समझौते मौजूद हैं.

डेयरी सेक्टर को इस समझौते से बाहर रखे जाने की संभावना है. यह कृषि उत्पादों पर बातचीत के साथ-साथ भारत की ‘रेड लाइन’ का हिस्सा है. उदाहरण के तौर पर, डेयरी को छूट देने के मुद्दे ने इयू के भीतर भी आंतरिक सवाल खड़े किए हैं.

समझौते की ज़रूरत

फिर भी, भारत और इयू दोनों के लिए यह समझौता ज़रूरी माना जा रहा है. इयू के लिए भारत के साथ समझौता करने से वह आधुनिक वैश्विक व्यापार व्यवस्था के प्रमुख निर्माताओं में बना रह सकेगा. यह व्यवस्था अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका द्वारा व्यापार के प्रवाह को दोबारा तय करने की कोशिशों के बाद काफ़ी दबाव में आ गई है. इसके अलावा, चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत ने उसे अपने पक्ष में व्यापार व्यवस्था को ढालने का मौका दिया है, जिससे इयू खुद को असमंजस में पाता है.

2025 में चीन का व्यापार अधिशेष रिकॉर्ड 1.19 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जबकि इयू को उसके निर्यात में 8.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. दो प्रतिस्पर्धी वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के बीच फंसे इयू के लिए भारतीय बाज़ारों तक बेहतर पहुंच उसकी कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दे सकती है. इस सदी की शुरुआत से ही वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में इयू की हिस्सेदारी लगातार घट रही है.

यूरोपीय आयोग द्वारा लगभग एक दशक पहले—2018 में—जारी एक नीति दस्तावेज़ में बताया गया था कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में इयू की कुल हिस्सेदारी 2000 में 27 प्रतिशत से घटकर 2014 में लगभग 16 प्रतिशत रह गई, और हाई-टेक वैल्यू चेन में यह गिरावट और ज़्यादा साफ दिखती है. इयू की प्रतिस्पर्धात्मकता की काफ़ी आलोचना होती रही है.

इयू की प्रतिस्पर्धात्मकता पर मारियो ड्रैगी रिपोर्ट ने उन क्षेत्रों की पहचान की है, जहां इयू को वैश्विक आर्थिक विकास में एक बड़ा खिलाड़ी बने रहने के लिए अपनी औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को मज़बूत करना होगा. नवाचार की खाई को कम करने से लेकर, डी-कार्बोनाइज़ेशन को प्रतिस्पर्धा से जोड़ने और यूरोपीय सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने तक—ये ड्रैगी रिपोर्ट के कुछ प्रमुख बिंदु हैं.

इन सभी बातों के चलते यह समझौता अब आखिरी चरण में पहुंच गया है और उम्मीद है कि मुख्य बातचीत पूरी होने के बाद भी अहम मतभेदों पर बातचीत जारी रहेगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

share & View comments