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Wednesday, 7 January, 2026
होमविदेश‘बेगम’ खालिदा ज़िया: कभी हसीना की दोस्त, उनकी मौत से बांग्लादेश की सबसे लंबी सत्ता की टक्कर खत्म

‘बेगम’ खालिदा ज़िया: कभी हसीना की दोस्त, उनकी मौत से बांग्लादेश की सबसे लंबी सत्ता की टक्कर खत्म

बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया का मंगलवार को ढाका के एक अस्पताल में 80 साल की उम्र में निधन हो गया. उनकी मौत के साथ वह दौर खत्म हो गया, जिसने तीन दशकों से ज्यादा समय तक बांग्लादेश की राजनीति को आकार दिया.

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नई दिल्ली: जब 2024 में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया, तो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की नेता खालिदा ज़िया ने अस्पताल के बिस्तर से टीवी पर दिए गए संदेश में इसे “तानाशाही का अंत” कहा. यह छह साल में उनका पहला सार्वजनिक बयान था और यही उनका आखिरी बयान भी था.

बेगम ज़िया, जैसा कि उन्हें कहा जाता था और जो बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं, उनका मंगलवार को ढाका के एक अस्पताल में 80 साल की उम्र में निधन हो गया. उनकी मौत के साथ एक ऐसा अध्याय खत्म हो गया, जिसने तीन दशकों से ज्यादा समय तक बांग्लादेश की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया. यह दौर दो महिलाओं के बीच सत्ता की टक्कर से जुड़ा रहा, जिनकी निजी कहानियों ने कई सालों तक देश की दिशा तय की.

बांग्लादेश के इतिहास के बड़े हिस्से में सत्ता खालिदा ज़िया और शेख हसीना—देश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी—के बीच बदलती रही. उनकी प्रतिद्वंद्विता वंशवादी, वैचारिक और बहुत निजी थी. 1991 के बाद से हुए हर राष्ट्रीय चुनाव में दोनों का दबदबा रहा—कभी एक सत्ता में आई, तो कभी दूसरी और दोनों ने एक-दूसरे की विरासत को बदलने की कोशिश की.

खालिदा के लिए तो उनका जन्मदिन भी राजनीतिक विवाद बन गया था. इस पर सालों तक टीवी और अदालतों में बहस होती रही. उनका कहना था कि उनका जन्म 15 अगस्त को हुआ, जो बांग्लादेश का राष्ट्रीय शोक दिवस है—1975 में इसी दिन शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या हुई थी. अवामी लीग ने आरोप लगाया कि वह जानबूझकर इस तारीख को राजनीति से जोड़कर अपनी प्रतिद्वंद्वी को उकसा रही हैं.

सरकारी दस्तावेजों, स्कूल रिकॉर्ड और पासपोर्ट में उनकी जन्मतिथि अलग-अलग दर्ज थी—9 अगस्त 1945 से लेकर 5 सितंबर 1945 और 5 अगस्त 1946 तक.

2016 में उन पर जन्मतिथि गलत बताकर शेख मुजीब की विरासत को “धूमिल” करने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज किया गया था; 2024 में वह बरी हो गईं.

फिर भी, बेगम ज़िया के नाम एक अनोखा रिकॉर्ड रहा: उन्होंने जिस भी सीट से चुनाव लड़ा, कभी हारी नहीं. 1991, 1996 और 2001 के आम चुनावों में वह पांच अलग-अलग संसदीय सीटों से जीतीं; 2008 में, जब उनकी पार्टी चुनाव हार गई, तब भी वह जिन तीन सीटों से लड़ीं, उन सभी पर जीत हासिल की.

पर्दे के पीछे की पत्नी से ग्लोबल लीडर तक

खालिदा खानम पुतुल का जन्म तत्कालीन अविभाजित भारत के दिनाजपुर जिले में हुआ था. 1947 के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया. बाद में उन्होंने पाकिस्तानी सेना के अधिकारी ज़िया-उर-रहमान से शादी की.

1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ज़िया एक अहम सैन्य कमांडर के रूप में उभरे, जबकि खालिदा अपने बच्चों के साथ छिपकर रहीं. एक समय उन्हें पाकिस्तानी सेना ने गिरफ्तार भी किया और युद्ध के अंत तक हिरासत में रखा.

2013 की किताब Dynasties and Female Political Leaders in Asia: Gender, Power and Pedigree (क्लाउडिया डेरीक्स और मार्क आर. थॉम्पसन द्वारा संपादित) के अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन में कमांडर रहे उनके पति ने उनसे असैन्य क्षेत्र में साथ आने को कहा था, लेकिन तब तक उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. इससे उनके रिश्ते में तनाव आ गया और युद्ध के बाद ज़िया उनसे मिलने से भी इनकार कर दिया.

शेख मुजीबुर रहमान ने ही दोनों के बीच सुलह कराई. उस समय खालिदा और हसीना—दोनों युवा महिलाएं—साझा दर्द से जुड़ी थीं और दोस्त भी थीं.

अपने पति के राष्ट्रपति रहते हुए खालिदा ज्यादातर पर्दे के पीछे रहीं और आधिकारिक कार्यक्रमों में औपचारिक भूमिका निभाती रहीं. बांग्लादेश की वंशवादी राजनीति की तरह, 1981 में उनके पति की हत्या के बाद वह उनकी पार्टी की विरासत की संरक्षक के रूप में राजनीति में आईं. बीएनपी की अध्यक्ष के रूप में वह जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद के सैन्य शासन की मुख्य चुनौती बनीं. उन वर्षों में वह और शेख हसीना फिर कुछ समय के लिए एक ही पक्ष में खड़ी दिखीं और लोकतंत्र बहाली के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया. उन्हें “अडिग नेता” कहा गया, जो सैन्य जनरल के सामने डटी रहीं.

1991 में वे बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. 1996 में विरोध प्रदर्शनों और विवादित चुनाव के बीच हार गईं, 2001 में जमात जैसी इस्लामवादी पार्टियों के साथ गठबंधन कर सत्ता में लौटीं और 2008 में भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच फिर हार गईं.

फिर भी, वह अपनी भूमिका समझती थीं. 1993 में जब वह संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने गईं, तो बीएनपी ने इसे ऐतिहासिक बताया—मुस्लिम-बहुल देश से चुनी गई पहली महिला नेता, जिसने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया. न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में वह इस बात से ज्यादा प्रभावित नहीं दिखीं.

“हूं,” उन्होंने जवाब दिया, जब उनसे इस बारे में पूछा गया. वह यह बताने पर ज्यादा जोर देती थीं कि बांग्लादेश में महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी अब कोई अपवाद नहीं है.

क्रीम रंग की सिल्क साड़ी पहने बैठी खालिदा ज़िया ने कहा, “हम महिलाओं को राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में भाग लेने की अनुमति देते हैं और प्रोत्साहित करते हैं. गांवों में महिलाएं खेतों में काम करती हैं. शहरों में वे घर से बाहर काम करती हैं. वे संस्कृति और राजनीति में सक्रिय हैं, दफ्तरों और सरकारी विभागों में काम करती हैं, और डॉक्टर व शिक्षक भी हैं.”

विडंबना यह रही कि जनवरी 2015 में, जब खालिदा ज़िया लगभग घेराबंदी में थीं—उनके दफ्तर को रेत से भरे पुलिस ट्रकों से सील कर दिया गया था ताकि वह सरकार विरोधी प्रदर्शन का नेतृत्व न कर सकें—तभी प्रधानमंत्री शेख हसीना उनके छोटे बेटे आराफात की मौत पर शोक जताने पहुंचीं, लेकिन बंद गेट पर उन्हें रोक दिया गया.

25 अगस्त को तारिक की वापसी बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनावों से पहले अहम मानी जा रही है. तारिक रहमान, जिन्हें अक्सर “डार्क प्रिंस” कहा जाता है, 2008 से लंदन में रह रहे थे. वह सैन्य-समर्थित कार्यवाहक सरकार के दौरान 17 महीने की हिरासत के बाद बांग्लादेश छोड़कर गए थे. उन पर शेख हसीना की हत्या की साजिश सहित कई आरोप थे, जिन्हें वह राजनीतिक साजिश बताते रहे. यूनुस प्रशासन के तहत वह सभी 84 मामलों से बरी हो गए. चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद उन्होंने वापसी का ऐलान किया. 2008 से 2025 के अंत तक उन्होंने लंदन से निर्वासन में रहकर बीएनपी का नेतृत्व किया. अब वे 2026 के चुनावों में एक मजबूत दावेदार हैं.

खालिदा की विदेश नीति

विदेश नीति के मामले में खालिदा ने ज़्यादातर एक जाना-पहचाना रास्ता अपनाया: पाकिस्तान के साथ ज़्यादा अच्छे रिश्ते और भारत के साथ अपेक्षाकृत ठंडे संबंध.

उनके शासनकाल में जुलाई 2002 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ढाका के राजकीय दौरे पर आए थे. उसी दौरान उन्होंने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए अत्याचारों के लिए माफी मांगी थी. यह किसी पाकिस्तानी नेता द्वारा पहली बार दी गई ऐसी माफी थी और ढाका में इसे उनकी सरकार की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया. चीन के साथ उन्होंने “लुक ईस्ट” नीति अपनाई.

2008 में वह हसीना से चुनाव हार गईं. यह हार स्थायी साबित हुई, क्योंकि उनकी प्रतिद्वंद्वी दोबारा सत्ता में लौटीं और अगले 15 साल तक सत्ता में बनी रहीं, धीरे-धीरे अपनी पकड़ मज़बूत करती गईं. खालिदा के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले बढ़ते गए और 2018 में उन्हें अनाथालय के फंड में गबन के आरोप में जेल की सज़ा भी सुनाई गई.

राजनीतिक रूप से हाशिये पर जाने के बावजूद खालिदा कूटनीति में सक्रिय रहीं. अक्टूबर 2012 में वे भारत आईं और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सहित वरिष्ठ अधिकारियों से मिलीं. यह दौरा खास तौर पर चर्चा में रहा क्योंकि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की छवि सत्तारूढ़ अवामी लीग की तुलना में भारत के प्रति कम अनुकूल मानी जाती रही है.

तब खालिदा ने भारतीय नेताओं से कहा था कि उनकी पार्टी आपसी लाभ पर आधारित संबंध चाहती है, जिसमें कट्टरपंथ के खिलाफ सहयोग भी शामिल है.

‘एक परिवार का शासन’

इसी बीच उनकी सेहत तेज़ी से बिगड़ती गई. उन्हें गठिया, डायबिटीज़ और गंभीर लिवर रोग था. 2021 में कोविड-19 होने के बाद डॉक्टरों ने सलाह दी कि वे इलाज के लिए विदेश जाएं, लेकिन अदालतों ने बार-बार उनकी अनुमति की मांग को खारिज कर दिया. बांग्लादेश के तत्कालीन विदेश मंत्री ए. के. अब्दुल मोमेन ने कहा था, “वे जिस डॉक्टर को चाहें बुला सकती हैं, लेकिन देश से बाहर नहीं जा सकतीं.”

फिर भी, उनकी प्रतीकात्मक ताकत बनी रही. 2024 में बड़े जन-आंदोलनों के बाद जब शेख हसीना सत्ता से हट गईं और देश छोड़कर चली गईं, तो खालिदा को नज़रबंदी से रिहा कर दिया गया और उनके खिलाफ कई मामले वापस ले लिए गए. खराब सेहत के बावजूद, उनकी पार्टी ने फरवरी 2026 में होने वाले चुनावों से पहले उन्हें तीन संसदीय सीटों से उम्मीदवार बनाया.

2013 में वॉशिंगटन पोस्ट में लिखे एक लेख में खालिदा ज़िया ने लिखा था, “अगर बांग्लादेश एक परिवार के शासन के आगे झुक जाता है, तो यह पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ा कदम पीछे होगा.” इस लेख में उन्होंने शेख हसीना की आलोचना की थी, जिन्होंने नोबेल पुरस्कार मिलने के तुरंत बाद मोहम्मद यूनुस को ग्रामीण बैंक के प्रबंध निदेशक पद से हटवा दिया था.

अब, जब देश एक और अनिश्चित चुनावी दौर की ओर देख रहा है, खालिदा की विरासत को एक बार फिर नए सिरे से देखा जा रहा है. ध्यान अब उनके बेटे तारिक रहमान पर है, जो लंबी राजनीति की तैयारी में खुद को आगे बढ़ा रहे हैं. अगर वह सफल होते हैं, तो बांग्लादेश में एक बार फिर “एक परिवार का शासन” देखने को मिल सकता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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