Friday, 27 May, 2022
होमदेशचीन की तरह भारत इलेक्ट्रॉनिक्स हब क्यों नहीं है? सरकार की नजर में हाई टैरिफ, सब्सिडी का अभाव सबसे बड़ी चुनौती

चीन की तरह भारत इलेक्ट्रॉनिक्स हब क्यों नहीं है? सरकार की नजर में हाई टैरिफ, सब्सिडी का अभाव सबसे बड़ी चुनौती

इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के लिए जारी विजन डॉक्यूमेंट में इस उद्योग को 2026 तक 300 बिलियन डॉलर पर पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, साथ ही यह बात भी कही गई है कि ‘दंडात्मक शुल्क और टैक्स’ और ‘मजबूत इकोसिस्टम’ का अभाव इस क्षेत्र की बड़ी चुनौतियां हैं.

Text Size:

नई दिल्ली: देश में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के विकास के उद्देश्य से इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) का विजन डॉक्यूमेंट सोमवार को जारी किया गया, जिससे उन नियामक और अन्य चुनौतियों का भी जिक्र किया गया है जो इस उद्योग के पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ने में बाधा बन रही हैं.

इस डॉक्यूमेंट में शामिल चुनौतियों में बताया गया है कि कैसे भारत के लिए चीन और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी इलेक्ट्रॉनिक्स हब की तुलना में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के कंपोनेंट के आयात पर टैरिफ उच्चतम है. अन्य चुनौतियों में ‘नियामक अनिश्चितता’, और ‘दंडात्मक शुल्क ढांचा और टैक्स लेवी’ शामिल हैं.

यह दस्तावेज ‘विजन डॉक्यूमेंट’ का दूसरा खंड है, जिसमें भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मौजूदा 75 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर 2026 तक 300 बिलियन डॉलर पर पहुंचाने का एक रोडमैप और रणनीतियां भी शामिल की गई हैं.

इसे केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव और आईटी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर दोनों ने संयुक्त रूप से जारी किया.

एमईआईटीवाई ने इसे उद्योग निकाय इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (आईसीईए) के सहयोग से तैयार किया है.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

विजन डॉक्यूमेंट का पहला खंड नवंबर 2021 में जारी किया गया था और इसमें इस बात पर चर्चा की गई थी कि इलेक्ट्रॉनिक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी कितनी है और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की वैश्विक सप्लाई चेन में इसकी भूमिका को कैसे बढ़ाया जा सकता है.

‘बुनियादी ढांचे, टैरिफ, एफटीए की चुनौतियां’

यह उद्योग 300 अरब डॉलर तक पहुंचाने में आने वाली चुनौतियां रेखांकित करने वाले एक खंड में विजन डॉक्यूमेंट कहता है, ‘यद्यपि सरकार की नीतिगत पहलों का मैन्युफैक्चरिंग इको सिस्टम पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है, लेकिन व्यापक स्तर पर यह क्षेत्र कई वजहों से अक्षम बना हुआ है.’

दस्तावेज में कहा गया है कि भारत में मैन्युचरिंग को ‘लचीला, विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी और बड़े पैमाने पर संचालन में सक्षम’ बनाने के लिए बुनियादी ढांचे, टैरिफ और मुक्त व्यापार समझौतों से संबंधित चुनौतियों का समाधान किया जाना जरूरी है.

इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में लागत में कमी लाने वाले फैक्टर के संदर्भ में भारत, वियतनाम और चीन की तुलना करने वाली एक टेबल में दस्तावेज बताता है कि वियतनाम और चीन में मैन्युफैक्चरिंग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए उपयोग की जाने वाली मशीनरी जैसे क्षेत्रों में सब्सिडी का ढांचा भारत की तुलना में अधिक उद्योग अनुकूल है.

दस्तावेज में बताया गया है कि लागत संबंधी ये फैक्टर 2018 के विश्लेषण पर आधारित हैं और तबसे चीन में बिजली की कमी को देखते हुए लागत अंतर घटने का ‘अनुमान’ है. साथ ही डाक्यूमेंट में यह भी कहा गया है कि ‘ऐसी दिक्कतें इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भारत के साथ-साथ चीन और वियतनाम की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी प्रभावित करती हैं.


यह भी पढ़ें : कॉमर्शियल करारों से पहले भारत को होमवर्क करना चाहिए, सौदे की कला में अस्पष्टता के लिए कोई जगह नहीं


उपयुक्त इकोसिस्टम का अभाव, आयात लागत ज्यादा होना

एक अन्य चुनौती यह है कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के लिए आवश्यक कंपोनेंट का स्थानीय रूप से उत्पादन करने वाली कंपनियों के एक मजबूत इकोसिस्टम का अभाव है.

विजन डॉक्यूमेंट में कहा गया है, ‘भारत में एक पूर्ण कंपोनेंट इकोसिस्टम की अनुपस्थिति में आवश्यक कलपुर्जों के आयात की जरूरत पड़ती है, जिसका नतीजा यह होता है कि निर्माताओं के लिए लागत और उत्पादन में लगने वाला समय दोनों बढ़ जाते हैं…इसके अलावा, सस्ते और कुशल मैनपॉवर की उपलब्धता के मद्देनजर भारत में ऐसे कंपोनेट का निर्माण भी कम होता है जिसमें श्रम अधिक लगता है और व्यावहारिक तौर पर भारत में निर्माण संभव है. स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक सक्रिय नीतिगत समर्थन, जिसमें घरेलू कंपनियां भी शामिल हो, मौजूदा समय में नदारत प्रतीत होता है.’

आवश्यक कलपुर्जों के आयात पर आने वाली लागत काफी ज्यादा होने को भी एक चुनौती के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.

इसमें कहा गया है, ‘अगर अन्य एशियाई देशों के साथ तुलना की जाए तो भारत इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के इनपुट पर अधिकतम शुल्क लगाता है और इस तरह के टैरिफ में अक्सर संशोधन भी होते रहते हैं.’

डॉक्यूमेंट में उन जगहों के बारे में बताया गया है जहां ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ाया जा सकता है.

इसमें कहा गया है, ‘सरकार की नीतिगत पहलों और योजनाओं में भूमि की लागत को शामिल नहीं किया जाता है…भूमि अधिग्रहण की बोझिल प्रक्रिया निश्चित तौर पर किसी निर्माण इकाई की स्थापना के लिए एक बाधा के तौर पर कार्य करती है.’

भारत में इस सेक्टर के लिए ‘कोई आयकर मुक्त अवधि नहीं’

एक और चुनौती यह है कि चीन और वियतनाम निर्माताओं को भवन और डॉरमेट्री जैसे संसाधन ‘आसानी से’ उपलब्ध कराते हैं, और यहां तक कि ‘सरकारी प्रशासन की तरफ से नियामक अनुपालन का पूरा ध्यान दिया जाता है.’ जबकि भारत में ऐसी पहल नहीं की जाती है.

डॉक्यूमेंट में यह भी कहा गया है कि विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का अभाव इस क्षेत्र के लिए एक और चुनौती है.

वहीं, ‘दंडात्मक शुल्क संरचना और टैक्स लेवी’ भी भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के विकास में एक और बड़ी बाधा है.

डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि हाई टैरिफ के जरिये आयात को हतोत्साहित करके लोकल सेक्टर के विकास को बढ़ावा देना सही नहीं है, क्योंकि इससे मैन्युफैक्चरर देश छोड़ सकते हैं. डॉक्यूमेंट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि हाई टैक्स लेवी के कारण ही सोनी और श्याओमी ने ब्राजील में अपनी इकाइयां बंद कर दीं.

भारत में कराधान एक और चुनौती है. चीन और वियतनाम की तुलना में भारत ‘इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं को कम ही आयकर छूट और राहत’ ही देता है.

डॉक्यूमेंट में बताया गया है, ‘भारत में आयकर छूट की अवधि भी वियतनाम की तरह नहीं है.वियतनाम में आयकर से छूट या रियायती दरों की अवधि 10 से 30 वर्षों तक लंबे समय के लिए होती है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

share & View comments