2026 में ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता संभालते हुए भारत का उद्देश्य इसे “सहयोग और स्थायित्व के लिए मज़बूती और इनोवेशन की बुनियाद” (Building Resilience and Innovation for Cooperation and Sustainability) के तौर पर नए सिरे से परिभाषित करना है, जिसका आधार है जन-केंद्रित और मानवता-प्रथम दृष्टिकोण. जनवरी 2026 में शिखर सम्मेलन का लोगो लॉन्च करने के मौके पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, “भारत ब्रिक्स को संवाद और विकास के लिए एक रचनात्मक मंच के रूप में देखता है, जो व्यापक बहुपक्षीय व्यवस्था का पूरक है.” जब इस समूह की विविधता बढ़ती जा रही है, नई दिल्ली को ऐसी अध्यक्षता विरासत में मिली है जिसे कई अनसुलझी चुनौतियों का सामना करना है—बढ़ते हुए टैरिफ का दबाव, करेंसी डाइवर्सिफिकेशन के रुके पड़े मेकेनिज़्म, कम पूंजी वाला न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB), और बिना तय नियमों वाली सदस्यता प्रक्रिया.
इस लेख में कहा गया है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसी एक विशेष संकट का प्रबंधन करना नहीं, बल्कि विस्तार और संस्थागत तालमेल के बीच अंदरूनी तनाव का समाधान करना है. यह तनाव तीन संरचनात्मक क्षेत्रों में साफ़ दिखाई देता है: ब्रिक्स के भीतर आपसी व्यापार, न्यू डेवलपमेंट बैंक की संस्थागत विश्वसनीयता, और सदस्यता.
2025 से 2026 तक मिली-जुली विरासत
2000 के दशक के बीच में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए BRICS एक ज़रिया बनकर उभरा, ताकि ग्लोबल फाइनेंशियल गवर्नेंस में उनका पक्ष ज़्यादा मज़बूत हो सके. इसने ब्रेटन वुड्स इंस्टीट्यूशन में बदलाव, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए वोटिंग के अधिकार बढ़ाने और ज़्यादा प्रतिनिधित्व वाली बहुपक्षीय व्यवस्था के पक्ष में आवाज़ उठाई. इन लक्ष्यों का मकसद विकासशील देशों की आवाज़ को मज़बूती देना है, खासकर यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड और वर्ल्ड बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकसित देशों के दबदबे को देखते हुए. इस ग्रुप ने विकासशील देशों की उन चिंताओं को प्राथमिकता देना जारी रखा है जिनसे विकसित देशों पर निर्भरता कम होती है. संस्थागत रूप से ब्रिक्स ने ठोस नतीजे दिए हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है न्यू डेवलपमेंट बैंक, जिसे मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के पूरक के तौर पर डिज़ाइन किया गया है.
2025 में ब्राज़ील की अध्यक्षता में संस्थागत निरंतरता की कमी दिखाई दी. 2024 में रूस की अध्यक्षता के दौरान बनी आर्थिक प्राथमिकताओं जैसे स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की व्यवस्था तथा कन्टिन्जेंट रिज़र्व अरेंजमेंट (Contingent Reserve Arrangement) को आगे बढ़ाने की रफ्तार काफ़ी धीमी पड़ गई. जी-20 (2024) और कॉप-30 (2025) की अपनी अध्यक्षताओं के बीच, रियो घोषणापत्र में वही प्राथमिकताएं दिखीं जो जी-20 और कॉप-30 के घोषणापत्रों में भी प्रमुख थीं. राष्ट्रीय स्तर पर ब्राज़ील ने व्यापार में आसानी, क्लाइमेट फाइनेंस और सार्वजनिक स्वास्थ्य सहयोग पर ज़ोर दिया. इसके अलावा, 2025 में संयुक्त राज्य अमेरिका के टैरिफ से जुड़े दबावों (टेबल 1 देखें) का जवाब ब्राज़ील ने ब्लॉक-लेवल समन्वित रणनीति अपनाने के बजाय द्विपक्षीय माध्यमों से दिया.
इसलिए, भारत को धीमी तरक्की और ब्लॉक के अंदर एकीकरण की चुनौतियों वाला मंच विरासत में मिला है. अहम बात ये है कि भारत ब्लॉक के अंदर आपसी व्यापार को बढ़ावा देकर, NDB को मज़बूत करके और सदस्यता पर संस्थागत स्पष्टता देकर सबसे अच्छा संतुलन बना सकता है.
इंट्रा-ब्लॉक ट्रेड
ब्रिक्स देशों के बीच होने वाला व्यापार अभी भी संरचनात्मक रूप से विकसित नहीं हो पाया है. संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) के मुताबिक, हालांकि विकासशील देशों (Global South) के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का दो-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा ब्रिक्स के सदस्य देशों से आता है, फिर भी विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी व्यापार का सिर्फ़ करीब 20 परसेंट ही ब्रिक्स देशों के बीच होता है. ये दर्शाता है कि अगर ब्रिक्स के भीतर व्यापार को आसान बनाया जाए, तो कितनी बड़ी संभावना का फायदा उठाया जा सकता है.
हालांकि ब्रिक्स की व्यापारिक संरचना अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं के उपयोग को प्रोत्साहित करती है, फिर भी ये ज़्यादातर द्विपक्षीय स्तर तक सीमित है. ब्रिक्स के भीतर व्यापार में दो अलग पैटर्न साफ़ दिखाई देते हैं. पहला, सदस्य देशों में सबसे बड़े इंपोर्टर और एक्सपोर्टर के तौर पर चीन की भूमिका इंट्रा-ब्लॉक ट्रेड में मुख्य बनी हुई है. व्यापार के प्रमुख हिस्से में प्राइमरी कमोडिटीज़ और ऊंची कीमत वाले मैन्युफैक्चर्ड सामान शामिल हैं. ब्रिक्स के व्यापार मंत्रियों की पंद्रहवीं बैठक में भारत ने सदस्य देशों के बीच एक्सपोर्ट कंट्रोल्स को खत्म करने की मांग रखी थी, ताकि आपसी व्यापार को बढ़ाया जा सके.
दूसरा पैटर्न है- भले ही ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर को रिज़र्व करेंसी के तौर पर इस्तेमाल करना जारी रखे हुए हैं, नेशनल करेंसी में व्यापार करके अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश हो रही है, लेकिन ब्रिक्स करेंसी बनाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं हो रही है. ध्यान देने वाली बात है कि चीन और रूस के बीच 99 परसेंट (नवंबर 2025 तक) आपसी व्यापार रूबल और युआन का इस्तेमाल करके होता है. इसके अलावा, साउथ अफ्रीका का स्टैंडर्ड बैंक, चीन के क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (CIPS जो 2015 में लॉन्च हुआ) से सीधा जुड़ा है, जिससे बिज़नेसमैन अमेरिकी डॉलर में कन्वर्ज़न किए बगैर सीधे रेनमिनबी में चीन के साथ सौदों का भुगतान कर सकते हैं. रूस का सिस्टम फॉर ट्रांसफर ऑफ़ फाइनेंशियल मैसेजेस (SPFS जो 2014 में लॉन्च हुआ) चौबीस देशों के 177 वित्तीय संस्थानों के साथ पार्टनर है (2024 तक). लेकिन, ये देखते हुए कि CIPS और SPFS हाल ही में बने हैं, वे SWIFT (1973 में बना) जैसे इंस्टीट्यूशन से मुकाबला करने के लिए काफ़ी पीछे हैं, जो दुनिया भर के 11,000 से ज़्यादा बैंकों से जुड़ा है. हालांकि अमेरिकी डॉलर प्राइमरी रिज़र्व करेंसी (सितंबर 2025 तक ग्लोबल फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व का 57 प्रतिशत) के तौर पर गहरी पकड़ रखता है, ब्रिक्स देशों का मकसद ऐसे दूसरे सिस्टम के ज़रिए धीरे-धीरे मज़बूती बनाना है, जिसमें वे द्विपक्षीय प्रबंधों के माध्यम से हिस्सा लेते हैं, हालांकि डॉलर को दूर करने का कोई भी बदलाव धीमी रफ्तार से ही होने की संभावना है.
न्यू डेवलपमेंट बैंक
न्यू डेवलपमेंट बैंक ग्लोबल फाइनेंशियल फ्रेमवर्क के तहत काम करता है, जिसका मकसद वित्तीय साख को बनाए रखना और उसे बढ़ाना है. अभी, इसके सदस्यों में छह नॉन-ब्रिक्स देश शामिल हैं और यह संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देशों के लिए खुला है. फिलहाल, NDB की पूंजी सिर्फ़ $100 बिलियन है जो पर्याप्त नहीं है और भविष्य में निवेश बढ़ाने का कोई संकेत भी नहीं है. इसके विस्तार के लिए सदस्यों के ज़्यादा सहयोग और इसकी वित्तीय साख में ज़्यादा भरोसे की ज़रूरत होगी. बैंक के लिए एक बड़ी चिंता इसका विस्तार और “सहयोग के लिए मंच” के तौर पर इसकी भूमिका को मज़बूत करना है, जैसा कि NDB प्रेसिडेंट, डिल्मा रूसेफ ने कहा है. उनका मानना है कि इसके लिए दूसरे बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों और डेवलपमेंट बैंकों के साथ को-फाइनेंसिंग में ज़्यादा भागीदारी की ज़रूरत होगी.
बैंक की ताक़त नेशनल करेंसीज़ में लोन देने और पूंजी देने की उसकी इच्छा और क्षमता में भी है, जिससे एक्सचेंज रेट का रिस्क कम होता है. 31 दिसंबर 2022 तक, NDB ने 139 प्रोजेक्ट्स के लिए $42.9 बिलियन की फाइनेंसिंग को मंज़ूरी दी. इनमें 2,400 मेगा वाट रिन्युएबल और क्लीन एनर्जी जेनरेशन कैपेसिटी लगाना, 35,000 हाउसिंग यूनिट्स बनाना और 1,400 किलोमीटर लंबी पानी की सुरंगें या नहर के बुनियादी ढांचे को बेहतर करना जैसे लक्ष्य शामिल हैं. इसका मकसद 14.7 मिलियन टन CO2 एमिशन से बचना भी है. 2022 और 2025 के बीच, NDB ने क्लीन एनर्जी और एनर्जी ट्रांज़िशन, ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, वॉटर और सैनिटेशन, एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन, सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर समेत डेवलपमेंट एरिया में पैंतालीस प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दी.
लोन देने की क्षमता का दायरा बढ़ाने और शेयरहोल्डिंग बढ़ाने से NDB की साख और पूंजी आधार को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी. विशेष रूप से, रियो में 2025 के शिखर सम्मेलन में हुई ब्रिक्स मल्टीलेटरल गारंटी इनिशिएटिव की शुरुआत से, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में रणनीतिक निवेश का जोखिम घटाने और साख को बेहतर बनाने के लिए विशेष वित्तीय साधन भी सामने आएंगे.
सदस्यता
ब्रिक्स का विस्तार इस समूह को मज़बूत कर सकता है ताकि पश्चिमी देशों के दबदबे वाले ग्लोबल फाइनेंशियल फ्रेमवर्क से आगे भी काम किया जा सके, खास तौर पर अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करके. हालांकि, ये सदस्य देशों के बीच लगातार विवाद का मुद्दा रहा है. अहम बात ये है कि सदस्यता के लिए तय मापदंड नहीं हैं. ब्रिक्स के इस तरह के विस्तार का नतीजा हुआ है कि रणनीतिक साझीदारों का एक मध्यम स्तर बन गया है, जहां ऐसे देश हैं जो पूर्णकालिक सदस्य नहीं हैं और वे संस्थागत या आर्थिक साझेदारी के माध्यम से समूह का अंग हैं, लेकिन समूह के अंदर उनकी भूमिका साफ़ नहीं है. इतने बड़े समूह के साथ आम सहमति बनाना भी लगातार मुश्किल होता जा रहा है.
सऊदी अरब को ब्रिक्स में शामिल करना सबसे लंबा चलने वाला मामला रहा है. इसे 2023 में अर्जेंटीना (जिसने प्रस्ताव ठुकरा दिया), मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के साथ आधिकारिक रूप से शामिल होने के लिए बुलाया गया था. हालांकि सऊदी अरब ने आधिकारिक रूप से न्योता स्वीकार नहीं किया है, इसने 2025 में रियो शिखर सम्मेलन समेत ब्रिक्स की चर्चाओं में लगातार हिस्सा लिया है. वैसे तो, इसकी सोच समूह की आर्थिक और विकास संबंधी प्राथमिकताओं के साथ मेल खाती है, लेकिन यह दूसरे सदस्यों के साथ रणनीतिक तालमेल की धारणा के खिलाफ संतुलन बनाने में लगा रहता है. सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं पर रचनात्मक और चुनिंदा तरीके से सहयोग करना 2026 में आगे बढ़ने का उपाय है.
ईरान की सदस्यता भी बढ़ते विवाद का विषय रहा है. रणनीतिक तौर पर, ब्रिक्स में ईरान की सदस्यता भारत के लिए सहभागिता के ज़्यादा मौके बनाती है, खासकर ऊर्जा सुरक्षा की उसकी प्राथमिकताओं और चाबहार पोर्ट के भविष्य को देखते हुए. 2026 के पश्चिम एशिया संकट को लेकर, हालांकि ब्रिक्स की तरफ से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया, भारत ने इस इलाके में तनाव बढ़ने पर चिंता जताई और इलाके की संप्रभुता का सम्मान करने की अपील की. विदेश मंत्रालय ने 14 मार्च, 2026 को कहा, “ब्रिक्स के कुछ सदस्य पश्चिम एशिया इलाके के मौजूदा हालात में सीधे तौर पर शामिल हैं, जिसका असर चल रहे संघर्ष पर ब्रिक्स के साझा रुख पर आम सहमति बनाने पर पड़ा है. ब्रिक्स अध्यक्ष के तौर पर, भारत शेरपा चैनल के ज़रिए सदस्यों के बीच बातचीत को आसान बना रहा है.” भारत ने 8 अप्रैल, 2026 को युद्ध विराम का स्वागत किया, खासकर ग्लोबल एनर्जी सप्लाई और कारोबार में रुकावटों को देखते हुए, और होर्मुज़ स्ट्रेट में भारतीय झंडे वाले जहाज़ों पर हुई गोलीबारी की घटना के बारे में एक बयान जारी किया. यह 2025 में ब्राज़ील की अध्यक्षता के उलट है, जब पूरे समूह ने पश्चिम एशिया संकट पर मिलकर एक साझा बयान जारी किया और आधिकारिक रियो घोषणा पत्र में ईरान में इज़राइली हमलों की कड़ी निंदा की गई थी, जबकि दूसरे पश्चिम एशियाई देश और ब्रिक्स सदस्य/सहयोगी सीधे तौर पर इस संकट में शामिल नहीं थे.
इस तरह, ब्रिक्स सदस्यता पर आम सहमति बनाना लगातार चलने वाली एक समस्या बनी हुई है. असल में, अभी नए विस्तार की उम्मीद नहीं है क्योंकि समूह की प्राथमिकता “ब्रिक्स की गतिविधियों में सदस्यों और सहयोगियों को पूरे तौर पर शामिल करना” है.
भारत की अध्यक्षता
ब्लॉक के अंदर और बाहर से उम्मीदें अक्सर उससे ज़्यादा होती हैं जो ये समूह वाकई में पूरी कर सकता है. बढ़ती पहुंच के साथ, ब्रिक्स अभी भी एक जटिल और विविध समूह बना हुआ है, जिसमें सदस्यता, आम सहमति बनाने और भरोसेमंद वित्तीय प्रक्रियाओं के लिए साफ़ नियम-कायदों की कमी है. पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट ब्रिक्स के लिए माहौल को नए सिरे से ढाल रहा है, एक नया नॉर्मल बना रहा है जहां अंदरूनी तालमेल बनाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. संकट में सदस्य देशों के शामिल होने की वजह से समूह के अंदर आम सहमति ज़्यादा जटिल और विवादित है.
भारत ने 14-15 मई, 2026 को विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित की. ज़्यादातर सदस्यों ने अपने प्रतिनिधियों के रूप में अपने विदेश मंत्री भेजे. भारत में चीन के राजदूत और सऊदी अरब के विदेश मामलों के उप मंत्री ने अपने-अपने देशों का प्रतिनिधित्व किया. अपने राष्ट्रीय संबोधन में, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पश्चिम एशिया में संघर्ष पर खास ज़ोर दिया, स्थिति की गंभीरता को रेखांकित किया और कहा कि “होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर समेत अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के माध्यम से सुरक्षित और बिना रुकावट वाला समुद्री यातायात, वैश्विक स्तर पर आर्थिक खुशहाली के लिए ज़रूरी है.” इसके अलावा, BRICS@20 पर बयान में, उन्होंने “अंतरराष्ट्रीय समझ, एकजुटता, खुलेपन, सबको साथ लेकर चलने, पूरी तरह सलाह-मशविरे और आम सहमति के सिद्धांतों के अनुसार” समूह को मज़बूत करने की भारत की प्रतिबद्धता फिर से दोहराई.
सदस्यों के बीच आम सहमति बनाने में मुश्किल दो उदाहरणों में साफ़ दिखी. पहला, विदेश मंत्रियों की बैठक में कोई आधिकारिक संयुक्त बयान नहीं दिया गया, सिर्फ़ अध्यक्ष का बयान (चेयर्स स्टेटमेंट) और परिणाम दस्तावेज़ (आउटकम डॉक्यूमेंट) जारी किया गया. दूसरा, अध्यक्ष के बयान में तीन मुद्दों पर सदस्यों की आपत्तियों का ज़िक्र था: पश्चिम एशिया/मध्य पूर्व इलाके के हालात पर अलग-अलग राय, गाज़ा पट्टी की अधिकृत फ़िलिस्तीनी क्षेत्र के एक अहम अंग के तौर पर मान्यता, और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत लाल सागर और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में सभी देशों के जहाज़ों को आने-जाने का अधिकार और आज़ादी.
ब्रिक्स के लिए – और इसके अध्यक्ष के तौर पर भारत के लिए – लगातार चुनौती ये है कि एक विस्तारित, विविध समूह के रूप में इसकी भूमिका तय की जाए. “बहुत ज़्यादा भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता” के कारण मतभेद साफ़ दिखते हैं. सितंबर में होने वाले शिखर सम्मेलन के नतीजे बेशक विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद होने वाले बदलावों और तेज़ी से बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय तनावों पर निर्भर करेंगे.
इस लेख का अनुवाद कार्नेगी इंडिया के धीरज कुमार ने किया है.
यह लेख कार्नेगी इंडिया में पहले पब्लिश हो चुका है. विचार निजी हैं.
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