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Wednesday, 17 July, 2024
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UP में 2022 के चुनाव का रास्ता विपक्ष की जाति जनगणना की मांग से होकर ही क्यों गुजरता है

बीजू जनता दल (बीजद) और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) जैसी पार्टियां, जो आमतौर पर राज्यसभा में महत्वपूर्ण मुद्दों पर भाजपा का समर्थन करती रही हैं, ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे पूरी तरह जाति-आधारित जनगणना के समर्थन में हैं.

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने और नरेंद्र मोदी सरकार से मुकाबले के लिए विपक्ष के एक बड़े मुद्दे की तलाश में जुटे होने के बीच ओबीसी को लेकर राजनीति एक बार फिर तेज हो गई है.

इसने आश्चर्यजनक ढंग से राजनीतिक विरोधियों को एकजुट कर दिया है- उदाहरण के तौर पर बिहार में नीतीश कुमार का जनता दल (यूनाइटेड) और तेजस्वी यादव का राष्ट्रीय जनता दल (राजद)—और जो दो मांगें राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से भिड़ी रहने वाली पार्टियों को एक साथ जोड़ रही हैं, वे हैं जाति जनगणना और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाना.

इस सबमें अचानक तेजी की एक वजह नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से पेश 127वां संविधान संशोधन कानून है और इसे पूरे देश में विपक्षी दलों का समर्थन मिला है.

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी जाति जनगणना के पक्ष में मांग उठाई थी. उनकी कट्टर प्रतिद्वंद्वी मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के अलावा भाजपा के अपने गठबंधन सहयोगी अपना दल और निषाद पार्टी भी इस मुद्दे पर मजबूती से उनका साथ दे रहे हैं.

बीजू जनता दल (बीजद) और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) जैसी पार्टियां, जो आमतौर पर राज्यसभा में महत्वपूर्ण मुद्दों पर भाजपा का समर्थन करती रही हैं, ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे पूरी तरह जाति-आधारित जनगणना के समर्थन में हैं. यहां तक कि दक्षिण में द्रमुक से लेकर पूर्व में तृणमूल कांग्रेस तक अन्य विपक्षी दल भी मजबूती से इस मांग के साथ हैं. भाजपा सांसद संघमित्रा मौर्य और गणेश सिंह भी इसका समर्थन कर रहे हैं.

सरकार इस मुद्दे पर अपने रुख में पूरी सतर्कता बरत रही है. यह पूछे जाने पर कि क्या सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) होगी, एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘इस संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया गया है.’ अधिकारी ने कहा, ‘आज की तारीख की बात करें तो अभी इस पर कोई स्पष्टता नहीं है कि एसईसीसी होगी या नहीं. हालांकि, सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को छोड़कर कोई जाति जनगणना नहीं होगी. जनगणना 2021 के बाद एसईसीसी का प्रस्ताव जरूर है, लेकिन इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है.’

राजनीतिक प्रतिष्ठानों के संकेत कुछ भ्रामक रहे हैं. 20 जुलाई को संसद में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि सरकार ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का मामला छोड़कर, आबादी की जाति-आधारित गणना नहीं करने का फैसला किया है. भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम ने दिप्रिंट को बताया कि इस मांग पर भाजपा का पूरा ध्यान है और सही समय आने पर सरकार इस पर विचार करेगी. फिलहाल पार्टी ने इस बारे में कोई राय नहीं बनाई है.’

हालांकि, 2018 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने घोषणा की थी कि 2021 की जनगणना के दौरान ओबीसी आबादी की जनगणना होगी. सरकार ने 2017 में गठित रोहिणी आयोग की रिपोर्ट पेश किए जाने से भी परहेज किया है. आयोग गठित करने के पीछे मुख्य विचार यह था कि उन ओबीसी जातियों को आरक्षण का लाभ दिया जा सके जो 2,633 जातियों की केंद्रीय सूची से बाहर हो गए थे.

इसका कारण यही था कि सरकार की राय में जाति जनगणना की मांग को उन 100 प्रभावशाली जातियों का समर्थन हासिल है, जो 27 प्रतिशत ओबीसी कोटे के सबसे बड़े लाभार्थी रही हैं.

‘मंडल और कमंडल से परे’

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और इलाहाबाद सोशल इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर बद्रीनारायण इसे जातीय ध्रुवीकरण और राम जन्मभूमि मोमेंट से परे की लड़ाई बताते हैं. उन्होंने कहा, ‘यह मंडल और कमंडल से परे है. क्षेत्रीय दलों को लगता है कि भाजपा ने जातीय समीकरण और धार्मिक ध्रुवीकरण के बीच सही संतुलन कायम कर लिया है. भाजपा का ओबीसी जनाधार लगातार बढ़ रहा है. भाजपा की आक्रामक हिंदुत्व-आधारित राजनीति और प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता का मुकाबला करने के लिए जाति-आधारित जनगणना विपक्ष का एकमात्र हथियार साबित हो सकती है.’


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सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार कहते हैं कि यह समय भी उपयुक्त है क्योंकि जल्द ही एक नई जनगणना शुरू होने वाली है.

उन्होंने कहा, ‘अगर वे अब भी ऐसा नहीं कर पाते तो फिर कब करेंगे? यह राजनीतिक तौर पर भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपी विधानसभा चुनाव नजदीक ही हैं. यह मुद्दे उठाना सपा, बसपा जैसी जाति की राजनीति करने वाली पार्टियों के लिए न केवल अपना वोट बैंक और मजबूत करने का बेहतरीन अवसर है, बल्कि भाजपा के अपने सामाजिक वोट बैंक को चुनौती देने का भी मौका मिलेगा.

उन्होंने कहा, ‘2024 के लोकसभा चुनाव में केंद्र की सत्ता पर काबिज होने का रास्ता हमेशा की तरह यूपी से होकर ही गुजरेगा, ऐसे में जाति आधारित जनगणना और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है.’

क्षेत्रीय दलों को उम्मीद है कि हिंदुत्व के व्यापक ढांचे के तहत पिछड़ी जातियों को साथ लाने के उद्देश्य से आरएसएस-भाजपा गठजोड़ की तरफ शुरू किए गए अभियान को एक बड़ा झटका लगेगा. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बढ़ती खाई कम होगी. और जिन जातियों को अब तक लाभ नहीं मिल पाया है, वह भी इस पायदान पर चढ़ जाएंगी.

दरअसल यही वह बात है जिस पर वाईएसआरसीपी के लोकसभा सदस्य वी. चंद्रशेखर जोर देते हैं. उनका कहना है, ‘जाति आधारित जनगणना के बाद ही हम पिछड़ी जातियों के कल्याण के लिए विशेष योजनाएं तैयार करने में सक्षम हो पाएंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि मंडल आयोग की रिपोर्ट के समय इस्तेमाल डाटा तो 1931 की जनगणना से लिया गया था, जिसमें ओबीसी समुदायों की राष्ट्रव्यापी आबादी 52 प्रतिशत थी और इसी वजह से 27 फीसदी आरक्षण तय किया गया. यह जानना महत्वपूर्ण है कि उसके बाद यह जनसंख्या बढ़ी है या घटी है.’

इससे पहले 1931 में ही ब्रिटिश शासन के दौरान जाति आधारित जनगणना की गई थी. जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष लल्लन सिंह का कहना है, ‘हम पुरातन आंकड़ों के आधार पर नीतियां तैयार करना कैसे जारी रख सकते हैं.’

अखिलेश यादव, जो जी-जान से सत्ता में वापसी के रास्ते और उपाय खोजने में जुटे हैं, भी इसके साथ ही सुर मिलाते हुए कहते हैं, ‘मोदी सरकार उन पिछड़े वर्गों की जनगणना कराने से क्यों कतरा रही है, जिनके वोटों की बदौलत ही वह सत्ता में पहुंची है.’
उन्होंने सरकार से यह भी कहा कि कम से कम 2011 की जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े ही जारी कर दे, जो पहले से ही उसके पास हैं.

एक तार्किक दुःस्वप्न

मंडल आयोग की रिपोर्ट ने मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, चौधरी देवीलाल और उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला जैसे जाति आधारित राजनीति करने वाले कई नेताओं और क्षेत्रीय क्षत्रपों को उभारा, जो दो दशकों से अधिक समय तक उत्तर भारत की राजनीति पर हावी रहे.

संजय कुमार कहते हैं कि अब, जाति आधारित जनगणना की यह मांग मंडल 2.0 की तरह है. नीतीश कुमार महादलित और ईबीसी जैसे समूह बनाकर पहले ही दलितों और ओबीसी को फिर से वर्गीकृत कर चुके हैं. यदि ओबीसी जनगणना की जाती है, तो इन पार्टियों को अपना आधार बढ़ाने का एक और नया अवसर मिलेगा.

लेकिन सरकार रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू करके भी वही नतीजे हासिल कर सकती है, जिससे लाभ का एक बड़ा हिस्सा गैर-यादव ओबीसी जातियों के खाते में जाना सुनिश्चित होगा. सभी राजनीतिक दलों के समक्ष असली दुविधा तो यह है कि यदि कोई नई जाति-आधारित जनगणना की जाती है, तो देश की आबादी में कई जातियों का अनुपात बदल जाएगा. ऐसे में हर राज्य में आरक्षण का फॉर्मूला बदलने की जरूरत उत्पन्न हो जाएगी और तार्किक आधार पर यह किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है.
यह एक ऐसी स्थिति है जिससे केंद्र की कोई भी सरकार बचना चाहेगी. 2011 में मनमोहन सिंह सरकार ने लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे सहयोगियों के दबाव में आकर पहली सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना कराई थी.

इस पूरी कवायद से देशभर में 4,69,000 जातियां, उपजातियां और गोत्र होने का पता चला. हालांकि, बाद में सरकार ने दावा किया कि जाति आधारित डाटा में कई त्रुटियां थीं. इन्हीं त्रुटियों का पता लगाने के लिए मोदी सरकार ने 2015 में नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया था. पनगढ़िया समिति ने तो 2017 में अपनी रिपोर्ट दे दी लेकिन इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया. संसद में मंगलवार को एक चर्चा के दौरान द्रमुक नेता टी.आर. बालू ने कहा कि पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वादा किया था कि सरकार 2011 की जाति जनगणना के आंकड़े जारी करेगी, लेकिन वो ऐसा करने में नाकाम रही है.

इस पेचीदा स्थिति से निपटने का सरकार का तरीका उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे तय करने में निर्णायक हो सकता है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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