Thursday, 20 January, 2022
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ओपी राजभर का सपा के साथ गठबंधन क्यों पूर्वी उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने पिछले हफ्ते 2022 के यूपी चुनावों के लिए समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की घोषणा करते हुए कहा कि इससे ‘भाजपा का सफाया’ हो जाएगा.

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नई दिल्ली: काफी समय टाल-मटोल करने और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अधर में लटकाए रखने के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने आखिरकार पिछले हफ्ते 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन की घोषणा कर दी.

राजभर को भरोसा है कि एसपी-एसबीएसपी गठबंधन होने से राज्य में ‘भाजपा का सफाया’ हो जाएगा.

एसबीएसपी राज्य में राजभर जाति—जिसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी में रखा गया है—का प्रतिनिधित्व करती है और इसके सदस्य पूर्वी उत्तर प्रदेश और अवध क्षेत्र में चुनावी मुकाबले के लिहाज से खासी अहमियत रखते हैं.

2017 के चुनावों में एसबीएसपी के साथ गठबंधन करने वाली भाजपा पूर्वी उत्तर प्रदेश में 2012 में हासिल 14 सीटों के मुकाबले अपना आंकड़ा 72 तक पहुंचाने में सफल रही था. वहीं इस क्षेत्र में सपा की सीटों की संख्या 2017 में घटकर 9 रह गई थी जो 2012 में 52 थी.

2017 के विधानसभा चुनावों में एसबीएसपी ने आठ सीटों पर चुनाव लड़ा था और चार पर जीत दर्ज की थी और इन सीटों में करीब 34 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था. इस लिहाज से देखा जाए तो राजभर वोट काफी अहम हो जाता है.

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दिप्रिंट यहां आपको बता रहा है कि राजभर कौन हैं और एसबीएसपी के सपा के साथ गठबंधन के फैसले ने यूपी में सियासी पारा क्यों बढ़ा दिया है.

राजभर कौन हैं

राजभर यूपी की आबादी में करीब तीन फीसदी हैं, समुदाय के नेताओं का दावा है कि वास्तविक आंकड़ा लगभग 4.5 प्रतिशत है.
उत्तर प्रदेश में राजभर को ओबीसी वर्ग से संबंधित एक महत्वपूर्ण समुदाय माना जाता है. वे खुद को इस क्षेत्र के मध्ययुगीन हिंदू नायक श्रावस्ती के महाराजा सुहेलदेव का वंशज मानते हैं. माना जाता है कि सुहेलदेव ने 11वीं शताब्दी में यहां धावा बोलने वाली महमूद गजनी के भतीजे गाजी सैयद सालार मसूद की सेना को हराया था.

राजनीतिक टिप्पणीकार और प्रयागराज स्थित जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक बद्री नारायण कहते हैं, ‘राजभर ओबीसी समुदाय से आते हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10-12 जिलों पर उनकी अच्छी-खासी पकड़ है. इन जिलों में इनकी आबादी 20-22 प्रतिशत तक हो जाती है, जो निर्णायक फैक्टर साबित हो सकती है. वे चुनाव नतीजे तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.’

नारायण ने कहा कि समुदाय के सदस्य ज्यादातर कृषि गतिविधियों जैसे खेती या पशुपालन में लगे हैं, जबकि तमाम लोग भूमिहीन मजदूर भी हैं.

हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि राजभर वोट में विभाजन हो सकता है, क्योंकि 2017 के बाद से भाजपा ने अपने खुद के राजभर नेताओं को भी किया है.

उन्होंने कहा, ‘भाजपा भी अपना नेतृत्व स्थापित करने में कामयाब रही है, इसलिए एसबीएसपी और भाजपा के राजभर नेताओं के बीच वोट बंटने के पूरे आसार हैं.’

‘सपा चुनाव के दौरान लाभ की स्थिति में है’

लंदन यूनिवर्सिटी के रॉयल हॉलोवे में राजनीति पर पीएचडी स्कॉलर अरविंद कुमार ने कहा कि सपा चुनाव के दौरान राजभर वोट सुरक्षित करने की स्थिति में है.

उन्होंने कहा, ‘खासा प्रभाव रखने वाले राम अचल राजभर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं, जबकि ओम प्रकाश राजभर इसके साथ गठबंधन कर चुके हैं.’ साथ ही यह भी कहा कि अन्य क्षेत्रों के अलावा फैजाबाद, बस्ती, बहराइच, गोंडा, सुल्तानपुर रायबरेली, गाजीपुर, आजमगढ़ और बलिया में इस समुदाय की अच्छी-खासी हिस्सेदारी है.

कुमार ने कहा कि 2017 के विधानसभा चुनावों के रुझानों को देखते हुए, जब इस समुदाय ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत सुनिश्चित की, सपा के साथ एसबीएसपी के गठबंधन के फैसले का भी व्यापक असर दिखा.

कुमार ने कहा, ‘समुदाय के नेता ओबीसी आरक्षण को तीन हिस्सों—यादव, कुर्मी और सबसे पिछड़े (राजभर)—में बांटने की मांग कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वह आरक्षण का उतना लाभ नहीं पा रहे हैं जैसा उन्हें मिलना चाहिए था. हालांकि, भाजपा ने इस पर विचार का वादा किया था और यहां तक कि जस्टिस रोहिणी उप-वर्गीकरण पैनल भी गठित किया था, लेकिन इसे विस्तार के बाद विस्तार मिल रहा है. इसने राजभर नेताओं का मोहभंग और बढ़ा दिया है.’

कुमार ने आगे कहा कि भाजपा के लिए दुविधा यह है कि राजभर और एसबीएसपी की मांगों को मानने से कुशवाहा, कुर्मी और जाट जैसे अन्य समुदाय नाराज हो सकते हैं. उन्होंने कहा, ‘भाजपा का इस बार एसबीएसपी के साथ गठबंधन न हो पाने की यह एक प्रमुख वजह हो सकती है.’

‘भाजपा का सफाया हो जाएगा’

एसबीएसपी प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने दिप्रिंट से बात करते हुए दोहराया कि भाजपा का सफाया हो जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘भाजपा ने ओबीसी और दलितों को धोखा देने के सिवाय कुछ नहीं किया है. उन्हें केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर वोट मिले लेकिन उत्तराखंड के एक व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया. जहां तक राजभर समुदाय का सवाल है, पूर्वी उत्तर प्रदेश में हमारी मजबूत पकड़ है. 156 सीटों पर हमारे पास 12-22 फीसदी वोट हैं.’

इस्तीफा देने से पहले योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री के तौर पर काम कर चुके राजभर ने आगे दावा किया कि उन्हें न केवल अपने समुदाय का समर्थन हासिल है, बल्कि प्रजापति, बंजारा, चौहान और विश्वकर्मा जैसे अन्य समुदाय भी उनके साथ हैं.
एसबीएसपी महासचिव और ओम प्रकाश के बेटे अरुण राजभर को भरोसा है कि उनका वोट सपा को उसी तरह ट्रांसफर हो जाएगा जैसा 2017 में भाजपा को हुआ था.

अरुण ने दिप्रिंट को बताया, ‘2017 में हमने उनको सत्ता का रास्ता दिखाया था, लेकिन इस बार पूर्वांचल में भाजपा का सफाया होगा.

हालांकि, भाजपा ने कहा कि उसकी अब भी राजभर समुदाय में दखल है.

यूपी भाजपा के उपाध्यक्ष विजय पाठक ने कहा, ‘हम जाति आधारित राजनीति में विश्वास नहीं करते हैं. हम सभी के लिए काम करते हैं. जहां तक राजभरों का सवाल है, तो यह बात सही है कि 2017 में हमारे पास समुदाय से हमारे अपने नेता नहीं थे, लेकिन समय के साथ स्थितियां बदल गई हैं.’

पाठक ने कहा, ‘अनिल राजभर यूपी में मंत्री हैं और सकलदीप राजभर राज्यसभा सांसद हैं. हम सामाजिक सम्मेलन कर रहे हैं और लोगों ने अच्छी प्रतिक्रिया दी है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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