नई दिल्ली: जनता दल (यूनाइटेड) के नेता, बिहार के ताकतवर ग्रामीण कार्य मंत्री और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी सहयोगी अशोक चौधरी पर अब सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और प्रशांत किशोर की जन सुराज ही नहीं, बल्कि एनडीए सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) भी हमलावर हो गई है.
बीजेपी नेता और नीतीश के डिप्टी विजय सिन्हा ने इस हफ्ते की शुरुआत में चौधरी की आलोचना की. इसे चुनावी साल में बीजेपी की उस कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है जिसमें वह नीतीश की नेतृत्व शैली पर अंकुश लगाने और गठबंधन की छवि को बिगड़ने से बचाने की कोशिश कर रही है.
दोनों नेताओं के बीच टकराव मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में दिखाई दिया. चौधरी ने कृषि विभाग संभाल रहे विजय सिन्हा से पूछा कि उनके विभाग की ज़मीन चेनपुर विधानसभा क्षेत्र (जिसका प्रतिनिधित्व जेडीयू मंत्री ज़मा खान करते हैं) में कॉलेज बनाने के लिए क्यों नहीं दी जा रही.
सिन्हा ने जवाब दिया कि कृषि भूमि का ट्रांसफर मुख्यमंत्री कुमार ने रोक दिया है और यह उनकी मंजूरी के बिना संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि विभाग तभी ज़मीन देगा जब बदले में उसे कोई दूसरी ज़मीन मिले. उन्होंने कहा, “अगर मैं ऐसे ही ज़मीन दे दूं तो लोग क्या कहेंगे?”
इस पर नाराज़ चौधरी ने पलटकर पूछा, “क्या आप ज़िंदगी भर कृषि मंत्री रहेंगे?”
बीजेपी नेता ने भी तुरंत पलटवार किया. उन्होंने कहा, “पहले से ही लोग आपके मंत्रालय पर सवाल उठा रहे हैं और उसकी छवि खराब हो रही है. आपको अपने मंत्रालय पर ध्यान देना चाहिए.”
सूत्रों का कहना है कि सिन्हा का यह हमला हाल ही में तब और तेज़ हो गया जब बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने चौधरी के ग्रामीण कार्य विभाग के अभियंता विनोद कुमार की गिरफ्तारी को लेकर उन पर निशाना साधा. विनोद कुमार को आर्थिक अपराध इकाई (EoW) ने भ्रष्टाचार के मामले में पकड़ा.
आरोप है कि इंजीनियर और उसके परिवार ने 10 करोड़ रुपये नकद जलाकर और नाली में बहाकर सबूत मिटाने की कोशिश की, जिससे सीवर चोक हो गया. छापे के दौरान ईओडब्ल्यू ने 52 लाख रुपये नकद बरामद किए, जिनमें से लगभग 39 लाख की करेंसी पूरी तरह खराब हो चुकी थी.
तेजस्वी यादव, जो राघोपुर से आरजेडी विधायक भी हैं, उन्होंने इस मामले पर एक्स पर लंबी पोस्ट लिखी और शीर्षक दिया—“मोदी-नीतीश भ्रष्टाचार की अजीबोगरीब कहानी.”
उन्होंने लिखा, “पटना, जो गंगा किनारे बसा बिहार की राजधानी है, वहां रात 1:30 बजे ईओयू की टीम एक ताकतवर मंत्री के करीबी इंजीनियर के घर पहुंची, लेकिन इंजीनियर की पत्नी ने सुबह 6 बजे तक दरवाजा नहीं खोला. इन कुछ घंटों में सबूत मिटाने के लिए करीब 10 करोड़ रुपये जलाने की कोशिश की गई.
मोदी-नीतीश के भ्रष्टाचार की अजब-गजब कहानी!
गंगा किनारे बसी बिहार की राजधानी पटना में रात 𝟏:𝟑𝟎 बजे एक शक्तिशाली मंत्री के करीबी इंजीनियर के घर 𝐄𝐎𝐔 की टीम पहुंची लेकिन इंजीनियर की पत्नी ने सुबह छह बजे तक गेट नहीं खोला।
इन चंद घंटों में लगभग 𝟏𝟎 करोड़ ₹ जलाकर सबूत मिटाने…
— Tejashwi Yadav (@yadavtejashwi) August 25, 2025
उन्होंने आगे लिखा, “जले हुए नोटों के टुकड़े टॉयलेट पाइप और नालियों में मिले, जिससे पूरा सिस्टम चोक हो गया. पानी की टंकी और पाइप से भी कैश बरामद हुआ. मोहल्ले की नालियां साफ करने के लिए नगर निगम को बुलाना पड़ा.”
तेजस्वी ने आगे लिखा, “इससे पहले भी भवन निर्माण विभाग के एक अन्य अभियंता के घर से 11 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे. बिहार में भ्रष्टाचार की यह हालत हो चुकी है कि अब जले हुए नोटों की राख तक नालियों को जाम कर रही है. इसके लिए सभी बीजेपी और नीतीश कुमार समर्थक मोदी और नीतीश को धन्यवाद दें. हाल के दिनों में एक अभियंता के पास 500 करोड़ की संपत्ति, दूसरे के पास 300 करोड़ और तीसरे के पास 100 करोड़ की संपत्ति मिली है.”
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कड़े हमले
पिछले महीने भी बिहार विधानसभा के सेंट्रल हॉल में हुई एनडीए विधायकों की बैठक में, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौजूद थे बीजेपी के कुछ विधायकों ने शिकायत की कि अशोक चौधरी स्थानीय बीजेपी विधायकों को विभागीय कार्यक्रमों में नहीं बुलाते और उनके कार्यकर्ताओं को सहयोग नहीं देते. डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने कहा कि “गठबंधन धर्म” निभाना सिर्फ बीजेपी की जिम्मेदारी नहीं है. उन्होंने ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए ग्लोबल टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया और आरोप लगाया कि इसमें बीजेपी विधायकों और कार्यकर्ताओं के हितों की अनदेखी की गई.
सिन्हा ने आरजेडी से आए विधायक प्रह्लाद यादव का भी मुद्दा उठाया और कहा कि कई जेडीयू नेता खुलकर कह रहे हैं कि उन्हें अगली बार टिकट नहीं मिलेगा. उन्होंने जवाब दिया, “यह ठीक नहीं है.”
जून में आरजेडी ने नीतीश सरकार पर तीखा हमला किया और आरोप लगाया कि बिहार में उन्होंने “स्थायी दामाद आयोग” बना दिया है, जहां बड़े नेताओं के रिश्तेदारों को आयोगों और बोर्डों में जगह दी जा रही है. इसमें कहा गया कि अशोक चौधरी, जीतन राम मांझी और दिवंगत रामविलास पासवान के दामादों समेत कई नेताओं के परिजनों को राज्य संस्थाओं में पद मिले.
अशोक चौधरी के दामाद सायन कुनाल को धार्मिक न्यास बोर्ड का सदस्य बनाया गया. कुनाल की शादी चौधरी की बेटी शांभवी से हुई है, जो लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) पार्टी की ओर से सांसद हैं.
आरजेडी ने आरोप लगाया कि इस तरह की नियुक्तियां नीतीश सरकार के भाई-भतीजावाद पर दोहरे मापदंड उजागर करती हैं.
खुद अशोक चौधरी को राज्य विश्वविद्यालय आयोग ने असिस्टेंट प्रोफेसर चुना. उनकी पूर्व पार्टी कांग्रेस ने 58 साल की उम्र में इस चयन का मज़ाक उड़ाया. राज्य में कांग्रेस के एक नेता ने कहा, “युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही और अशोक चौधरी 58 साल की उम्र में आरएसएस कोटे की वजह से प्रोफेसर बन गए.”
चौधरी ने सफाई देते हुए कहा कि वे वेतन नहीं लेंगे और उन्होंने पांच साल पहले ही आवेदन किया था क्योंकि उन्हें अकादमिक क्षेत्र में रुचि है. उन्होंने कहा कि उनके शोध-पत्र कई जर्नल्स में प्रकाशित हुए हैं और उन्हें हार्वर्ड तक आमंत्रित किया गया था, जहां उन्होंने अनुसूचित जाति (एससी) की महिलाओं पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया.
इससे पहले, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने चौधरी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपनी बेटी शांभवी के लिए 2024 लोकसभा चुनाव में एलजेपी (रामविलास) से टिकट “खरीदा”. किशोर ने कहा था, “अशोक चौधरी ऑल-पार्टी लीडर हैं. उनके पिता कांग्रेस में थे, वे जेडीयू से मंत्री हैं, उनकी बेटी एलजेपी से सांसद है और उनके दामाद को आरएसएस कोटे से न्यास की सदस्यता मिली.”
चौधरी ने इस पर किशोर के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया और उन पर अपनी छवि खराब करने का आरोप लगाया.
पिछले साल लोकसभा चुनावों के बाद चौधरी ने जहानाबाद में जेडीयू की हार के लिए भूमिहार समुदाय को जिम्मेदार ठहराया और परोक्ष रूप से कहा कि बीजेपी जेडीयू को भूमिहार वोट ट्रांसफर नहीं कर पाई.
उन्होंने कहा था, “मैं भूमिहारों को अच्छी तरह जानता हूं, जब लोकसभा चुनाव हुए, इन लोगों ने नीतीश कुमार को छोड़ दिया. सिर्फ इसलिए कि हमने अतिपिछड़ा वर्ग से उम्मीदवार उतारा था, हम हार गए.”
उनकी इस टिप्पणी पर बीजेपी ने कड़ा विरोध जताया. विजय सिन्हा ने जवाब दिया, “भूमिहार केवल एक जाति नहीं हैं, वे एक ऐसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ज़मीन से जुड़ी है. समाज का कोई भी शुभचिंतक इस समुदाय पर गलत टिप्पणी नहीं कर सकता.”
नीतीश के करीबी
बिहार की राजनीति में अशोक चौधरी का उदय काफ़ी उल्लेखनीय रहा है. कभी कांग्रेस में राज्य का संभावित दलित चेहरा माने जाने वाले चौधरी, दस साल से भी कम समय में नीतीश कुमार के करीबी सहयोगियों में शामिल हो गए और जेडीयू में कई पुराने नेताओं को पीछे छोड़ दिया. उनके पिता महावीर चौधरी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता थे और कई सरकारों में मंत्री रह चुके थे.
राजनीति विज्ञान में डॉक्टरेट और कानून की पढ़ाई करने वाले चौधरी ने अपने करियर की शुरुआत यूथ कांग्रेस नेता के रूप में की. उन्होंने 2000 में पहली बार बरबीघा से विधानसभा चुनाव जीता और राबड़ी देवी सरकार में जेल मंत्री बनाए गए. फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी, लेकिन उसी साल नवंबर में हुए पुनः चुनाव में हार गए.
इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें संगठन की ज़िम्मेदारी दी और पार्टी की बिहार इकाई का उपाध्यक्ष बनाया. 2009 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें जमुई से टिकट दिया, लेकिन वे हार गए. 2010 विधानसभा चुनाव में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा.
लगातार असफलताओं के बावजूद कांग्रेस ने उन पर भरोसा नहीं छोड़ा. 2013 में राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद जब उन्होंने राज्यों में युवाओं को बढ़ावा देना शुरू किया, तो चौधरी को बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. वे 25 साल में पहले दलित नेता बने, जिन्हें राज्य इकाई की कमान सौंपी गई.
उनकी नियुक्ति इस उम्मीद में हुई थी कि वे नीतीश के आक्रामक महादलित अभियान का जवाब देंगे.
2015 में जब जेडीयू, राजद और कांग्रेस ने मिलकर महागठबंधन बनाया, तो चौधरी को नीतीश सरकार में शिक्षा मंत्री बनाया गया. 2017 में जब नीतीश ने महागठबंधन छोड़ दिया, तो चौधरी ने भी कांग्रेस से इस्तीफा देकर तीन और कांग्रेस एमएलसी के साथ जेडीयू का दामन थाम लिया.
नीतीश ने उन्हें अपनी कैबिनेट में जगह दी और 2020 विधानसभा चुनाव से पहले जेडीयू का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया. चौधरी महादलित पृष्ठभूमि से आते हैं—वे पासी समुदाय से हैं और इस आधार पर नीतीश ने उन पर लगभग 19.65% महादलित वोट बैंक को साधे रखने की बड़ी ज़िम्मेदारी दी.
लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद, जब जेडीयू ने एक और दलित नेता श्याम रजक को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया, तो चौधरी ने सोशल मीडिया पर एक रहस्यमय पोस्ट लिखी, जिससे उनके और नीतीश के बीच दूरियों की अटकलें लगने लगीं.
उन्होंने लिखा, “जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, छोड़ते जाइए. अगर किसी को एक-दो बार समझाने के बाद भी वह नहीं समझ रहा, तो सामने वालों को समझाना छोड़ दीजिए; जब बच्चे बड़े हो जाएं और अपने फैसले खुद लेने लगें, तब छोड़ दीजिए.
“अगर एक-दूसरे से विचार नहीं मिलते, तो छोड़ दीजिए; अगर एक उम्र के बाद कोई आपकी पूछ नहीं करता या आपके पीछे आपकी बुराई करता है, तो दिल पर मत लीजिए, छोड़ दीजिए; भविष्य की चिंता तब जब अनुभव हो कि कुछ भी आपके हाथ में नहीं है, छोड़ दीजिए; अगर इच्छा और क्षमता में बड़ा फ़र्क है, तो अपेक्षाएं कम कर लीजिए, छोड़ दीजिए…”
यह पोस्ट जेडीयू नेताओं को रास नहीं आई और कुछ ने उन पर हमला किया, लेकिन दो दिन के भीतर ही ग्रामीण कार्य मंत्री चौधरी को जेडीयू का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया. उन्होंने नीतीश से मुलाकात की और उन्हें “मानस पिता” (आदर्श पिता समान) कहा.
जब उनसे पूछा गया कि चौधरी और (उपमुख्यमंत्री विजय कुमार) सिन्हा की नोकझोंक का एनडीए की मज़बूती पर चुनावी साल में क्या असर पड़ेगा, तो जेडीयू के एक नेता ने दिप्रिंट से कहा, “गठबंधन में ऐसे मतभेद होते रहते हैं, लेकिन बड़े मुद्दे, जैसे विकास पर, कोई मतभेद नहीं है.”
जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने दिप्रिंट से कहा, “विचारों का अंतर लोकतंत्र का हिस्सा है और ऐसे मतभेद कैबिनेट में भी दिख सकते हैं.”
बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ने कहा, “ईओडब्ल्यू की कार्रवाई दिखाती है कि नीतीश कुमार सरकार भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस रखती है, इसलिए इंजीनियर को गिरफ्तार किया गया, जहां तक अशोक चौधरी की बात है, गठबंधन में हर दल का अपना दृष्टिकोण होता है, लेकिन कोई बड़ा मतभेद नहीं है.”
राज्य के एक अन्य बीजेपी नेता ने कहा, “कुछ मंत्री बीजेपी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर नहीं चलते. हाल ही में हुई गिरफ्तारी की घटना से ग्रामीण विकास मंत्रालय की छवि को नुकसान हुआ है, लेकिन नीतीश कुमार की साफ छवि की वजह से एनडीए को इसका नुकसान नहीं होगा. हां, नीतीश की उम्र बढ़ने के साथ जेडीयू के भीतर कई गुट पार्टी से ऊपर अपना हित साधने लगे हैं, जो बीजेपी और एनडीए के लिए चिंता की बात है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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