हैदराबाद: तेलंगाना के 2023 विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन और पार्टी कार्यकर्ताओं की लगातार मांग कि पुराने नाम पर वापस लौटा जाए, इन सबके चलते भारत राष्ट्र समिति के कार्यकारी अध्यक्ष के.टी. रामा राव ने घोषणा की कि पार्टी फिर से अपना नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति रख सकती है.
हालांकि, इस फैसले पर अभी अंतिम मुहर पार्टी के संस्थापक और तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव द्वारा लगाई जानी बाकी है. यह बात केटीआर ने राज्य भर में संगठन को मजबूत करने के लिए पदयात्रा की योजना के तहत कही.
केटीआर ने मंचेरियल जिले में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, “हां, पिछले विधानसभा चुनाव से पहले तेलंगाना राष्ट्र समिति का नाम बदलकर बीआरएस करना एक गलती थी. इस फैसले से हमने तेलंगाना की पहचान खो दी. अब पुराने नाम पर लौटने की मांग हो रही है. कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में मैं इसे लागू करने की कोशिश करूंगा.”
केटीआर का यह संकेत उनकी बहन और तेलंगाना जागृति की अध्यक्ष के. कविता के बयान के कुछ दिन बाद आया. कविता ने कहा था कि टीआरएस नाम कोई भी व्यक्ति या पार्टी इस्तेमाल कर सकती है, क्योंकि यह अब खुला है. कई लोगों का मानना है कि कविता अपने नए राजनीतिक दल के लिए टीआरएस नाम का इस्तेमाल कर सकती थीं, इसी वजह से केटीआर और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इसे वापस लेने का फैसला किया.
टीआरएस ने अक्टूबर 2022 में अपना नाम बदलकर बीआरएस रखा था, ताकि देशभर में अपनी पहुंच बढ़ाई जा सके. यह फैसला तेलंगाना राज्य बनने के आठ साल बाद लिया गया था. पार्टी की सांस्कृतिक इकाई तेलंगाना जागृति, जिसका नेतृत्व उस समय के. कविता कर रही थीं, ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में कार्यालय खोले थे ताकि सीमावर्ती राज्यों में पार्टी का विस्तार हो सके. लेकिन 119 सदस्यीय विधानसभा में बीआरएस को सिर्फ 39 सीटें मिलीं और 10 विधायक जीतने वाली कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए. इसके बाद नाम बदलने के फैसले पर सवाल उठे.
‘मूल रूप से गलत’
तेलंगाना आंदोलन के नेता और राजनेता प्रोफेसर एम. कोदंदराम रेड्डी, जिन्होंने राज्य गठन में केसीआर के साथ काम किया था, ने नाम बदलने को “मूल रूप से गलत” बताया.
उन्होंने कहा, “बीआरएस नाम रखने से केसीआर ने तेलंगाना नाम से अपना जुड़ाव तोड़ दिया. उनकी पार्टी तेलंगाना आंदोलन से बनी थी. लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा को ज्यादा महत्व देने के कारण उन्होंने अपने ही विचारों और राज्य के लोगों से दूरी बना ली.”
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भी यही राय जताई और बताया कि उन्होंने कई बार इस मुद्दे को पार्टी की बैठकों में उठाया. एक वरिष्ठ नेता तुला उमा ने कहा, “हम अपने क्षेत्रों, गांवों और कार्यकर्ताओं के बीच इस पर खुलकर बात करते रहे हैं. टीआरएस और तेलंगाना एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. अलग राज्य के लिए संघर्ष आज भी हमारे लिए भावनात्मक मुद्दा है. बीआरएस नाम को अपनाना हमारे लिए आसान नहीं रहा.”
पार्टी के नेताओं का कहना है कि अगला विधानसभा चुनाव 2028 से पहले नाम बदलने का फैसला लागू किया जा सकता है. उन्हें भरोसा है कि चुनाव आयोग उनके पक्ष में फैसला देगा. बी. विनोद कुमार ने बताया कि चुनाव आयोग किसी पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को दो चुनावों तक सुरक्षित रखता है, ताकि मतदाताओं में कोई भ्रम न हो.
हालांकि, तेलंगाना के चुनाव अधिकारियों ने कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है जो किसी व्यक्ति या पार्टी को बंद हो चुकी पार्टी के नाम या चिन्ह का इस्तेमाल करने से रोके. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29ए के अनुसार, किसी पार्टी को नया नाम और चिन्ह अपनाने के लिए दो दिन तक अखबारों में जानकारी देनी होती है, ताकि कोई आपत्ति हो तो उठाई जा सके. अंतिम फैसला चुनाव आयोग का होता है कि पुराने नाम या चिन्ह के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए या नहीं.
कविता को सितंबर 2025 में बीआरएस से निलंबित कर दिया गया था. उन्होंने अपने चचेरे भाइयों और पार्टी नेताओं टी. हरीश राव और जे. संतोष कुमार पर कलेश्वरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना को लेकर पार्टी की छवि खराब करने का आरोप लगाया था. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पार्टी से बाहर करने में इनकी भूमिका थी और इसके बाद उन्होंने नई पार्टी बनाने का फैसला किया.
उन्होंने अपनी नई पार्टी के लिए ‘तेलंगाना प्रजा जागृति’ नाम दर्ज कराने के लिए 23 जनवरी 2026 को आवेदन किया. उनकी पार्टी की शुरुआत, जिसमें चिन्ह और झंडा भी शामिल होगा, 25 अप्रैल को होने की संभावना है.
अपनी बहन की पार्टी और टीआरएस नाम के इस्तेमाल पर प्रतिक्रिया देते हुए केटीआर ने मंचेरियल की उसी बैठक में इशारों में उन पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि लोगों को परिवार में परेशानी नहीं पैदा करनी चाहिए. “अगर कोई अच्छा काम नहीं कर सकता, तो कम से कम अपने माता-पिता को रुलाना भी नहीं चाहिए,” उन्होंने कहा.
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