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Tuesday, 11 June, 2024
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BJP के फेरबदल में ‘संतोष के खास’ अरुण कुमार को कर्नाटक से क्यों हटाया गया

अरुण कुमार को कथित तौर पर बीएल संतोष के प्रभाव में रहकर काम करने की शिकायतों के बाद आरएसएस में वापस भेज दिया गया. अन्य चुनावी राज्यों में भी फेरबदल करते हुए नई नियुक्तियां की गई हैं.

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नई दिल्ली: भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कर्नाटक भाजपा महासचिव (संगठन) अरुण कुमार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में वापस भेज दिया है. दिप्रिंट को मिली जानकारी के मुताबिक, कथित तौर पर उनके खिलाफ पार्टी के मामलों में दखलअंदाजी करने और दक्षिणी राज्य में पार्टी को आगे बढ़ाने में मदद नहीं करने की शिकायतों के बाद यह फैसला लिया गया.

कुमार को भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष के प्रमुख सहयोगी के रूप में देखा जाता है.

राज्य इकाइयों में अन्य प्रमुख संगठनात्मक नियुक्तियां करते हुए नड्डा ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी महासचिव (संगठन) और पूर्वोत्तर के प्रभारी अजय जामवाल को नियुक्त किया है. कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सभी राज्यों में 2023 में चुनाव होंगे.

पार्टी के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव शिव प्रकाश को भोपाल से मुंबई भेज दिया गया है. वहीं महासचिव (संगठन) सतीश धोंड 2024 के लोकसभा चुनावों पर नजर रखने के लिए गोवा से पश्चिम बंगाल जाएंगे.

लेकिन सबसे बड़ा झटका कुमार की जगह राजेश जी.वी. को लेना रहा. इन्हें भाजपा का नया महासचिव (संगठन) बनाया गया है. कथित तौर पर वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा की इच्छा के खिलाफ कुमार ने पिछले छह सालों से प्रभार संभाला हुआ था.

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मई में ही संतोष ने संकेत दे दिया था कि कर्नाटक में अगले साल के राज्य चुनाव को देखते हुए भारी बदलाव देखने को मिलेंगे.

कहा जाता है कि येदियुरप्पा इस पद पर एक और आरएसएस प्रचारक रवि कुमार को चाहते थे लेकिन संतोष 2016 में कुमार को समर्थन देने के अपने फैसले पर अड़े रहे.

कर्नाटक के भाजपा सांसद ने दिप्रिंट को बताया, ‘(लेकिन) कुमार एक अपनी अलग पहचान नहीं बना सके और संतोष की छत्र छाया में रहकर काम करते रहे. वह वही सुनते थे जो संतोष जी उन्हें करने को कहते. उन्होंने येदियुरप्पा के समय में राज्य के मामलों के बारे में केंद्रीय नेतृत्व को कभी भी स्वतंत्र और तटस्थ दृष्टिकोण नहीं दिया.’

उन्होंने आगे कहा, ’आलाकमान ने नए सिरे से (कर्नाटक में) शुरुआत करने का निर्णय लिया है … आलाकमान नहीं चाहता था कि राज्य में ठीक ऐसी ही स्थिति पैदा हो और इसलिए उनकी जगह एक नए युवा चेहरे को लाया गया है.’

भाजपा के एक पदाधिकारी ने दावा किया कि कुमार राज्य में संगठन को संभालने में प्रभावी नहीं थे.

वह बताते हैं, ‘महासचिव की भूमिका पार्टी का विस्तार करने, नेताओं के बीच विवादों को सुलझाने, ईमानदार प्रतिक्रिया देने और निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने की होती है. लेकिन वह कुछ भी नहीं कर रहे थे.

अंदरूनी सूत्र ने कहा, ‘नई नियुक्ति (राजेश जी.वी.) सबसे कम उम्र के महासचिवों में से एक हैं. संगठनात्मक कार्यों में उनका प्रदर्शन अच्छा रहा है.’

फेरबदल के बारे में पूछे जाने पर भाजपा प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा कि यह एक ‘नियमित और आम बदलाव’ था. उन्होंने बताया, ‘पार्टी कई चीजों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेती है.’


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मुंबई योजना

शिव प्रकाश महाराष्ट्र में पार्टी के मामलों का मार्गदर्शन करने के लिए मुंबई जा रहे हैं, जहां भाजपा ने इस महीने शिवसेना के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले धड़े के साथ सरकार बनाई है.

भाजपा ने 2019 में महाराष्ट्र में 23 लोकसभा सीटें जीती थीं. प्रकाश को यह सुनिश्चित करना होगा कि अगले आम चुनाव में सीटों की संख्या में कोई गड़बड़ी न हो, खासकर यह देखते हुए कि उसकी पूर्व सहयोगी शिवसेना अब एक विभाजित दल है.

एक अन्य भाजपा नेता ने कहा कि संघ नेता अन्य राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी संगठनात्मक नेताओं की तरह नहीं हैं. प्रकाश को स्थानांतरित कर दिया गया क्योंकि वह कई राज्यों के प्रभारी रहे हैं. महाराष्ट्र काफी महत्वपूर्ण है. उन्हें राज्य में अधिक समय बिताना होगा और संगठनात्मक मामलों पर नजर रखनी होगी.’

ऊपर उद्धृत पहले पार्टी पदाधिकारी ने कहा कि जामवाल को छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के लिए तैयार किया गया है. क्योंकि यहां पार्टी को एक ऐसे नेता की जरूरत है जो विधानसभा चुनावों से पहले दोनों राज्यों में संगठनात्मक ढांचे को ‘प्रेरित’ कर सके.

पार्टी के पदाधिकारी ने बताया, ‘मध्य प्रदेश के आयोजन महासचिव हितानंद शर्मा अपेक्षाकृत युवा हैं… स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों ने राज्य में हमारी तैयारियों पर सवाल उठा दिए हैं. छत्तीसगढ़ भी अभी पार्टी के लिए चिंताजनक राज्य है.’

जामवाल ने अपनी ओर से दिप्रिंट को बताया कि पार्टी ने संगठनात्मक जरूरतों पर विचार करने के बाद उन्हें चुनावी राज्यों में भेजा है. उन्होंने कहा, ‘अभी तक पूर्वोत्तर में ज्यादा चुनौती नहीं है. पार्टी को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपनी मौजूदगी बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है.

बंगाल में भाजपा को अपनी 17 लोकसभा सीटों को बरकरार रखने के साथ-साथ 2021 के प्रदर्शन और राज्य में आगामी हिंसा के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने की दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. मुकुल रॉय, अर्जुन सिंह, बाबुल सुप्रियो के पार्टी छोड़ने के बाद धोंड के लिए राज्य में चुनौतियां बढ़ी हुई है.

दूसरे भाजपा नेता ने बताया, ‘पार्टी ने वरिष्ठ नेता सुभेंदु अधिकारी को खुली छूट देने और दिलीप घोष के कार्यकाल के दौरान टकराव से बचने के लिए युवा प्रदेश अध्यक्ष सुकांत कुमार मजूमदार को चुना.’ वह कहते हैं, ‘लेकिन मजूमदार के पास संगठनात्मक क्षमता का अभाव है. धोंड की नई जिम्मेदारी का मतलब है कि पार्टी राज्य में पार्टी की स्थिति को मजबूत करना चाहती है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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